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Zee Jaankari: जिम्मेदारी की सड़क पर सिर्फ जनता का चालान कटेगा, सिस्टम का नहीं?

भारत में पिछले 105 वर्षों से लोगों से ट्रैफिक नियमों का पालन कराने की कोशिश की जा रही है. लेकिन ये कोशिशें कितनी बुरी तरह विफल रही हैं, इसका सबसे अच्छा उदाहरण देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा है.

Zee Jaankari: जिम्मेदारी की सड़क पर सिर्फ जनता का चालान कटेगा, सिस्टम का नहीं?

और दुनिया के 30 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से 22 भारत के हैं .यानी भारत का कोई भी शहर प्रदूषण से मुक्त नहीं है. फिर भी हमारे देश में वाहन चालक प्रदूषण की जांच कराने को अपना कर्तव्य नहीं बल्कि मजबूरी मानते हैं . यातायात नियमों के प्रति लापरवाह दृष्टिकोण रखने की वजह से लोग fitness certificate, driving licence, registration certificate जैसे महत्वपूर्ण कागज भी रखना पसंद नहीं करते, हैरानी की बात ये है कि लोग गाड़ियों का insurance कराना भी जरुरी नहीं समझते नए कानून ने इसे लोगों की मजबूरी बना दिया है लेकिन मजबूरी में नियमों का पालन करने वाला समाज कभी भी मजबूत राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकता .भारत में ट्रैफिक से जुड़ा पहला कानून वर्ष 1914 में बना था . इसके बाद वर्ष 1939 में इसमें बदलाव किया गया और फिर वर्ष 1989 में Motor Vehicles Act, 1988 लागू हुआ..इसी में संशोधन करके वर्तमान कानून बनाया गया है .

यानी भारत में पिछले 105 वर्षों से लोगों से ट्रैफिक नियमों का पालन कराने की कोशिश की जा रही है. लेकिन ये कोशिशें कितनी बुरी तरह विफल रही हैं, इसका सबसे अच्छा उदाहरण देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा है .जीवन अनमोल होता है, एक व्यक्ति की मृत्यु का सबसे बड़ा नुकसान उसके परिवार को भुगतना पड़ता है .

यातायात नियमों की अनदेखी कर हेलमेट ना पहनना, तेज गति से वाहन चलाना, सीट बेल्ट ना बांधना वैसे तो बहुत ही सामान्य लगता है,लेकिन ये एक गंभीर गलती है, जिसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ती है .भारत विकास के मामले में दुनिया के विकसित देशों को टक्कर तो देना चाहता है. लेकिन वहां के नागरिकों की तरह कानूनों का पालन करने से बचता है . आपको आज ये जरुर जानना चाहिए कि दुनिया के दूसरे देशों में यातायात को लेकर क्या कानून है, आपको ये पता होना चाहिए कि दूसरे देशों में बिना हेलमेट या बिना सीट बेल्ट बांधे गाड़ी चलाना कितना गंभीर अपराध माना जाता है .

स्पेन में बिना लाइसेंस के ड्राइविंग करने पर तीन सौ से लेकर 1500 यूरो यानि करीब 24 हजार से लेकर सवा लाख रुपये तक का जुर्माना लगता सकता है .फिनलैंड में तेज रफ्तार से वाहन चलाने वालों को उनकी सैलरी के आधार पर जुर्माना देना पड़ता है. गति तय सीमा से जितनी ज्यादा होती है, सैलरी का उतना ज्यादा हिस्सा जुर्माने के तौर पर देना होता है, जो अधिकतनम पचास प्रतिशत तक हो सकता है .ब्रिटेन में Over Speeding करने पर 8 हज़ार 500 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है जबकि नशे की हालत में गाड़ी चलाने पर 2 लाख रुपये तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है.इन देशों में अधिकांश लोग यातायात नियमों का पालन करते हैं और ऐसा करके वो खुद के साथ साथ दूसरों का जीवन भी बचाते हैं .

आज आपको एक ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन से जुड़े एक मशहूर केस के बारे में भी पता होना चाहिए .वर्ष 2002 में मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनी Nokia के पूर्व director Anssi Vanjoki ( एन्सी वैनयोकी ) को ...फिनलैंड की राजधानी Helsinki में तेज रफ्तार से बाइक चलाने के आरोप में पकड़ा गया था . और उन पर 91 लाख 49 हज़ार रुपये का जुर्माना लगाया गया था .यानी विकसित देशों में कानून के आगे किसी का रसूख काम नहीं आता . जबकि हमारे देश में आम आदमी ट्रैफिक हवलदार को भी धौंस दिखाने लगता है. और 100 रुपये के चालान से बचने के लिए भी किसी नेता, या बड़े अधिकारी से बात कराने की धमकी भी देने लगता है .

देश के हर नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वो सड़क पर ट्रैफिक नियमों का पालन करेगा . इसी तरह सरकारों से उम्मीद की जाती है कि वो देश के लोगों को सड़कों पर सुरक्षित चलने का स्वराज देंगी . लेकिन हमारे देश में सिर्फ जनता को नियमों के निर्वहन की सीख दी जाती है. सिस्टम और सरकारों का चालान कोई नहीं करता . जब सड़कें चलने लायक ही नहीं हैं...तो फिर नियमों का पालन कहां कराया जाएगा ., फुटपाथ और सड़कों पर जिस तरह से कब्ज़ा किया जाता है उससे वाहनों के चलने के लिए जगह बचती ही कहां है ?Red Light जंप करना कानूनन जुर्म है.

