ZEE जानकारी: आखिर अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों का आपकी जिंदगी से क्या है रिश्ता?

फिलहाल अर्थव्यवस्था और महंगाई के जो हालात हैं. उसके दो पहलू हैं यानी इस पर अर्थशास्त्री भी बंटे हुए हैं. कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ये महंगाई इतनी खतरनाक भी नहीं है. खाने-पीने की जरूरी चीजों के दाम बढ़ जाने के बाद भी इनकी मांग में मोटे तौर पर कमी नहीं आई है और इसका सीधा फायदा किसानों को होता है.

ZEE जानकारी: आखिर अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों का आपकी जिंदगी से क्या है रिश्ता?

भारत की राजनीति में आजकल भारत की अर्थव्यवस्था ट्रेंड कर रही है. अर्थव्यवस्था से जुड़े हर आंकड़ों पर आजकल विपक्ष, एक्सपर्ट्स और जनता की पैनी नजर है. लेकिन कोई भी आपको सरल भाषा में ये नहीं समझा पा रहा कि इन आंकड़ों का आपकी जिंदगी से क्या रिश्ता है.

फिलहाल अर्थव्यवस्था और महंगाई के जो हालात हैं. उसके दो पहलू हैं यानी इस पर अर्थशास्त्री भी बंटे हुए हैं. कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ये महंगाई इतनी खतरनाक भी नहीं है. खाने-पीने की जरूरी चीजों के दाम बढ़ जाने के बाद भी इनकी मांग में मोटे तौर पर कमी नहीं आई है और इसका सीधा फायदा किसानों को होता है. जिन्हें उनकी फसलों के उचित दाम मिल पाते हैं. हालांकि एक सच्चाई ये भी है कि हमारे देश में किसानों तक पूरा फायदा कभी नहीं पहुंच पाता क्योंकि बिचौलिए और जमाखोर ऐसा होने नहीं देते.

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2018 में भारत में 10 हजार 349 किसानों ने आत्महत्या की थी. जाहिर है अगर किसानों तक फसलों की सही कीमत पहुंच पा रही होती तो स्थिति ये नहीं होती.

दूसरी तरफ कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि महंगाई दर में वृद्धि आम लोगों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित करेगी. क्योंकि इससे एक ऐसे साइकल यानी क्रम की शुरुआत होती है, जिसकी चपेट में हम सब आ जाते हैं. ये हम आपको बता चुके हैं कि महंगाई दर बढ़ने से बैंक ब्याज दरों में कमी नहीं करते. इससे उद्योगपतियों को नुकसान होता है क्योंकि उन्हें महंगी ब्याज़ दरों पर लोन लेना पड़ता है. इससे उनकी लागत बढ़ जाती है. सामान महंगा हो जाता है और ले-देकर आम उपभोक्ता इससे प्रभावित होता है.

इसे आप गाड़ियों के बाजार के उदाहरण से समझ सकते हैं. यानी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के उदाहरण से. Society of Indian Automobile Manufacturers के मुताबिक पिछले वर्ष गाड़ियों की बिक्री में 19 प्रतिशत की भारी कमी आई थी.

और इस साल भी गाड़ियों की बिक्री में कुछ खास इजाफा होने की उम्मीद नहीं है. आम आदमी के लिए गाड़ी लोन पर लेना आजकल ज्यादा महंगा साबित हो रहा है क्योंकि जो लोन पर गाड़ी खरीद रहे हैं उन्हें ज्यादा इंटरेस्ट रेट चुकाना पड़ रहा है.

High Interest Rate  से ग्राहकों का रुझान कम होता है और बदले में उद्योग धंधों को भी नुकसान होता है. भारत की Auto Industry में ये गिरावट लंबे वक्त से देखी जा रही है. इससे सैंकड़ों शोरूम भी बंद हो चुके हैं और कई कंपनियों को तो अपने प्लांट्स भी कुछ वक्त के लिए बंद करने पड़े थे.

भारत के Manufacturing Sector में Automobile Sector की हिस्सेदारी 49 प्रतिशत है और भारत की GDP में इसकी हिस्सेदारी साढ़े सात प्रतिशत है. अकेले इस ऑटो सेक्टर से ही करीब 80 लाख लोगों को रोजगार मिलता है. जाहिर है जब महंगाई की वजह से लोग गाड़ियां नहीं खरीदेंगे तो इन 80 लाख लोगों की जिंदगी पर भी इसका असर पड़ेगा.

