ZEE जानकारी: महाराष्ट्र की बदल गई सियासत, टूट गया बाला साहेब का 'संकल्प'!

आज हम पल-पल रंग बदलती..महाराष्ट्र की राजनीति का एक Black And White विश्लेषण करेंगे . जब आप किसी विषय को श्वेत और श्याम दृष्टि से देखते हैं तो आपको हर सवाल का जवाब मिल जाता है .

ZEE जानकारी: महाराष्ट्र की बदल गई सियासत, टूट गया बाला साहेब का 'संकल्प'!

आज हम पल-पल रंग बदलती..महाराष्ट्र की राजनीति का एक Black And White विश्लेषण करेंगे . जब आप किसी विषय को श्वेत और श्याम दृष्टि से देखते हैं तो आपको हर सवाल का जवाब मिल जाता है .लेकिन विश्लेषण की शुरुआत में आपको आज की सबसे रंगीन तस्वीरें सबसे पहले देखनी चाहिए . ये तस्वीरें मुंबई के शिवाजी पार्क की हैं, जहां शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने आज महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली . उनके साथ कांग्रेस और NCP के 6 विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली. ये तस्वीरें शिवसेना के 53 वर्षों के इतिहास की शायद सबसे विचित्र तस्वीर है.

हम इस अभूतपूर्व राजनैतिक घटना का पूरा विश्लेषण करेंगे लेकिन उससे पहले आज शिवसेना के संस्थापक बाला साहब ठाकरे की बात करना भी ज़रूरी है .आज लोग इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि ये तस्वीरें देखकर बाला साहब ठाकरे खुश होते या दुखी . ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि आज शिवसेना ने बाला साहब ठाकरे के सिद्धातों को पूरी तरह से पलट दिया है .

लेकिन बाला साहब ठाकरे के सिद्धांत थे क्या...वो इस तरह के गठबंधन को लेकर क्या सोचते थे ये समझने के लिए आपको उनके वर्ष 2002 और 2004 के दो बयान सुनने चाहिए . तब बाला साहब ठाकरे ने Zee News पर अनैतिक गठबंधन वाली राजनीति की व्याख्या की थी . आज उस इंटरव्यू को दोबारा देखने का सबसे सही दिन है .

आज से 15 वर्ष पहले बाला साहब ठाकरे कहते थे कि इस तरह का गठबंधन करके..वो जनता को क्या मुंह दिखाएंगे . लेकिन अब उन्हीं के पुत्र उद्धव ठाकरे NCP और कांग्रेस से गठबंधन कर चुके हैं . और महाराष्ट्र की जनता इस नए युग की राजनीति को बहुत करीब से देख रही है. टाइगर यानी बाघ शिवसेना का एक प्रमुख चिन्ह है . बाला साहब के व्यक्तित्व की तुलना भी बाघ से की जाती थी. जब बाल ठाकरे जीवित थे तो लोग कहते थे कि टाइगर जिंदा है और आज की स्थिति देखकर लोग कह रहे हैं कि टाइगर शर्मिंदा है.

आज मुंबई के शिवाजी पार्क से आईं तस्वीरें राजनैतिक विज्ञान यानी Political Science के छात्रों के बहुत काम आएंगी . हालांकि राजनैतिक विज्ञान और असली विज्ञान में अंतर ये है कि ...विज्ञान पूर्णत: सिद्धांतों पर आधारित होता है और राजनीति... सिद्धांतों से समझौता करने की कला बन गई है .

राजनीति में सिद्धांतों को कैसे निर्वासन मिल गया है ..ये समझने के लिए आपको 53 वर्ष पहले की कुछ Black And White तस्वीरें भी देखनी चाहिए . ये तस्वीरें भी शिवाजी पार्क की हैं . जहां 1966 में शिवसेना की स्थापना के बाद.. बाला साहब ठाकरे ने पहली रैली की थी . कहा जाता है कि वो इस रैली को किसी छोटी सी जगह पर संबोधित करना चाहते थे.

क्योंकि उन्हें इस बात का यकीन नहीं था कि रैली में कितने लोग आएंगे . लेकिन साथियों के समझाने पर वो शिवाजी पार्क में भाषण देने के लिए तैयार हुए और उस दिन बाला साहब ठाकरे को सुनने के लिए शिवाजी पार्क में करीब 4 लाख लोग मौजूद थे . इस रैली के लिए कोई विज्ञापन नहीं निकाला गया था. पोस्टर्स भी नहीं लगाए गए थे. और कुछ खास प्रचार भी नहीं हुआ था . उस वक्त बाला साहब ठाकरे ने अपनी मैगज़ीन मार्मिक में इस रैली को लेकर सिर्फ एक छोटा सा नोटिस छापा था .

लेकिन जब रैली शुरु हुई तो शिवाजी पार्क पूरी तरह से भर चुका था और महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई ताकत का उदय हो गया. था ...जिसका नाम था शिवसेना . और आज उसी शिवाजी पार्क में दोबारा ठाकरे परिवार की राजनीति का उदय हुआ है . और उद्धव ठाकरे इस नए युग की राजनीति के झंडा बरदार बन गए हैं .

