ZEE जानकारी: महाराष्ट्र में अटकाने-लटकाने-भटकाने का दांव फेल?

महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों का नतीजा आए 19 दिन बीत चुके हैं. लेकिन 19 दिनों के बाद भी महाराष्ट्र में नहीं बन पाई है. 

ZEE जानकारी: महाराष्ट्र में अटकाने-लटकाने-भटकाने का दांव फेल?

आज सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव की 550वीं जयंती है. और DNA की शुरुआत हम आपको गुरु पर्व की बधाई देकर करना चाहते हैं. जिस दौर में गुरु नानक देश, और दुनिया में घूमकर लोगों को प्रेम, सद्भाव और एकता की शिक्षा दे रहे थे...उसी दौर में दिल्ली में मुगल बादशाहों को सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने के लिए कई प्रकार के अनैतिक गठबंधन किए जा रहे थे . और सत्ता के लालच के सामने कुछ लोगों ने अपना ईमान तक बेच दिया था . कहा जाता है कि देश के राजनैतिक हालात देखकर गुरु नानक भी काफी व्यथित हो गए थे और उनका मानना था कि सच्चा शासक वही होता है जो अपनी जनता की भावनाओं का सम्मान करता है.

देश से मुगल चले गए, अंग्रेज़ भी चले गए, लेकिन देश में सत्ता सुख भोगने का लालच नहीं गया और आज लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए नेता भी जनता की भावनाओं का सम्मान नहीं कर रहे हैं. इन नेताओं को सिर्फ सत्ता का शिखर दिखाई दे रहा है जिसे हासिल करने के लिए ये लोग जनादेश का भी अपमान कर रहे हैं.

महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों का नतीजा आए 19 दिन बीत चुके हैं. लेकिन 19 दिनों के बाद भी महाराष्ट्र में नहीं बन पाई है. जिस राज्य के मतदाताओं ने ईमानदारी से वोट किया . खंडित जनादेश भी नहीं दिया, और अपना फैसला साफ साफ भाषा में सुना दिया उस राज्य की जनता को अपनी ईमानदारी के बदले में राष्ट्रपति शासन मिला है .

यानी जो महाराष्ट्र देश की अर्थव्यवस्था का केंद्र है...वो अब नेताओं की राजनीतिक महत्वकांक्षा के केंद्र में बदल गया है . आज महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है..लेकिन सरकार बनाने के लिए हो रही जोड़-तोड़ में कोई कमी नहीं आई है . NCP, शिवसेना और कांग्रेस अभी भी महाराष्ट्र में सरकार बनाने की रेस में शामिल हैं. लेकिन सत्ता की इस Photo Finish वाली दौड़ में जनता के हित कहीं पीछे छूट गए हैं .

आज NCP और कांग्रेस ने एक joint प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की . इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों पार्टियों के तमाम बड़े नेता मौजूद थे . इनमें NCP के अध्यक्ष शरद पवार, कांग्रेस नेता अहमद पटेल...मल्लिका अर्जुन खड़गे और NCP के नेता प्रफुल्ल पटेल शामिल थे . इस साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दोनों पार्टियों की तरफ से कहा गया है कि गठबंधन को लेकर...अभी कोई फैसला नहीं किया गया है और शिवसेना के साथ कुछ विशेष बिंदुओं पर चर्चा करने के बाद ही...कोई निर्णय लिया जाएगा .

ऐसा लग रहा है कि चर्चा के ये विशेष बिंदू शायद...सत्ता के बंटवारे से जुड़े हैं और सबसे बड़ा विवाद मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर ही है . महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीति को देखकर कहा जा सकता कि शायद ज्यादातर नेताओं के लिए सत्ता का मतलब सिर्फ अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति करना है . और जनता के हितों से किसी को कोई सरोकार नहीं है . कांग्रेस को लग रहा है कि बीजेपी ने केंद्र में सत्ता का दुरुपयोग करते हुए राष्ट्रपति शासन लगाया है..तो शिवसेना इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट चली गई है .

यहां हमें गुरु नानक जी के जीवन से जुड़ी एक और कथा याद आ रही है, जो इन नेताओं के लिए भी सबक होनी चाहिए .एक बार गुरु नानक तराजू से अनाज तौलकर ग्राहक को दे रहे थे इस बीच गिनते-गिनते जब वो 11, 12, 13 पर पहुंचे तो उन्हें कुछ अनुभूति हुई . वो तौलते गए और 13 के बाद.. ‘तेरा फिर तेरा और सब तेरा ही तेरा’ कहते गए .