एक उपभोक्ता बाजार में दो कारणों से आता है. पहला ये कि उसकी आय का स्तर बढ़ जाए यानी उसकी आय में वृद्धि हो और रोजगार के नए अवसर पैदा हों. लेकिन ये काम बहुत आसान नहीं होता. इसमें वक्त लगता है. भारत के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल करीब 16 लाख नौकरियां कम मिलेंगी और सरकारी नौकरियों में भी 39 हजार की कमी आएगी. स्थिति ऐसी है कि इस साल आपको अपने वेतन में भी ज्यादा वृद्धि की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. यानी इस मंदी और महंगाई का असर आपके सैलरी इंक्रीमेंट पर पड़ना लगभग तय है.

ये सब कारण मिलकर आम आदमी की वित्तीय स्थिति को प्रभावित करते हैं. बेरोजगारी की मार युवाओं को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है और कई बार बेरोजगारी से तंग आकर कुछ लोग अपनी जान भी दे देते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2018 में आत्महत्या करने वालों में सबसे ज्यादा बेरोजगार थे. 2018 में 12 हजार 936 बेरोजगारों ने आत्महत्या की थी. ये उस साल हुई कुल आत्महत्याओं का 10 प्रतिशत है. आत्महत्या करने के मामले में दूसरे नंबर पर किसान आते हैं.

यानी महंगाई समाज के हर वर्ग को बुरी तरह प्रभावित करती है. इससे बचने का एक उपाय ये है कि सरकार इनकम टैक्स में कमी करे जिससे लोगों के पास थोड़ा पैसा बच पाए और वो इसे खर्च करने बाजार जा पाएं. इससे नई मांग और रोजगार दोनों पैदा होंगे.

भारत ही नहीं पूरी दुनिया में महंगाई अलग अलग कारणों से बढ़ रही है. संयुक्त राष्ट्र की Food And Agriculture Organization के मुताबिक पिछले साल दिसंबर में पूरी दुनिया में खाने-पीने की वस्तुएं 12.5 प्रतिशत महंगी हो गई थीं.

अर्थव्यवस्था के आंकड़ों पर नजर रखने वाले National Statistical Office यानी NSO के मुताबिक 40 वर्षों के मुकाबले..पहली बार उपभोक्ता कम पैसे खर्च कर रहे हैं. वर्ष 2011-2012 में एक भारतीय औसतन 1 हजार 501 रुपए प्रति महीने खर्च कर रहा था. ये खर्च 2017-18 में घटकर 1 हजार 446 रुपए प्रति महीने हो गया.

RBI के मुताबिक बाजार को लेकर उपभोक्ताओं के मन में विश्वास कम हुआ है. लोगों को नौकरियां जाने का डर है इसलिए वो पैसे खर्च नहीं कर रहे जबकि बहुत सारे लोग अपने रहन-सहन का स्तर बनाए रखने के लिए अपनी Savings का इस्तेमाल कर रहे हैं.

अगर आप भी बाजार और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित हैं तो आप कुछ उपायों के जरिए अपनी वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाए रख सकते हैं. आज जो महंगाई दर है, उसका सीधा सा अर्थ ये है कि अगर आपको किसी निवेश पर 7 प्रतिशत तक का रिटर्न मिल रहा है तो आप नुकसान में हैं.

क्योंकि महंगाई दर 7.35 प्रतिशत है..यानी अगर आपकी बचत सात हजार रुपए है तो आपका खर्च साढ़े सात हजार रुपए है. यानी आप 500 रुपए के नुकसान में हैं. लेकिन इस नुकसान से बचने के कुछ उपाय भी हैं..जिन्हें आपको नोट कर लेना चाहिए.

अगर आपने SIP यानी Systematic Investment Plan में निवेश किया है तो इसे खत्म ना करें. यानी Discontinue ना करें. बल्कि अर्थव्यवस्था में गिरावट के दौर में ये फायदेमंद साबित हो सकता है..क्योंकि शेयरों के दाम कम होने से इनवेस्टर्स ज्यादा शेयर खरीद पाते हैं और जब अर्थव्यवस्था सुधरती है तो इन शेयरों और Mutual Funds से ज्यादा Return हासिल होता है. यानी अपने निवेश को लेकर घबराएं नहीं..बल्कि सकारात्मक बने रहें.

इस दौरान प्रॉपर्टी में निवेश सोच समझकर करें. क्योंकि फिलहाल प्रॉपर्टी बाज़ार से ज्यादा लाभ हासिल होने की संभावना नहीं है और अगले तीन वर्षों तक आपको इस क्षेत्र में सोच-समझकर ही निवेश करना चाहिए.