लेकिन हमारे देश में कई चौराहों और Traffic Signals पर आपको ये Lights मृत अवस्था में मिलेंगी . सड़कों पर लोगों को जानकारी देने वाले Sign Boards... दिशा कम बताते हैं..भ्रमित ज्यादा करते हैं. वर्ष 2017 में Institute of Road Traffic Education द्वारा की गई एक Study के मुताबिक दिल्ली के 75 प्रतिशत Traffic Signals, सड़कें और Sign Boards मानकों पर खरे नहीं उतरते .वर्ष 2018 में दिल्ली की 2 हज़ार 200 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़कें अतिक्रमण का शिकार थीं. ये दूरी कश्मीर से कन्याकुमारी तक की दूरी के बराबर है .

Google Map की मदद से की गई एक Study के मुताबिक दिल्ली में अब Peak Hour जैसी कोई चीज़ नहीं है . क्योंकि अब सड़कों पर हर वक्त ट्रैफिक का दबाव एक जैसा रहता है . दिल्ली में वाहनों की औसत गति 28 किलोमीटर प्रति घंटा है . यानी हमारे देश में चलने के लिए सड़कें बची ही नहीं है . फिर भी जुर्माना सिर्फ आम लोग भरते हैं जबकि सिस्टम चैन की नींद सोता रहता है. गलत दिशा में वाहन चलाना भी ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन है . लेकिन हमारे देश में सड़कों की हालत या तो बहुत खस्ता है या फिर उस पर अतिक्रमण करने वालों का कब्ज़ा है .

यानी लोगों से गलत दिशा में वाहन ना चलाने की उम्मीद तो की जाती है. लेकिन उन्हें चलने के लिए सड़क मुहैया ही नहीं कराई जाती .अपने गंतव्य तक पहुंचना लोगों की मजबूरी है. और ऐसे में कई बार लोग नियमों का उल्लंघन भी करने को मजबूर हो जाते हैं . हमारे देश में वाहन चालकों को Lane Driving की सलाह दी जाती है. लेकिन ज्यादातर शहरों में आप इन Lanes को ढूंढ ही नहीं पाएंगे...क्योंकि हमारा सिस्टम लोगों पर भारी जुर्माना लगाना तो जानता है लेकिन अपना कर्तव्य निभाना नहीं जानता . भारत के 33 प्रतिशत Highways अभी भी Double Lane से Four Lane होने का इंतज़ार कर रहे हैं . हमारे देश में 6 Lane की सड़कें भी जाम हो जाती हैं .

लोग वक्त पर ऑफिस या घर नहीं पहुंच पाते . आप अपनी याद्दाश्त पर ज़ोर डालिए और याद कीजिए कि आखिरी बार आपने Four Lane की ऐसी कौन सी सड़क देखी थी...जो ट्रैफिक जाम से मुक्त थी .हमारा मानना है कि जिम्मेदारी की सड़क Two way होती है . इसके एक तरफ जनता चलती है और दूसरी तरफ सरकारें और सिस्टम . इनमें से एक सड़क पर भी अगर कर्तव्यों का पालन नहीं होगा तो New India के सपनों पर Brake लग जाएगा .हमारे देश में सरकारें अच्छी सड़कें और परिवहन का अच्छा सिस्टम बना पाएं या नहीं .

वो वोटरों को लुभाने के लिए भारी भरकम डिस्काउंट ज़रूर दे देती हैं . कभी मुफ्त पानी देकर, कभी सस्ती बिजली देकर तो कभी Metro Trains में मुफ्त यात्रा का लालच देकर जनता का वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया जाता है. आज NGT यानी... National Green Tribunal ने दिल्ली में मुफ्त पानी की योजना को लेकर सवाल उठाए हैं .

NGT का कहना है कि इससे पानी का गैरज़रूरी इस्तेमाल हो रहा है और पानी की बर्बादी भी हो रही है . कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी दिल्ली Metro में महिलाओं को मुफ्त यात्रा की सुविधा देने वाली योजना पर टिप्पणी की थी . कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली को सरकार को जनता के पैसे का सही जगह इस्तेमाल करना चाहिए और मुफ्त सुविधाओं का लालच देने से बचना चाहिए .

लेकिन हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट और NGT जैसी संस्थाओं के निर्देश ज्यादातर नेता नहीं मानते. क्योंकि नेताओं को ना तो सरकारी खज़ाने की चिंता होती है और ना ही पर्यावरण जैसे मुद्दों की . free schemes के नाम पर नेता विकास की सड़क पर तुष्टिकरण का तारकोल बिछाते हैं . और अक्सर जनता इस पर फिसल जाती है . इसलिए अब वक्त आ गया है कि सिस्टम और सरकारों ने सवाल पूछे जाएं और मुफ्त.. बिजली, पानी का लालच देने वाले नेताओं को सत्ता के बोझ से ही मुक्त यानी Free कर दिया जाए .