ZEE जानकारी: विसर्जन के नाम पर देवी-देवताओं की प्रतिमा का कर रहे अपमान

सड़क किनारे फेंकी गई जिन मूर्तियों की तस्वीरें आप देख रहे हैं..वो उन्हीं देवी देवताओं की प्रतिमाएं हैं जिन्हें लोगों ने कभी अपने घर में स्थापित किया था और उन्हें अपने घर का सदस्य माना था .

ZEE जानकारी: विसर्जन के नाम पर देवी-देवताओं की प्रतिमा का कर रहे अपमान

हिंदू शास्त्रों के मुताबिक हमारा शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है. इन तत्वों के नाम हैं पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु. श्री रामचरितमानस में तुलसी दास कहते हैं कि क्षिति जल पावक गगन समीर पंच रचित यह अधम सरीरा. यानी हमारा शरीर इन्हीं पांच तत्वों से मिलकर बना है इसलिए हमें कभी किसी चीज़ पर अहंकार नहीं करना चाहिए..क्योंकि पंच तत्व से बना ये शरीर मृत्यु के बाद भी इन्हीं पंचतत्वों में विलीन हो जाता है. ये सभी तत्व प्रकृति से जुड़े हैं इसलिए हिंदू धर्म में लगभग सभी त्योहार..प्रकृति के सम्मान के त्योहार माने जाते हैं. यानी प्रकृति का सम्मान..भारत की परंपरा का हिस्सा रहा है. लेकिन अब हम इसी परंपरा को ठोकर मारने लगे हैं और अपने संस्कारों को खंडित करने लगे हैं.

हम अपनी वायु और आकाश को कैसे प्रदूषित कर रहे हैं..ये हम आपको बता चुके हैं. लेकिन हमनें भूमि और जल को भी दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. देश के अलग अलग शहरों में नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए कृत्रिम तालाब बनाए जा रहे हैं ताकि उनमें प्रतिमाओं का विसर्जन किया जा सके . लेकिन विसर्जन के नाम पर देवी और देवताओं की प्रतिमा का अपमान किया जा रहा है. 

हमारे देश में अतिथि को भगवान का दर्जा दिया जाता है.. तो कई त्योहार ऐसे भी हैं..जब हम भगवान को ही एक अतिथि की तरह अपने घर आने का निमंत्रण देते हैं. इस दौरान हम देवी देवताओं की मूर्ति की स्थापना करते हैं. कई दिनों तक उनकी पूजा-अर्चना करते हैं.

लेकिन फिर त्योहार समाप्त हो जाने के बाद.. इन मेहमानों को घर से निकालकर सड़क के किनारे छोड़ देते हैं . आप इसे धर्म के प्रति वो संकीर्ण सोच कह सकते हैं..जिससे सिर्फ मूर्तियां नहीं बल्कि वर्षों से चली आ रही वो परंपरा भी खंडित हो रही है...जिसका मकसद प्रकृति का विनाश नहीं बल्कि उसे बचाकर रखना था .

सड़क किनारे फेंकी गई जिन मूर्तियों की तस्वीरें आप देख रहे हैं..वो उन्हीं देवी देवताओं की प्रतिमाएं हैं जिन्हें लोगों ने कभी अपने घर में स्थापित किया था और उन्हें अपने घर का सदस्य माना था . हमारे देश में परंपराएं निभाने का दिखावा तो किया जाता है..लेकिन कई बार ये दिखावा सिर्फ एक पाखंड से ज्यादा कुछ नहीं होता .

हमारे समाज में माता-पिता को भी भगवान की संज्ञा दी जाती है. लेकिन जब वो बूढ़े हो जाते हैं..तो अक्सर बच्चे उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं या फिर घर से बाहर निकाल देते हैं . इसी तरह हम अपने घर आए भगवानों को भी...मतलब निकल जाने के बाद सड़क किनारे फेंक देते हैं .

पिछले शनिवार को देश के करोड़ों हिंदुओं की आस्था की जीत..सुप्रीम कोर्ट में हुई थी..क्योंकि कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की इजाजत दे दी थी . तब से पूरे देश में खुशियां मनाई जा रही है और भगवान राम की भव्य मूर्तियों के साथ....भव्य मंदिर के निर्माण का सपना देखा जा रहा है . ये सपना तो पूरा हो जाएगा . लेकिन हमारे शहरों में जिस तरह से देवी देवताओं की मूर्तियों का अपमान हो रहा है..उसे देखकर ये सवाल मन में आता है..कि हम भगवान को क्या जवाब देंगे ?

आज हमने देश के कई शहरों से इस खंडित मानसिकता का विश्लेषण किया है . जिस देश के कण-कण में भगवान मौजूद हैं...उस देश के DNA में प्रकृति और प्रभु के अपमान वाली ये सोच कहां से प्रवेश कर गई ?..ये बात आपको हमारा ये विश्लेषण देखकर समझ आ जाएगी .

हमारे देश में नदियों को देवी माना जाता है. और हम इन नदियों में सिर्फ मूर्तियों का विसर्जन ही नहीं करते...बल्कि अपने विचारों और पापों का भी विसर्जन करते हैं . कहा जाता है कि वासुदेव ने भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप को सिर पर उठाकर...यमुना नदी पार कराई थी . तब यमुना नदी ऊफान पर थी...

और वासुदेव धीरे धीरे उसमें डूबते जा रहे थे. लेकिन जैसे ही भगवान कृष्ण के पैरों ने यमुना नदी को छुआ तो उसका ऊफान धीरे धीरे शांत होने लगा . ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि यमुना नदी भगवान के चरण स्पर्श करना चाहती थीं . लेकिन आज हमने उसी यमुना नदी की क्या हालत कर दी है..ये आपको तस्वीरों से समझ आ रहा होगा .

यमुना का पानी पूरी तरह से ज़हरीला हो चुका है. इसमें चारों तरफ सिर्फ ज़हरीला झाग दिखाई देता है. आज अगर भगवान कृष्ण... एक बार फिर यमुना नदी के पास से गुज़रते तो शायद वो भी अपनी नाक बंद कर लेते और इस नदी में पैर डालने के बारे में तो शायद सोचते भी नहीं .

कुल मिलाकर हमने अपने देवी देवताओं को सिर्फ विवाद का मुद्दा बनाया है . उनके नाम पर मंदिर मस्जिद की लड़ाई लड़ी हैं. और इसे राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा भी बना दिया है. लेकिन हमने कभी अपनी जीवन के मूलभूत पांच तत्वों की रक्षा करने के बारे में नहीं सोचा.