इस घटना के बाद वो मानने लगे थे कि ‘जो कुछ है वो परम बह्म्र का है, मेरा क्या है?’ लेकिन महाराष्ट्र में राजनीति करने वाले नेता सिर्फ मेरा और मेरा की रट लगाए हुए हैं..उन्हें जनादेश से कोई मतलब नहीं हैं, क्योंकि शायद ज्यादातर नेताओं के लिए सत्ता अब जनता की सेवा का माध्यम नहीं..बल्कि कुर्सी का सुख भोगने का ज़रिया बन गई है.

NCP और कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि बीजेपी ने शिवसेना को धोखा दिया है. महाराष्ट्र में विधानसभा की कुल 288 सीटे हैं और सरकार बनाने वाली पार्टी को 145 सीटें चाहिए .विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 105 सीटें मिली थीं . जबकि शिवसना ने 56 सीटें हासिल की थी. इसी तरह तीसरी सबसे बड़ी पार्टी NCP को 54 सीटें मिलीं . जबकि चौथे नंबर पर रहने वाली कांग्रेस ने 44 सीटें जीतीं . ज़ाहिर है जनता ने कुल 161 सीटें देकर अपना जनादेश बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन के पक्ष में सुनाया था .

लेकिन आज नेताओं ने इस जनादेश को ठोकर मार दी है . देश के इतिहास में ऐसा शायद पहली बार हो रहा है जब बहुमत हासिल करने वाला गठबंधन सरकार बनाने में विफल रहा है. और ये सिर्फ इसिलए हो रहा है क्योंकि सभी पार्टियों की नज़र मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है .

शिवसेना, बीजेपी, NCP और कांग्रेस के प्रवक्ता और नेता.. News चैनलों पर बहस कर रहे हैं. मौजूदा हालात के लिए एक दूसरे को दोषी ठहरा रहे हैं . जनादेश को अपने अपने हिसाब से पढ़ रहे हैं..लेकिन इनमें से कोई भी ...आबादी के हिसाब से देश के दूसरे बड़े राज्य और देश की अर्थव्यवस्था में 28 लाख करोड़ रुपये का योगदान करने वाले महाराष्ट्र की जनता को जवाब नहीं दे रहा .

महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास में ये तीसरा ऐसा मौका है. जब वहां राष्ट्रपति शासन लगाया गया है. महाराष्ट्र में पहली बार राष्ट्रपति शासन 1980 में लगाया गया था. 1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने एक साथ नौ राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया था . इन सभी राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें थीं . ये इंदिरा गांधी द्वारा की गई बदले की कार्रवाई थी . क्योंकि 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने ...कांग्रेस शासित 12 राज्यों की सरकारों को इसी तरीके से बर्खास्त कर दिया था .

महाराष्ट्र में वर्ष 2014 में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन लगा था . तब वहां कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे पृथ्वीराज चव्हाण . लेकिन देश के अलग अलग राज्यों में अब तक 133 बार राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है . 1966 से 1977 औऱ 1980 से 1984 के बीच जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं...तब कुल मिलाकर 50 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया था . जबकि 1977 से 1979 के बीच..मोरारजी देसाई की सरकार के दौरान...कुल 16 बार राष्ट्रपति लगाया गया था .

सबसे लंबा राष्ट्रपति शासन...जम्मू कश्मीर में 1990 से 1996 के बीच लगाया था..इसकी कुल अवधि 6 वर्ष और 264 दिन थी . इसके अलावा पंजाब में भी 1987 से 1992 के बीच चार वर्ष और 259 दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया था .

राष्ट्रपति शासन..संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत लगाया जाता है और पहली बार इसका इस्तेमाल 1951 में पंजाब में किया गया था .जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है..तो वहां कि वर्तमान सरकार भंग हो जाती है. और राज्य की कमान...मुख्यमंत्री की जगह राज्यपाल के हाथ में आ जाती है और राज्य से जुड़े सभी फैसले राज्यपाल ही लेते हैं. राज्यपाल को देश के राष्ट्रपति का प्रतिनिधी माना जाता है. इसी लिए इसे राष्ट्रपति शासन कहते हैं.

