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Zee Jaankari: हिंदू-मुस्लिम राम मंदिर पर पूरी दुनिया में पेश कर सकते हैं मिसाल, जानिए कैसे?

पूरी दुनिया में ये कहा जाता है कि भारत के मुसलमान धर्मनिरपेक्ष है और सबसे अलग है. आज मुसलमानों के लिए ये बात साबित करने का बहुत बड़ा मौका है .

Zee Jaankari: हिंदू-मुस्लिम राम मंदिर पर पूरी दुनिया में पेश कर सकते हैं मिसाल, जानिए कैसे?

पूरी दुनिया में ये कहा जाता है कि भारत के मुसलमान धर्मनिरपेक्ष है और सबसे अलग है. आज मुसलमानों के लिए ये बात साबित करने का बहुत बड़ा मौका है . DNA में हमने पहले भी बताया है कि. मुसलमान चाहें तो अपना बड़ा दिल दिखाकर पूरी दुनिया में मिसाल पेश कर सकते हैं. और सैंकड़ों वर्षों से ज़्यादा पुराना विवाद. एक दिन में खत्म हो सकता है. इससे पूरी दुनिया में हमारे देश की धर्मनिरपेक्ष छवि भी और मजबूत होगी. देश चाहे तो 'हम' फॉर्मूले से समस्याओं को सुलझा सकता है. यहां 'हम' का मतलब है हिंदू और मुसलमान. इस वक्त भारत की कुल जनसंख्या 135 करोड़ है. और इसमें से करीब 80% यानी 108 करोड़ से ज्यादा हिंदू हैं.

जबकि मुसलमान 14 प्रतिशत यानी करीब 19 करोड़ हैं. भारत में दुनिया के 11 प्रतिशत मुसलमान भारत में रहते हैं .जबकि सिख सवा 2 करोड़, ईसाई 3 करोड़ और बाकी धर्मों के लोग करीब 2 करोड़ 75 लाख हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है.. लेकिन अभी भी हिंदू और मुसलमान चाहें तो अदालत के बाहर समझौता कर सकते हैं .मान लीजिए कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने ये कह दिया कि... अयोध्या में मंदिर बनना चाहिए तो क्या ये फैसला देश के 19 करोड़ से ज्यादा मुसलमानों को स्वीकार होगा?

और अगर सुप्रीम कोर्ट ये कह दे कि अयोध्या में मस्जिद बनेगी तो क्या ये फैसला देश के क़रीब 108 करोड़ हिंदुओं को स्वीकार होगा? कोर्ट के फैसलों में हमेशा एक पक्ष की जीत होती है. और दूसरे पक्ष की हार होती है. लेकिन अगर दोनों समुदायों के लोग आपस में मिलकर बैठें, और राम मंदिर बनाने पर सहमत हो जाएं तो ये एक अभूतपूर्व समाधान होगा. इसमें किसी की हार नहीं होगी...

बल्कि दोनों ही पक्षों की जीत होगी. वैसे सोचने वाली बात ये भी है क्या वाकई में भारत के मुसलमान, अयोध्या में राम मंदिर बनाने के विरोध में हैं ? या फिर ये सिर्फ एक राजनीतिक और सांप्रदायिक गलतफहमी है? हमें लगता है कि ये भारत के मुसलमानों के लिए एक बहुत बड़ा मौका है जिसके तहत वो साम्प्रदायिक सौहार्द की एक नई मिसाल दे सकते हैं.

इससे देश में धार्मिक सौहार्द का एक नया युग शुरू हो जाएगा.लेकिन हमारे देश में ही बहुत से लोग ऐसे हैं... जो नहीं चाहते कि ये विवाद खत्म हो . क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो कई वर्षों से चल रही उनकी राजनीतिक दुकानें बंद हो जाएंगी. अगर ये विवाद सुलझ गया तो राजनीतिक पार्टियां चुनाव कैसे जीतेंगी? ऐसा हो गया तो, बड़ी बड़ी राजनीतिक पार्टियों को चुनाव लड़ने के लिए नये मुद्दे लाने होंगे.

विवाद सुलझने से राजनीतिक पार्टियां वोटों का ध्रुवीकरण भी नहीं कर पाएंगी .ये Case आज़ादी के बाद 72 वर्षों से चल रहा है . लेकिन एक दावा ये भी है कि मंदिर और मस्जिद का विवाद 491 वर्ष पुराना है . ऐसा माना जाता है कि वर्ष 1528 में भगवान राम के जन्मस्थान पर मस्जिद का निर्माण किया गया था .

और जन्मस्थान पर मौजूद मंदिर को तोड़कर मुग़ल बादशाह बाबर ने मस्जिद बनवाई थी .अदालत में इस विवाद की शुरुआत वर्ष 1949 से हुई, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं थी . इसके बाद सरकार ने इस जगह को विवादित घोषित करके यहां ताला लगा दिया था . फिर जनवरी 1950 में फैज़ाबाद की अदालत में हिंदू महासभा और दिगंबर अखाड़ा की तरफ से पहला मुकदमा दायर किया गया था .

1 फरवरी 1986 को फैज़ाबाद के ज़िला जज ने विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश दे दिया . तब केंद्र में राजीव गांधी की सरकार थी और कहा जाता है कि स्थानीय प्रशासन पर ताला खोलने के लिए राजनीतिक दबाव डाला गया था . इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर बनाने का आंदोलन तेज़ किया . फिर 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा दिया गया था .

वर्ष 1993 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस केस पर सुनवाई शुरू की . 17 साल बाद 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2.77 एकड़ की विवादित ज़मीन को 3 बराबर हिस्सों में बांट दिया . हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कुल 18 अपील पर सुनवाई हुई जिनमें 11 पक्ष हिंदू और 7 पक्ष मुस्लिम थे.