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Zee Jaankari: थोड़ा सा रो लीजिए, इससे आपका मन हल्का हो जाएगा

एक तथ्य ये भी है, कि हमारे देश में मूल रुप से आंसुओं को महिलाओं से ही जोड़कर देखा जाता है. लड़कों को अक्सर नसीहत दी जाती है, कि लड़कियों की तरह नहीं रोते. लेकिन क्या वाकई में ऐसा है ? 

Zee Jaankari: थोड़ा सा रो लीजिए, इससे आपका मन हल्का हो जाएगा

अब हम उस प्रश्न का उत्तर ढूंढने की कोशिश करेंगे, जिसकी चर्चा पिछले 4 दिनों से पूरी दुनिया में हो रही है. आपको 7 सितम्बर 2019 की तस्वीरें याद होंगी. जब चंद्रयान Two का संपर्क टूटने के बाद ISRO के चेयरमैन K Sivan काफी हताश और उदास हो गए थे. उनकी पूरी टीम ने इस Mission के लिए बहुत परिश्रम किया था. लेकिन जब उन्हें उसका फल नहीं मिला, तो वो अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए. और जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे विदाई ली, उस वक्त K Sivan की आंखें नम हो गईं थीं. इसके बाद लगभग 40 सेकेंड तक उनकी आंखों से बहते आंसू देखकर पूरे देश में एक बहस छिड़ गई.

और लोग ये प्रश्न पूछने लगे, कि इतना बड़ा वैज्ञानिक इस तरह कैसे रो सकता है ? कुछ लोगों ने ये भी पूछा, कि क्या पुरुषों को भी दर्द होता है ? तो कुछ ने कहा, कि रोना-धोना महिलाओं का काम है. वो ज़रा-ज़रा सी बात पर आंसू बहा देती हैं. अंग्रेज़ी में इसके लिए जिस शब्दावली का प्रयोग किया गया, वो था... Is It OK For Men To Cry ? भारत में अक्सर ये कहा जाता है कि रोना...

कमज़ोर लोगों का काम है और आंसू.... कायरता की निशानी हैं. इसलिए भारत में लोग अपने आंसुओं को हमेशा रोककर रखते हैं. शायद इसीलिए पुराने ज़माने में राजस्थान के कुछ इलाकों में....दुख व्यक्त करने के लिए पैसे देकर रोने के लिए कुछ महिलाओं को बुलाया जाता था. इन महिलाओं को रुदाली कहा जाता था.

एक तथ्य ये भी है, कि हमारे देश में मूल रुप से आंसुओं को महिलाओं से ही जोड़कर देखा जाता है. लड़कों को अक्सर नसीहत दी जाती है, कि लड़कियों की तरह नहीं रोते. लेकिन क्या वाकई में ऐसा है ? सृष्टि ने सबको एक जैसा बनाया है. भावनाएं सबके अंदर होती हैं. जानवर भी रोता है. इंसान भी रोता है, फिर चाहे महिलाएं हों या पुरुष हों.

लड़का हो या लड़की...जन्म लेते ही, दोनों रोते हैं. क्योंकि, रोना, एक प्रकार से भावनाओं की अभिव्यक्ति है. और हमने ऐसा एक बार नहीं, अनेक बार देखा है. जब देश और दुनिया के बड़े-बड़े लोग सार्वजनिक मंच पर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए.

इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, Russia के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सहित बड़े-बड़े खिलाड़ी भी हैं. बात पुरुषों के आंसुओं की हो रही है, तो इस विश्लेषण की शुरुआत भी इन पुरुषों की भावुक तस्वीरों से करते हैं.

इन तस्वीरों को देखने के बाद क्या कोई ये कह सकता है, कि पुरुषों को दर्द नहीं होता ? या उनके आंसू नहीं निकल सकते. इसका जवाब है, नहीं. आंसुओं का पुरुष या महिलाओं से कोई संबंध नहीं है. हमारे देश की परंपरा तो ऐसी रही है, जहां भगवान राम और उनके भाई, भरत के भी आंसु निकले थे. राम और लक्ष्मण भी गले लगकर एक साथ रो पड़े थे.

ठीक इसी तरह भगवान शिव की पूजा सदियों से हो रही है. लेकिन, शिव का एक और रूप है....जिसे आप अर्धनारीश्वर के नाम से जानते हैं. भगवान शिव ने ये रूप अपनी मर्जी से धारण किया था. इस रूप के ज़रिए वो लोगों को संदेश देना चाहते थे, कि स्त्री और पुरुष समान हैं. भगवान शंकर के अर्धनारीश्वर अवतार में शिव का आधा शरीर, स्त्री और आधा शरीर, पुरुष का है.

शिव का ये अवतार स्त्री और पुरुष की समानता को दर्शाता है. लेकिन आंसुओं के नाम पर इसका भी बंटवारा कर दिया गया है. एक रिसर्च के मुताबिक, रोने से, मानसिक तनाव कम होता है. इसलिए हफ़्ते में कम से कम एक बार, जी भर के रो लेना चाहिए. रोने के दौरान आंसुओं के ज़रिए ऐसे Hormone निकलते हैं, जिनसे मानसिक तनाव कम होने लगता है. इन Hormones को Stress Hormones कहा जाता है.

इसके अलावा रोने के दौरान शरीर में Endorphin नामक Hormone पैदा होता है. जिससे मन हल्का हो जाता है और आपको अच्छा महसूस होता है. अगर आप दुखी हैं और किसी कारणवश नहीं रो पा रहे हैं, तो ऐसी स्थिति में आपका मन भारी रहता है. आपने खुद भी ये बात Notice की होगी.

सबसे बड़ी बात ये है, कि भावनाओं को दबा कर रखने से शारीरिक ढांचे को नुकसान पहुंचता है. जिससे High Blood Pressure की स्थिति भी पैदा हो सकती है. यहां आपको एक बात समझनी होगी कि रोने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है, कि किसी व्यक्ति को डांट कर या दुख पहुंचाकर रुलाना शुरू कर दिया जाए.

आज हमने इस विषय को आसान भाषा में समझाने के लिए एक छोटी सी रिपोर्ट तैयार की है. ताकि आपको भावनात्मक बातों को कहने, समझने और उसे व्यक्त करने में आसानी हो सके.इस रिपोर्ट में हमने हिन्दी फिल्मों के कुछ गानों का प्रयोग किया. क्योंकि, फिल्में भी समाज का हिस्सा होती हैं.

आपने फिल्मों में भी अक्सर नायकों को रोते हुए देखा होगा. और उनकी व्यथा देखकर, कई बार थिएटर के अंदर मौजूद दर्शक भी फूट-फूट कर रोने लगते हैं. क्योंकि, वो उस पीड़ा को खुद से जोड़कर देखते हैं और उसे महसूस करते हैं. लेकिन बाहर आने के बाद उन्हीं दर्शकों के लिए सबकुछ सामान्य हो जाता है.

इसका मतलब ये नहीं है, कि दर्शकों की भावनाएं ख़त्म हो जाती हैं. और इसीलिए हम कह रहे हैं, कि आंसुओं की क़ीमत वही समझ सकता है, जिसका दर्द, सीधे दिल से निकल रहा हो. इसलिए अगली बार जब आपको कोई दुख हो या दिल में कोई पीड़ा हो. तो संकोच मत कीजिए. रोइए...क्योंकि रोना, सबके लिए जायज़ है. फिर चाहे वो महिला हो, या पुरुष.