अपने फंड्स को एक जगह ना लगाएं बल्कि इसे अलग अलग जगह निवेश करें ताकि एक क्षेत्र पर संकट आ भी जाए तो आप पूरी तरह से नुकसान में ना रहें. अगर आप अपने घर में कमाने वाले एकमात्र सदस्य हैं तो 9 से 12 महीने का फंड तैयार करके रखें. यानी अगर इस दौरान नौकरी चली जाए या कुछ और संकट आ जाए तो आपके पास 9 से 12 महीने के खर्च के पैसे हों.

आप फिक्सड डिपोजिट भी कर सकते हैं. जरूरत पड़ने पर ये पैसा आपके काम आ जाएगा. इसके अलावा आप ज्यादा से ज्यादा Liquid Funds में इंवेस्ट करें..ये ऐसे निवेश होते हैं, जिनसे जरूरत पड़ने पर पैसा निकाला जा सकता है.

कहते हैं एक रुपया बचाना भी, एक रुपया कमाने के बराबर होता है इसलिए बचत पर ध्यान दें और गैरजरूरी खर्चों में कमी लाएं. अगर आप महीने में तीन बार बाहर खाना खाते हैं और औसतन 6 हजार रुपए खर्च करते हैं तो आप तीन की जगह एक बार बाहर खाना खाएं. आप सीधे 4 हजार रुपए बचा पाएंगे.

बड़े खर्चों को कुछ वक्त के लिए टाल दें. जैसे अगर आप घर या गाड़ी खरीदना चाहते हैं या फिर विदेशों में छुट्टियां मनाना चाहते हैं तो पहले आप अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत कर लें और फिर इन योजनाओं पर काम करें.

अपने पूरे परिवार के लिए मेडिकल कवर जरूर लें ताकि बुरे वक्त में ये आपके काम आ सके. कर्ज लेने की आदत पर काबू पाएं. अगर आपकी वित्तीय स्थिति कमजोर है तो आप बैंक से लोन चुकाने की अवधि बढ़ाने का आग्रह कर सकते हैं. इससे आपकी EMI कम हो जाएगी.

Credit कार्ड का भी गैरजरूरी इस्तेमाल ना करें. क्योंकि इस पर बहुत ज्यादा ब्याज लगता है और पेमेंट ना करने पर या EMI ना चुकाने आपका Credit Score खराब हो सकता है जिससे आपको भविष्य में कर्ज लेने में परेशानी हो सकती है.

ये ठीक है कि पिछले कुछ दिनों में भारत की अर्थव्यवस्था को झटके लगे हैं. और इसने आम लोगों के मन में भी डर पैदा किया है. 11 वर्षों के मुकाबले GDP की विकास दर सबसे कम यानी 5 प्रतिशत है. महंगाई भी बढ़ रही है और सब बजट में Tax Cut की उम्मीद लगा रहे हैं. लेकिन भारत एक बहुत बड़ा बाजार है और भारतीयों की बचत की आदत संकट की इस घड़ी में संजीवनी का काम करती है. इसलिए ये समय थोड़ा संभलकर निकाल लें और आने वाले समय के लिए खुद को वित्तीय तौर पर ज्यादा मजबूत बनाने की कोशिश करें.

एक जमाना था जब खबरों में भी महंगाई की बात होती थी और इसे फिल्मों में भी जगह मिलती थी. लेकिन अब मंहगाई का मुद्दा खबरों के साथ साथ फिल्मों से भी गायब होता जा रहा है. बेरोजगारी और महंगाई जैसी समस्या भारतीय फिल्मों की पटकथाओं का हिस्सा रही हैं लेकिन अब ये परंपरा बंद हो चुकी है. आज हमने कुछ पुरानी फिल्मों के वो गाने निकाले हैं जिनमें महंगाई, बढ़ते खर्चे और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को उठाया गया था. 

लेकिन अब महंगाई जैसे मुद्दे में कोई ग्लैमर नहीं बचा है. इस मुद्दे को अगर अखबारों में जगह मिलती भी है तो वहां भी आपको भारी भरकम आंकड़े दे दिए जाते हैं और मुद्दे की बात आपको कोई नहीं बताता. महंगाई और मौत सबसे ज्यादा धर्मनिरपेक्ष होते हैं, ये जात-पात और धर्म नहीं देखते, इनके लिए सब बराबर हैं. इसलिए आज भारत के हर नागरिक को ये बात समझने की जरूरत है कि अगर प्रदर्शन करना ही है तो असली मुद्दों पर किया जाए. विरोध प्रदर्शनों की ये आग देश को आगे नहीं बढ़ने देगी और इससे सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था को ही और नुकसान होगा.