शिवाजी पार्क में आज भी बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे . शपथ के बाद महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भाषण दिया . लोगों ने तालियां भी बजाई . लेकिन 53 वर्ष पहले की और आज की तस्वीरों में एक बहुत बड़ा अंतर था . जब बाला साहेब ठाकरे ने शिवसेना की स्थापना की थी..तो उनका उद्देश्य मराठी मानुष के हितों की रक्षा करना था . उन्होंने मराठी में एक नारा दिया था . वो नारा था

अंशी टके समाजकरण, वीस टके राजकरण .यानी 80 प्रतिशत समाज की बात..और 20 प्रतिशत राजनीति की बात...लेकिन 53 वर्षों के बाद..आज शिवसेना 100 प्रतिशत शुद्ध राजनीति की बात कर रही है .बाला साहेब ठाकरे या उनके परिवार के किसी सदस्य ने कभी कोई राजनैतिक पद नहीं संभाला . सत्ता से बाहर रहकर...सत्ता का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखना ...ठाकरे परिवार की परंपरा रही है . लेकिन कभी रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाने वाले उद्धव ठाकरे अब खुद.. कांग्रेस और NCP की गठबंधन वाली बैटरी के दम पर मुख्यमंत्री बन गए हैं और हिंदुत्ववादी शिवसेना सेक्युलर हो गई है .

अब आपको दो तस्वीरें और दिखाते हैं . पहली तस्वीर शिवसेना के मुखपत्र सामना की है. जिसमें आज पहले पन्ने पर खबर छपी है कि उद्धव ठाकरे आज..महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे और दूसरी तस्वीर 5 दशक पहले की है . जब बाला साहब ठाकरे ने अपनी मैगज़ीन मार्मिक में..महाराष्ट्र के हालात को लेकर एक कार्टून छापा था .

इस कार्टून में बाला साहब ठाकरे ने ये बताने की कोशिश की थी ..कि कैसे महाराष्ट्र की सभी राजनीतिक पार्टियां, व्यापारी और उद्योगपति मिलकर...मराठी मानुष का शोषण कर रहे हैं . लेकिन आज 50 वर्षों के बाद..बाला साहब ठाकरे के उत्तराधिकारी..उद्धव ठाकरे..विरोधी विचारधारा वाली पार्टियों के साथ मिलकर ही सरकार बना रहे हैं .

हिंदुत्व और मराठी मानुष की बात करने वाली शिवसेना ने ही सिर्फ अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया है . बल्कि धर्मनिरपेक्षता की चैंपियन होने के दावा करने वाली कांग्रेस ने भी बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए अपने सिद्धांतों को ठोकर मार दी है .

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी आज उद्धव ठाकरे के शपथ ग्रहण समारोह में तो नहीं गए. लेकिन दोनों ने चिट्ठियां लिखकर उद्धव ठाकरे को शुभकामनाएं दी हैं. सोनिया गांधी ने अपनी चिट्ठी में लिखा है वो इस कार्यक्रम में आने में असमर्थ है . लेकिन सोनिया गांधी आगे लिखती हैं कि कांग्रेस, NCP और शिवसेना..असाधारण परिस्थितियों में एक साथ आई हैं . वो आगे लिखती हैं कि.

ये ऐसा समय है जब देश बीजेपी से अभूतपूर्व खतरे का सामना कर रहा है . देश का राजनीतिक माहौल पूरी तरह से ज़हरीला हो गया है और अर्थव्यवस्था चौपट हो गई है..इसलिए किसानों और गरीबों के हित में तीनों पार्टियों ने एक साथ आने का फैसला किया है . यानी कांग्रेस देश के राजनीतिक माहौल का बहाना बनाकर...शिवसेना से अपने अनैतिक गठबंधन को जायज़ ठहराना चाहती है .

इसी तरह राहुल गांधी ने भी उद्धव ठाकरे के नाम एक चिट्ठी लिखी है . उन्होंने भी शपथ ग्रहण समारोह में आने में असमर्थता जताई है लेकिन उद्धव ठाकरे को बधाई देते हुए राहुल गांधी ने ये ज़रूर कहा है कि वो महाराष्ट्र में एक धर्मनिरपेक्ष और स्थिर सरकार की कामना करते हैं . आपको यहां राहुल गांधी द्वारा प्रयोग किए गए Secular शब्द पर गौर करना चाहिए . कांग्रेस शायद अब इस शब्द का इस्तेमाल सिर्फ चिट्ठियों में ही कर पाएगी..क्योंकि असल में तो कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता को सत्ता की खातिर तलाक दे दिया है .

आज आपको राहुल गांधी और सोनिया गांधी के कुछ पुराने भाषणों के अंश सुनने चाहिए . इन भाषणों में राहुल और सोनिया गांधी... धर्मनिरपेक्षता को लेकर बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं और शिवसेना को देश को बांटने वाली और मौका परस्त पार्टी बता रहे हैं . ये बयान सुनकर आप समझ जाएंगे कि राजनीति में.. कथनी और करनी में कितना बड़ा अंतर होता है .

