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Zee Jaankari: मृत्यु के बाद भी रिश्तों की अटूट कड़ी है पिंडदान

इस वर्ष पितृ पक्ष 14 सितंबर से शुरू हुआ है और ये 28 सितंबर तक चलेगा. मतलब इस दौरान लोग अपने पितृ यानी मृत पिता, दादा या पूर्वजों का पिंडदान करेंगे .ऐसे में आपके लिए ये जानना बेहद जरूरी है कि पिंडदान क्या है और ये क्यों होता है.

Zee Jaankari: मृत्यु के बाद भी रिश्तों की अटूट कड़ी है पिंडदान

 हम भले ही इस संसार में अकेले आते हैं. लेकिन, हमारी जिंदगी दुनिया के बंधनों में बंधकर कई रिश्तों की कड़ी बन जाती है...और हम उन रिश्तों के साथ पूरा जीवन जीते हैं. हम जबतक जिंदा रहते हैं, रिश्ते नाते साथ साथ चलते हैं, लेकिन, मृत्यु के बाद भी रिश्तों की ये कड़ी अटूट है .हिंदू धर्म के जानकार कहते हैं मृत्यु होने पर सिर्फ शरीर समाप्त होता है, आत्मा नहीं . आत्मा तो शांति और मोक्ष के एक नए सफर पर निकल जाती है. आत्मा के इस नए सफर को आसान बनाने के लिए ही हिंदू धर्म में पिंडदान की शुरुआत हुई . हिंदू कैलेंडर के मुताबिक...पिंडदान के लिए सबसे सही समय.

..हर वर्ष 15 दिनों का होता है. और इसे ही पितृ पक्ष भी कहते हैं . इस वर्ष पितृ पक्ष 14 सितंबर से शुरू हुआ है और ये 28 सितंबर तक चलेगा. मतलब इस दौरान लोग अपने पितृ यानी मृत पिता, दादा या पूर्वजों का पिंडदान करेंगे .ऐसे में आपके लिए ये जानना बेहद जरूरी है कि पिंडदान क्या है और ये क्यों होता है . हिंधू धर्म में इस परंपरा की शुरुआत कब हुई.

और समय की कमी ने कैसे सबकुछ बदल दिया है . अब ताजा खबर ये है कि पिंडदान की Online सेवा शुरू हो गई हैं. लोग घर बैठे ही पिंडदान कर रहे हैं. और कई लोग तो अब जिंदा रहते हुए ही अपना पिंडदान तक करने लगे हैं. उन्हें लगता है कि आने वाले समय में उनके बच्चों के पास शायद ही पिंडदान कराने का वक्त हो .

इसलिए आज हम पिंडदान की पंरपरा में बदलाव के साथ ही उसके हर पहलू का विश्लेषण करेंगे . पिंडदान...पिंड और दान शब्दों के मिलने से बना है. पिंड शब्द का शाब्दिक अर्थ किसी वस्तु का गोलाकार रूप है. हिंदू कर्मकांड में शरीर को भी पिंड माना जाता है. इसलिए पके हुए चावल, दूध और तिल को मिलाकर पिंड बनाया जाता है. और फिर उसका दान कर आत्मा की शांति के लिए पूजा की जाती है.

शास्त्रों में ये मान्यता है...कि पितृ के लिए किया जाने वाला पिंडदान उन तक सीधे पहुंचता है. और उन्हें स्वर्गलोक लेकर जाता है. ऐसा माना गया है कि पितृपक्ष के दौरान मृत व्यक्ति अपने पुत्र या फिर नाते-रिश्तेदारों से पिंडदान की आशा रखते हैं. जो लोग अपना शरीर छोड़ जाते हैं....वो किसी भी लोक में हों या किसी भी रूप में हों...

पितृ पक्ष में पृथ्वी पर आते हैं और पिंडदान से संतुष्ट होते हैं. भारत में हरिद्वार, प्रयाग, वाराणसी और गया में पिंडदान किया जाता है . लेकिन बिहार के गया में फल्गु नदी के किनारे पिंडदान का बहुत महत्व है . कहा जाता है कि भगवान राम और सीता ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में पिंडदान किया था . गया को भगवान विष्णु का नगर माना गया है.

गया मोक्ष की भूमि भी कहलाती है. विष्णु पुराण और वायु पुराण में भी इसकी चर्चा की गई है. विष्णु पुराण के मुताबिक गया में पिंडदान करने से पितृ को मोक्ष मिल जाता है. माना जाता है कि स्वयं भगवान विष्णु फल्गु नदी के किनारे पितृ देवता के रूप में मौजूद रहते हैं .महाभारत के अनुशासन पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इसका महत्व बताया था.

महाभारत में ये भी बताया गया है कि पिंडदान की परंपरा कैसे शुरू हुई. और फिर कैसे ये धीरे-धीरे लोगों तक पहुंची. महाभारत के अनुसार, सबसे पहले पिंडदान का उपदेश महर्षि निमि को अत्रि मुनि ने दिया था . निमि ने अपने गुरु अत्रि से पूछा था कि अपने पूर्वजों को याद करने के लिए क्या किया जाए . तब अत्रि ऋषि ने निमि को पिंडदान की विधि बताई थी.

आप कह सकते हैं कि महर्षि निमि ने ही सबसे पहले पिंडदान शुरू किया . वैसे शास्त्रों में पिंडदान करने का अधिकार तय है . पिता का पिंडदान पुत्र द्वारा किया जाता है. अगर पुत्र नहीं है तो ये अधिकार शास्त्रों ने पत्नी को दिया है. और अगर पत्नी भी नहीं है तो सगा भाई या रिश्तेदार पिंडदान कर सकता है . लेकिन, अब वक्त की कमी से परंपराएं बदल रही हैं .

लोगों के पास जीवित लोगों से मिलने तक का समय नहीं है . लोग Virtual दुनिया में ही एक दूसरे का हालचाल पूछते हैं. लिहाजा देश में Online पिंडदान की भी शुरुआत हो गई है . विदेशों में रह रहे भारतीय भी बड़ी संख्या में पिंडदान के लिए ये रास्ता अपना रहे हैं .