शुरुआत में राष्ट्रपति शासन 6 महीनों के लिए लगाया जाता है. और इसकी संसद के दोनों सदनों से लेनी पड़ती है. किसी भी राज्य में 3 वर्ष से ज्यादा समय के लिए राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया जा सकता..लेकिन अगर चुनाव आयोग ये लिखकर दे दे..कि अभी राज्य में चुनाव कराना संभव नहीं है..तो फिर इसे और आगे बढ़ाया जा सकता है .

अब आप इस सवाल का जवाब भी ज़रूर जानना चाहेंगे कि महाराष्ट्र में आगे क्या होगा. महाराष्ट्र में फिलहाल चार संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. पहली ये कि शिवसेना, NCP और कांग्रेस मिलकर सरकार बना सकते हैं. शिवसेना के पास 56, NCP के पास 54 औऱ कांग्रेस के पास 44 सीटें हैं . इनका कुल जोड़ 154 बैठता है और सरकार बनाने के लिए 145 सीटे चाहिएं.

दूसरी संभावना ये है कि 105 सीटों वाली बीजपी और 54 सीटों वाली NCP मिलकर सरकार बना लें . जबकि तीसरी संभावना ये है कि कुछ वक्त का इंतज़ार करने के बाद...राज्य में फिर से चुनावों की घोषणा कर दी जाए . और चौथी संभावना ये है कि बीजेपी एक बार फिर शिवसेना के साथ आ जाए .

क्योंकि बीजेपी के नेता नारायण राणे ने ये दावा किया गया है कि बीजेपी 145 का आंकड़ा जुटा सकती है. हालांकि मौजूदा हालात में ये बहुत मुश्किल लग रहा है .महाराष्ट्र के मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रमों का विश्लेषण करने बाद अब आपको ये भी समझ लेना चाहिए फिलहाल राजनीतिक पोडियम पर कौन कहां खड़ा है .

बीजेपी महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे बड़ी विजेता बनकर उभरी है . हालांकि बीजेपी राज्य में सरकार नहीं बना पाई है. लेकिन बीजेपी शिवसेना के दबाव में नहीं आई और नैतिकता से समझौता नहीं किया . सरकार ना बनाने का बीजेपी का फैसला लोगों को अच्छा लग सकता है. राम मंदिर पर आए फैसले का फायदा भी बीजेपी को मिलना तय है . माना जा रहा है कि अगर महाराष्ट्र में अभी चुनाव हो जाए...तो बीजेपी अपने दम पर भी सरकार बना सकती है. यानी बीजेपी हार कर भी बाज़ीगर बन गई है .

वर्तमान स्थिति को देखकर लग रहा है कि सबसे बड़ी हार शिवसेना की हुई है . शिवसेना को पहले उम्मीद थी कि बीजेपी दबाव में आकर समझौता कर लेगी और सरकार चलाने के लिए 50-50 फॉर्मूला पर बात बन जाएगी . लेकिन ऐसा हुआ नहीं . इसके बाद शिवसेना ने NCP और कांग्रेस की तरफ देखना शुरु किया .

ऐसा माना जा रहा है कि NCP चाहती थी कि शिवसेना पहले NDA से बाहर निकलें..फिर गठबंधन पर बात की जाए...NCP से इशारा मिलने के बाद..शिवसेना कोटे से केंद्र में मंत्री अरविंद सावंत ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया . लेकिन फिर NCP पीछे हट गई और शिवसेना का सत्ता तक पहुंचने का सपना टूट गया .

NCP के प्रमुख शरद पवार...इस राजनीतिक पोडियम पर दूसरे नंबर पर खडे हैं . इस पूरे घटनाक्रम के बीच...शरद पवार ने अपनी एक परिपक्व और मंझे हुए नेता वाली छवि बरकरार रखी . इस बीच शरद पवार ने अपने सारे पत्ते कभी नहीं खोले . उन्होंने हमेशा ये कहा कि जनादेश बीजेपी और शिवसेना के साथ है...

