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Zee Jaankari: जानिए, आज के दौर में लोग शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहते?

एक ज़माने में भारत विश्व गुरु था, भारत को गुरुओं की भूमि कहा जाता था. भारत की गुरु-शिष्य परंपरा दुनिया भर में प्रसिद्ध थी. लेकिन धीरे धीरे ये परंपरा कहीं खो गई.

Zee Jaankari: जानिए, आज के दौर में लोग शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहते?

हमारा अगला विश्लेषण भारत के करोड़ों शिक्षकों को समर्पित है. जिस तरह हम खबरों का बारीकी से DNA टेस्ट करते हैं, आप को खबर से जुड़ी एक-एक जानकारी देते हैं..और आपके सभी सवालों का जवाब देने की कोशिश करते हैं..कुछ ऐसा ही देश के शिक्षक अपने छात्रों के साथ करते हैं. फर्क सिर्फ ये होता है शिक्षकों को सभी सवालों का जवाब BlackBoard पर देना होता है . और हम ये काम टीवी स्क्रीन पर करते हैं...जिज्ञासाओं को शांत करने, जानकारियों और सवालों का जवाब देने की प्रेरणा हमें शिक्षकों से मिलती है..इसलिए आज शिक्षक दिवस के मौके पर हम देश भर के शिक्षकों को नमन करते हुए इस विश्लेषण की शुरूआत करेंगे.

एक ज़माने में भारत विश्व गुरु था, भारत को गुरुओं की भूमि कहा जाता था. भारत की गुरु-शिष्य परंपरा दुनिया भर में प्रसिद्ध थी. लेकिन धीरे धीरे ये परंपरा कहीं खो गई. आज भारत को दोबारा विश्वगुरू बनाने के लिए एक बार फिर उस परंपरा को जीवित करने की ज़रूरत है. यहां आपको ये भी पता होना चाहिए कि शिक्षक और गुरू के बीच क्या अंतर होता है .शिक्षक आपको जानकारियां देते हैं, परिभाषाएं समझाते हैं . आपको विषय का एक्सपर्ट बनाने की कोशिश करते हैं और आपकी बौद्धिक क्षमता के आधार पर आपको अंक देते हैं . लेकिन एक गुरु आपको जीवन की शिक्षा देता है.

आपको बेहतर इंसान बनाता है और जिंदगी की परीक्षाओं में Pass या Fail होने के आधार पर आपका आंकलन नहीं करता . गुरु के पास जाने वाला शिष्य रूपांतरित होकर लौटता है . क्योंकि गुरु पहले हमें मिटाता है और फिर नए का निर्माण करता है. इसलिए सही मायने में गुरू ही समाज के व्यक्तित्व का निर्माण करता है.

यानी अच्छे गुरुओं और शिक्षकों के बिना किसी भी सभ्य और समृद्ध समाज की कल्पना नहीं की जा सकती. ये सब कुछ बहुत सुंदर और सपनों जैसी बातें लगती हैं . लेकिन यथार्थ की बात करें तो आज हम कुछ सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं . हम ये समझना चाहते हैं कि देश के भविष्य का निर्माण करने वाले शिक्षकों का वर्तमान कैसा है? वो कैसे हालात में इतना बड़ा और महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं? और उन्हें इस काम के बदले में मिलता क्या है? आज हम पूरी शिक्षा व्यवस्था को शिक्षकों की नज़र से देखेंगे .एक ज़माने में प्राचीन भारत के नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों से ज्ञान का जो सूरज निकलता था, उससे पूरा विश्व रोशन होता था .

तक्षशिला विश्वविद्यालय के कुछ प्रसिद्ध छात्र थे..आयुर्वेद के जनक... चरक, व्याकरण के जनक पाणिनी, अर्थशास्त्री और दार्शनिक चाणक्य और सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य . चीन के महान दार्शिक Hiuen Tsang (ह्वेन त्सांग) नालंदा विश्वविद्लाय के छात्र थे. उन्होंने यहां बौद्ध धर्म की शिक्षा हासिल की थी . Hiuen Tsang ने नालंदा में अपने गुरु शैलभद्र को अतुलनीय बताया था .

