Zee Jaankari: देश अगर चाहे तो 'हम' फॉर्मूले से सुलझा सकता है अयोध्या विवाद

ये Zee News का 'हम' Formula है.  देश अगर चाहे तो 'हम' फॉर्मूले से अयोध्या विवाद को सुलझा सकता है. 'हम' का मतलब है हिंदू और मुसलमान. ये हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देने का एक मौका है. 

Zee Jaankari: देश अगर चाहे तो 'हम' फॉर्मूले से सुलझा सकता है अयोध्या विवाद

पूरी दुनिया के करीब 120 करोड़ हिंदुओं की भावनाएं हैं कि भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए . सबसे बेहतर विकल्प तो यही है कि हिंदू और मुसलमान मिलकर अयोध्या विवाद को सुलझा लें.  भारत के मुसलमान अगर चाहें तो अपना बड़ा दिल दिखाकर पूरी दुनिया में मिसाल पेश कर सकते हैं और 491 वर्ष पुराना विवाद एक दिन में खत्म हो सकता है. ये Zee News का 'हम' Formula है.  देश अगर चाहे तो 'हम' फॉर्मूले से अयोध्या विवाद को सुलझा सकता है. 'हम' का मतलब है हिंदू और मुसलमान. ये हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देने का एक मौका है.

अगर अयोध्या विवाद का हल निकल आता है. तो सांप्रदायिकता की सबसे बड़ी समस्या हल हो जाएगी.  साथ ही राजनीति का मुद्दा भी खत्म हो जाएगा. राम मंदिर पर न्यायिक और सामाजिक हल क्या हो सकते हैं...ये हमने आपको बताया लेकिन आपको इसके राजनीति हल के बारे में भी जानना चाहिए  . 

वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार राम मंदिर के मुद्दे को अपने घोषणा पत्र में स्थान दिया था. वर्ष 1991 से लेकर 2019 तक राम मंदिर निर्माण का मुद्दा बीजेपी के घोषणा पत्र में रहा है.  आज की स्थिति में केंद्र में बीजेपी की सरकार है, और यूपी में भी बीजेपी की सरकार है.

इसलिए राम मंदिर निर्माण में किसी प्रकार की बाधा आने की स्थिति में केंद्र सरकार और राज्य सरकार मिलकर बड़ा कदम भी उठा सकती है . ये Case आज़ादी के बाद 70 वर्षों से चल रहा है. लेकिन मंदिर और मस्जिद का विवाद करीब 500 वर्ष पुराना है. ऐसा माना जाता है कि वर्ष 1528 में अयोध्या में एक ऐसी जगह पर मस्जिद का निर्माण किया गया, जिसे हिंदू, भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं. कहा जाता है कि ये मस्जिद मुग़ल बादशाह बाबर ने बनवाई थी, जिसकी वजह से इसे बाबरी मस्जिद कहा जाता था.

हिंदू पक्ष का ये दावा है कि 1528 से ही वो राम जन्मभूमि को वापस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. राम मंदिर के मामले में पहला केस वर्ष 1885 में महंत रघुबीर दास ने दाखिल किया था. तब भारत आज़ाद नहीं था. अदालत में इस विवाद की शुरुआत 1949 से हुई, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं. इसके बाद सरकार ने इस जगह को विवादित घोषित करके यहां ताला लगा दिया. जनवरी 1950 में आजादी के बाद फैज़ाबाद की अदालत में हिंदू महासभा और दिगंबर अखाड़ा की तरफ से पहला मुकदमा दायर किया गया  . 

इसके बाद राम मंदिर के नाम पर इस विवादित स्थल पर देश भर में कई दशकों तक राजनीति होती रही. 1 फरवरी 1986 को फैज़ाबाद के ज़िला जज ने विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश दे दिया .  इसके बाद भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर बनाने का आंदोलन तेज़ किया. 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद का विवादित ढांचा गिरा दिया गया. वर्ष 1993 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस केस पर सुनवाई शुरू की. 17 साल बाद वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया . 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था.

कोर्ट ने कहा था कि 2.77 एकड़ की विवादित ज़मीन को 3 बराबर हिस्सों में बांट दिया जाए. इस फैसले के खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में 14 अलग अलग याचिकाएं दाखिल की गई. इस फैसले पर 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी. इसके बाद जनवरी 2019 में राम मंदिर मामले में सुनवाई होनी शुरु हुई.  तमाम कानूनी अड़चनों के बाद इस वर्ष 6 अगस्त से रोजाना सुनवाई हो रही है. राम मंदिर का मुद्दा भारत के इतिहास में सबसे लंबा चलने वाला कानूनी विवाद है. इसे सुलझाने की कोशिश कई सरकारों ने की लेकिन किसी को भी इसमें सफलता नहीं मिली.

विवाद को सुलझाने की सबसे पहली कोशिश नवंबर 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वी पी सिंह के समय में हुई थी. लेकिन नवंबर 1990 में वी पी सिंह की सरकार गिर गई जिसके बाद समझौते की कोशिश विफल हो गई. वी पी सिंह के बाद चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने. चंद्रशेखर ने भी अयोध्या विवाद को सुलझाने की कोशिश की. 

लेकिन उनकी सरकार भी गिर गई. इसके बाद पी वी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने. उन्होंने भी समझौते की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. लेकिन कोई समाधान नहीं निकला. इसके बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने वर्ष 2003 में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती के ज़रिए भी अयोध्या विवाद सुलझाने की कोशिश की थी.

लेकिन ये कोशिश भी विफल साबित हुई. और इस वर्ष मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता के माध्यम मंदिर मुद्दे को सुलझाने की कोशिश की थी. जस्टिस एफएम कलीफुल्ला की अगुवाई में वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू और अध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का पैनल बनाया गया था. इस पैनल ने मंदिर विवाद के सभी पक्षकारों से बात कर समझौता कराने का प्रयास किया था.  करीब 155 दिनों तक ये कोशिश चलती रही. जिसके बाद 1 अगस्त को मध्यस्थता पैनल ने अदालत में माना कि ये कोशिश असफल हो गई है.