और दोनों को मिलकर सरकार बनानी चाहिए . लेकिन शरद पवार कांग्रेस और शिवसेना के बीच..एक पुल की भूमिका भी निभा रहे हैं. वो उद्धव ठाकरे से भी मुलाकात कर चुके हैं तो सोनिया गांधी से भी संपर्क में है . यानी अगर भविष्य में कांग्रेस और शिवसेना साथ आते हैं...तो उसके सूत्रधार शरद पवार ही होंगे

इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस को कोई फायदा तो हुआ नहीं..उल्टा उसके सहयोगियों को ये संदेश गया है कि कांग्रेस एक ऐसी पार्टी है..जो हमेशा दुविधा में रहती है .11 नवंबर को सोनिया गांधी ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक बुलाई..उस बैठक में शिवसेना को समर्थन देने का फैसला नहीं हो पाया .

शाम चार बजे सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र के कांग्रेस नेताओं की बैठक बुलाई.... इसके बाद शाम 5 बजे सोनया गांधी को उद्धव ठाकरे का फोन गया और उन्होंने सोनिया गांधी से समर्थन मांगा . इसके बाद सोनिया गांधी ने 6 बजे शरद पवार को फोन किया . और उसके बाद इस पूरे मामले ने यूटर्न ले लिया और कांग्रेस ने इस पूरे फैसले को टाल दिया .

हालांकि कांग्रेस की स्थिति देखकर हमें भारत के पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह की एक कविता भी याद आ रही है..जिसमें उन्होंने कहा था कि तुम मुझे क्या खरीदोगे..मैं तो मुफ्त हूं . यानी कांग्रेस फिलहाल ऐसी स्थिति में भी नहीं है कि वो अपने मुताबिक कोई राजनैतिक सौदा कर पाए .

कहा जाता है कि इतिहास खुद को बार बार दोहराता है...और राजनीति पर तो ये कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है . इस बार इतिहास खुद को दोहरा रहा है..लेकिन राजनीति के किरदार बदले हुए हैं .

जो स्थिति देश में कभी कांग्रेस की हुआ करती थी..वो आज बीजेपी की है . इमरजेंसी के बाद...कांग्रेस को रोकने के लिए तमाम विपक्षी दल एक हो गए थे . 1989 से पहले कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए तमाम जोड़-तोड़ किए जाते थे . यहां तक कि कई बार दक्षिणपंथी विचारधारा और वामपंथी विचारधारा वाली पार्टियों के बीच भी गठबंधन हो जाता था .

1977 में कांग्रेस विरोध के नाम पर जब पहली बार जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसमें जनसंघ शामिल था..और वामदल उसे बाहर से समर्थन दे रहे थे . इसी तरह 1989 के चुनाव में भी कांग्रेस के खिलाफ बने गठबंधन में बीजेपी और लेफ्ट पार्टियां शामिल थीं .

यानी हमारे देश में जब भी किसी दल को हराना एक पार्टी के लिए मुश्किल हो जाता है...तो तमाम विरोधी विचारधारा वाले दल भी उसके खिलाफ एक गठबंधन बना लेते हैं . पहले ऐसा कांग्रेस के खिलाफ हुआ करता था और अब यही बीजेपी के खिलाफ हो रहा है .

एक ज़माना था..जब देश में इंदिरा गांधी का कद इतना बड़ा हो गया था कि उन्हें सत्ता से बेदखल करने के लिए...देश के बाकी सभी राजनैतिक दलों ने हाथ मिला लिया था . और आज नरेंद्र मोदी को सत्ता से दूर रखने के लिए भी ऐसा ही किया जा रहा है .

वर्ष 2015 में बिहार में भी बीजेपी को सत्ता से दूर करने के लिए जेडीयू, आरजेडी. कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां एक साथ आ गई थीं ...और इनमें एक दूसरे को अपना राजनीतिक दुश्मन मानने वाले लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार भी शामिल थे .

इसी तरह कर्नाटक में भी बीजेपी को रोकने के लिए जेडीएस, कांग्रेस, बीएसपी और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने चुनाव के बाद गठजोड़ कर लिया था . जबकि चुनाव में ये सभी पार्टियां एक दूसरे के खिलाफ लड़ रही थीं .

इसी साल..लोकसभा चुनाव से पहले...एक दूसरे की राजनीतिक दुश्मन रही...समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने उत्तर प्रदेश में एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा था . इनका मकसद भी सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी को हराना था .

यानी ये कोई नई परंपरा नहीं है...भारत की राजनीति में एक नेता के बढ़ते कद से परेशान होने का प्रचलन रहा है. और आज भी तमाम विरोधी पार्टियां उसी प्रथा का अनुसरण कर रही है .