यहां तिब्बत, चीन, कोरिया और इंडोनिशिया जैसे देशों से भी छात्र शिक्षा ग्रहण करने आते थे . भारत की गुरु-शिष्य परंपरा दुनिया भर में प्रसिद्ध थी . लेकिन धीरे धीरे ये परंपरा कहीं खो गई. आज भारत को दोबारा विश्वगुरू बनाने के लिए एक बार फिर उस परंपरा को जीवित करने की सख्त आवश्यकता है . अंग्रेज़ी की एक मशहूर कहावत है कि...Teaching is one profession that creates all other professions.यानी शिक्षा अकेला ऐसा पेशा है, जो बाकी सभी पेशों को जन्म देता है . लेकिन आज शिक्षक दिवस के मौके पर सवाल ये है कि आज के युग में कोई शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहता?

आप भी स्कूल या कॉलेज से पढ़कर निकले हैं. लेकिन इसके बाद भी आपने शायद शिक्षक बनने के बारे में नहीं सोचा होगा . इसकी वजह ये है कि शिक्षक बनने में कोई ग्लैमर नहीं है... पैसा नहीं है. सवाल ये है कि ऐसा क्यों है? हम आपके साथ मिलकर इसका जवाब ढूंढना चाहते हैं और इसके लिए हम कुछ आंकड़ों की मदद लेंगे . इस वक्त देश की 50% से ज्यादा आबादी 25 साल से कम की है. ऐसा अनुमान है कि 2020 तक भारत की औसत आयु 29 साल होगी . यानी भारत के पास युवा आबादी वाला शक्ति-कुंज है. लेकिन अगर इस आबादी को अच्छी शिक्षा नहीं मिली तो ये शक्तिकुंज एक ज्वालामुखी में बदल जाएगा .

इस युवा आबादी को शिक्षित करने की जिम्मेदारी शिक्षकों के ऊपर है. लेकिन पूरे देश में शिक्षकों की भारी कमी है. आज के दौर में लोग शिक्षक नहीं बनना चाहते और अपने बच्चों को भी शिक्षक बनाने के बजाए कुछ और बनाना चाहते हैं. वर्ष 2018 में दिए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में सरकारी शिक्षकों के करीब 10 लाख पद खाली हैं. हालात ये हैं कि एक Class में 28 बच्चों पर 1 टीचर होना चाहिए, लेकिन कई सरकारी स्कूलों में एक-एक Class में 100 से ज्यादा बच्चे हैं.  देश की 69 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है. इसलिए ग्रामीण इलाकों में शिक्षा पर ज्यादा FOCUS करने की आवश्यकता है. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है.

देश में 13% शिक्षक Contract पर हैं. ये ऐसे Teachers हैं, जिन्हें बहुत कम पैसा मिलता है. और इनमें से बहुत से शिक्षक Qualified भी नहीं हैं. Teachers' Eligibility Test को सिर्फ 17% लोग ही Clear कर पाते हैं. इसीलिए ज़्यादातर राज्य सरकारों ने इस Test को ही खत्म कर दिया है. यानी इस दौर में शिक्षकों की काबिलियत भी सवालों के घेरे में है. भारत शिक्षा पर GDP का 4.6 प्रतिशत खर्च करता है . हालांकि पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले इसमें थोड़ा सुधार हुआ है लेकिन अब भी ये कई देशों के मुकाबले बहुत कम है . Iceland, Norway और Zimbabwe जैसे देश शिक्षा पर GDP का साढ़े सात प्रतिशत से ज्यादा खर्च करते हैं .