आजकल देश में राजनीति से जुड़ी एक और तस्वीर की चर्चा हो रही है . ये तस्वीर उद्धव ठाकरे के बेटे...आदित्य ठाकरे की है . आदित्य कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को..शपथ ग्रहण समारोह में आने का न्योता देने गए थे . इसे लोग New Normal In Politics भी कह रहे हैं . यानी अब राजनीति में विपरित ध्रुवों का मिल जाना...सामान्य घटना बनता जा रहा है .

आज से 21 वर्ष पहले यानी 1998 में बाला साहेब ठाकरे ने एक रैली में कांग्रेस की चरण वंदना करने वालों पर एक टिप्पणी की थी . आप उनका ये बयान सनिए फिर हम अपने विश्लेषण को आगे बढ़ाएंगे . आज आपको 349 साल पहले महाराष्ट्र में घटी एक घटना की जानकारी भी हम देना चाहते हैं . 1670 में शिवाजी महाराज के घनिष्ठ मित्र और मराठा योद्धा तानाजी मालुसरे ने शिवाजी के लिए कोढाना की लड़ाई लड़ी थी . उनकी सेना ने कोढ़ाना तो जीत लिया लेकिन तानाजी शहीद हो गए . तब छत्रपति शिवाजी ने उनकी मौत का समाचार सुनकर कहा था

गढ़ आला पण सिंह गेला . यानी किला तो जीत लिया . लेकिन किला जीतने वाला शेर नहीं रहा. आज महाराष्ट्र की राजनीति देखकर..वहां के लोग...शिवाजी महाराज के इस संवाद को याद कर रहे हैं . आप कह सकते हैं कि आज शिवसेना ने सत्ता का किला तो जीत लिया . लेकिन बाला साहब ठाकरे के सिद्धांत जीवित नहीं रहे .

महाराष्ट्र की सियासत में पिछले 35 दिनों में जो कुछ हुआ..उससे ना सिर्फ देश हैरान है . बल्कि बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक भी अचंभित है . लेकिन जो घटनाक्रम अचंभित ना करे..उसे राजनीति कहना भी मुश्किल है . इसलिए आज हम आपको नए युग की इस राजनीति का सार... चार Points में समझना चाहिए .

पहला प्वाइंट ये है कि देश की राजनीति में एक बार फिर परिवारवाद की वापसी हो गई है . शिवसेना, कांग्रेस और NCP की पूरी राजनीति एक बार फिर परिवारवाद पर केंद्रित हो गई है .

दूसरा प्वाइंट ये है कि शिवसेना ने हिंदुत्व के मुद्दे को पूरी तरह से खो दिया है .

तीसरा प्वाइंट ये है कि कांग्रेस और NCP ने धर्मनिरपेक्षता को खो दिया है .

और चौथा प्वाइंट ये है कि बीजेपी ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को खो दिया है .

कुल मिलाकर...राजनीति में सिद्धांतों ने इस बार दम तोड़ दिया है .

शिवसेना, NCP और कांग्रेस के इस गठबंधन को महा विकास अघाड़ी नाम दिया गया है . लेकिन विकास के नाम पर बनी इस अघाड़ी से हमारे कुछ सवाल हैं .पहला सवाल ये है कि महाराष्ट्र में पूरे चुनाव प्रचार के दौरान बीजपी ने देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव लड़ा तब शिवसेना क्यों चुप रही ? . बीजेपी शुरू से देवेंद्र फड़णवीस को महाराष्ट्र का अगला सीएम बताती रहीं..तब शिवसेना चुप क्यों रही ?

दूसरा सवाल ये है कि आज बीजेपी का विरोध करने वाली शिवसेना के विधायकों ने..प्रधानमंत्री मोदी के पोस्टर लगाकर...वोट क्यों मांगे और तीसरा सवाल ये कि जब NCP - कांग्रेस के गठबंधन को चुनाव में 98 सीटें मिली तो फिर सिर्फ 56 सीटों वाली शिवसेना का मुख्यमंत्री क्यों बनाया गया . क्या ये राजनीतिक खरीद-फरोख्त नहीं है .

कुल मिलाकर...बीजपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जा सकती है . पिछले 2 साल में ये महाराष्ट्र की राजनीति इसका दूसरा उदाहऱण है .कांग्रेस ने कर्नाटक भी इसी तरह से सरकार बनवाई थी . तब 80 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए 37 सीटों वाली JDS के कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बना दिया था .

लेकिन ये सरकार 1 वर्ष के अंदर ही गिर गई . 2018 में कर्नाटक में उस मंच पर कांग्रेस की तरफ से सोनिया गांधी और राहुल गांधी, BSP से मायावती, समाजवादी पार्टी से अखिलेश यादव, RJD से तेजस्वी यादव, आम आदमी पार्टी से अरविंद केजरीवाल और TMC से ममता बनर्जी मौजूद थीं . लेकिन आज महाराष्ट्र में नई सरकार के शपथग्रहण समारोह में भी इन नेताओं में से कोई भी मौजूद नहीं था .