यानी शिक्षा में सुधार को देश की सबसे बड़ी मुहिम बनाया जाना चाहिए . भारत में इस वक्त Higher Secondary तक के स्कूलों में करीब 87 लाख शिक्षक हैं . इनमें से कई शिक्षक बहुत ईमानदारी और निष्ठा से अपना काम करते हैं . ऐसे ही 46 शिक्षकों को इस वर्ष भारत के राष्ट्रपति द्वारा...National Teacher Award यानी राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार दिया गया है . लेकिन आप सोचिए इतने बड़े देश के करोड़ों शिक्षकों में से सिर्फ इन 46 टीचर्स को ही सम्मान का हकदार माना गया है. यानी हमारे देश में ना सिर्फ शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की ज़रूरत है, बल्कि अच्छे शिक्षकों के निर्माण पर भी ध्यान देना होगा .

क्योंकि सिर्फ प्रशस्ति पत्र, ट्रॉफी, और कुछ इनामी राशि से देश का भविष्य नहीं सुधारा जा सकता .अब सवाल ये है कि भारत में कोई व्यक्ति शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहता है? इसका जवाब ये है कि हमारे देश में शिक्षकों को अच्छा वेतन नहीं मिलता. सरकारी प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों को 30 हज़ार से लेकर 40 हज़ार रुपये प्रति महीने तक की Salary मिलती है. जबकि देश में Secondary और Higher Secondary स्कूल के शिक्षकों को इनसे थोड़ा ज्यादा पैसा मिलता है. इसके अलावा अस्थाई और Ad-Hoc शिक्षकों को औसतन सिर्फ 10 से 20 हज़ार रुपये तक की सैलरी मिलती है .

अब ज़रा ये भी जान लीजिए कि विदेशों में शिक्षकों को कितना वेतन मिलता है. सिंगापुर में स्कूलों में एक शिक्षक को औसतन 3 लाख रुपये महीना मिलते हैं. जबकि दक्षिण कोरिया, अमेरिका, जर्मनी और जापान में स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों को औसतन करीब ढाई लाख रुपये प्रति महीने की Salary मिलती है. United Kingdom में ये टीचरों की सैलरी का औसत 2 लाख रुपये प्रति महीना है . यानी हमारे देश के शिक्षकों पर उम्मीदों का ज़बरदस्त बोझ है, और उन्हें दुनिया के पैमानों पर अच्छा वेतन भी नहीं मिलता. इस बात ने गुरु शिष्य परंपरा को बहुत नुकसान पहुंचाया है. वर्ष 1830 में भारत में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत हुई थी .

जबकि दुनिया में इसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी में हुई थी . पिछले करीब 190 वर्षों में भारत की शिक्षा व्यवस्था में तो बदलाव हुआ है. लेकिन शिक्षा देने और ग्रहण करने के तरीके शायद ही बदले हैं . आने वाले कुछ वर्षों में दूसरी नौकरियों की तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी Artificial Intelligence और Robots.. इंसानों पर भारी पड़ने लगेंगे . ऐसे में शिक्षकों की भूमिका सीमित हो जाएगी .

लेकिन तब भी इन शिक्षकों पर एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी . शिक्षकों को छात्रों के Emotional intelligence और Mental Resilience पर काम करना होगा . Emotional intelligence की मदद से कोई व्यक्ति अपनी भावनाओं को काबू करना सीखता है. और Mental Resilience का अर्थ है संकटों से उबरने की क्षमता . मशहूर लेखक और इतिहासकार.. Yuval Noah Harari मानते हैं कि Technology में तेज़ी से होते बदलाव.. भविष्य की शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह बदल देंगे . हो सकता है कि आने वाले दिनों में स्कूलों में शिक्षकों की आवश्यकता ही ना रहें .

Yuval Noah Harari ये भी मानते हैं कि आने वाले वक्त में Artificial Intelligence की मदद से इंसानों को भी Hack किया जा सकेगा . इसलिए भविष्य की शिक्षा व्यवस्था दोधारी तलवार की तरह होगी..जहां से Smart और intelligent छात्र तो निकलेंगे , लेकिन हो सकता है कि उनका व्यक्तित्व किसी Computer का गुलाम हो . इस विषय पर आपको Facebook के संस्थापक..mark zuckerberg और Yuval Noah Harari के बीच बातचीत का ये अंश ज़रूर सुनना चाहिए . आज हम आपको भारत के कुछ ऐसे ही गुरुओं के बारे में बताना चाहते हैं..जिन्होंने भारत को विश्व गुरु बनाया था.

सबसे पहला नाम है आज से करीब ढाई हज़ार वर्ष पहले पैदा हुए सिद्धार्थ..जिन्होंने अपना राजसी वैभव छोड़कर ज्ञान की तलाश शुरू की और बाद में भगवान बुद्ध कहलाए..उन्होंने कहा था कि सत्य की खोज करने के लिए प्रश्न पूछने चाहिए..और सही उत्तर की तलाश में अगर भटकना भी पड़े तो संकोच नहीं करना चाहिए .चाणक्य एक ऐसे ही शिक्षक थे..जिन्होंने राजनीति और अर्थ शास्त्र के मायने बदल दिए..उन्होंने एक साधारण बालक को सम्राट बना दिया था और विचार को व्यवहार में बदलने की शिक्षा दी थी. करीब 2300 वर्ष पहले विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की रचना की और शिक्षा देने के लिए कहानियों का उपयोग किया...

विष्णु शर्मा ने शिक्षा के ज़रिए तीन राजकुमारों को, योग्य प्रशासक के रूप में तब्दील कर दिया था. पांचवी सदी में आर्यभट्ट ने गणित और खगोल शास्त्र के क्षेत्र में ऐतिहासिक खोजें कीं...आर्यभट्ट ने ही दुनिया को शून्य का ज्ञान दिया. भारत को विश्वगुरु बनाने में आर्यभट्ट की बहुत बड़ी भूमिका थी. आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने देश में शास्त्रार्थ की परंपरा शुरू की. उन्होंने जीवन में तर्क को सबसे ऊंचा दर्जा दिया और सत्य की खोज करने वालों के लिए 4 पीठों की स्थापना की. 15वीं सदी में पैदा हुए कबीर भी एक ऐसे ही शिक्षक थे..जिन्होंने सरल दोहों के माध्यम से समाज की बुराईयों पर कटाक्ष किया और लोगों को सही तरीके से जीवन जीने की शिक्षा दी .

ये वो गुरू हैं, जिन्होंने भारत वर्ष का निर्माण किया, भारत को नई दिशा दी..इन सभी महापुरुषों का जीवन आधुनिक शिक्षकों के लिए एक संदेश है..क्योंकि शिक्षा के माध्यम चाहे जितने भी आधुनिक हो जाएं..शिक्षा की मूल भावना हमेशा एक ही रहती है. हमारे देश की विडंबना ये भी है कि शिक्षकों से उनके अपने काम के साथ साथ और भी बहुत तरह के काम करवाए जाते हैं. चुनाव कोई भी हो ड्यूटी हमेशा शिक्षकों की ही लगती है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. लोकतंत्र में चुनावों को बहुत महत्व दिया जाता है. और देश के हर राज्य में चुनावों को निपटाने का काम शिक्षक ही करते हैं. हर 10 वर्षों में सरकार Census भी करवाती है. देश के हर व्यक्ति के बारे में तरह तरह के आंकड़े लिए जाते हैं.

गांव गांव जाकर इस काम को करने की ज़िम्मेदारी भी हमारे देश के शिक्षकों को ही दी जाती है. इसके अलावा सरकार की बहुत सी सरकारी योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर लागू करवाने का काम भी शिक्षकों को ही दिया जाता है. पोलियो उन्मूलन अभियान के तहत भारत के हर घर में जाकर छोटे बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने की ज़िम्मेदारी भी शिक्षकों को जाती है. ये एक तरह का ओवरटाइम है. और इस ओवरटाइम से पूरी शिक्षा व्यवस्था का बहुत नुकसान होता है.