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Zee Jaankari: 'जान जाए पर चालान न जाए' वाली सोच का DNA टेस्ट

आज दिल्ली-एनसीआर में Auto rickshaw, बसों और टैक्सियों ने हड़ताल की. ये हड़ताल नए ट्रैफिक कानून के विरोध में की गई थी. 

Zee Jaankari: 'जान जाए पर चालान न जाए' वाली सोच का DNA टेस्ट

आज दिल्ली-एनसीआर में Auto rickshaw, बसों और टैक्सियों ने हड़ताल की. ये हड़ताल नए ट्रैफिक कानून के विरोध में की गई थी. देश के हर नागरिक का ये दायित्व है कि वो नियम कानूनों का सम्मान करें. लेकिन ऐसा करने के बजाय.. लोगों का एक वर्ग नए नियमों का विरोध कर रहा है. इसलिए आज हम 'जान देंगे..लेकिन चालान नहीं देंगे' वाली सोच का DNA टेस्ट करेंगे. मोटर व्हीकल एक्ट 2019 के विरोध में आज दिल्ली NCR में ट्रांसपोर्ट संगठनों ने
हड़ताल की. इस हड़ताल में परिवहन से जुड़े 41 संगठन शामिल हुए. हड़ताल में निजी बस मालिक, ऑटो यूनियन और टैक्सी सर्विस देने वाली कंपनियां भी शामिल हुईं.

एक अनुमान के मुताबिक इस एक दिन की ह़ड़ताल से करीब 23 हजार करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ . ये पैसा भी आम आदमी की जेब से ही गया . यानी ट्रैफिक पुलिस को ज्यादा जुर्माना देने वाले कानून का विरोध करने की आड़ में... देश के ही लोगों का नुकसान कर दिया गया . इस हड़ताल का असर दिल्ली-NCR के लोगों पर पड़ा. वर्ष 2017 से 2018 तक के आंकड़ों के अनुसार..दिल्ली में कुल 1 लाख 13 हजार से ज्यादा Auto Rickshaw हैं .

इसी तरह टैक्सियों की संख्या 1 लाख 18 हजार से ज्यादा है. इसके अलावा परिवहन के दूसरे यात्री वाहनों की संख्या 76 हजार से अधिक है. इन वाहनों के माध्यम से प्रतिदिन दिल्ली NCR के लगभग 25 लाख लोग सफर करते हैं . दिल्ली NCR के निजी स्कूलों में करीब 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं . आज हड़ताल की वजह से इन लोगों के दिन की शुरुआत मुसीबतों के साथ हुई.

यानी आज कुछ हज़ार लोगों ने एक कानून का विरोध करने के लिए लाखों लोगों को बंधक बना लिया. जिस तरह वाहन चलाने के लिए लाइसेंस की ज़रूरत होती है... उसी तरह सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए नैतिकता वाले लाइसेंस की ज़रूरत पड़ती है . लेकिन हमारे देश में हिंसा, तोड़ फोड़ और मारपीट को ही अपनी बात मनवाने का सबसे असरदार तरीका मान लिया गया है . और यही वजह है कि अब लोग कानून का विरोध करने के लिए... कानून को ही हाथ में लेने लगे हैं. आज Zee Media की कई Reporting Teams दिल्ली एनसीआर में आम लोगों की समस्याओं पर Ground Reporting करने के लिए मौजूद थी. इस दौरान हमारी Teams ने जो देखा..वो हम आपको बताते हैं .

आपको जानकर अफसोस होगा कि परिवहन वाहनों की हड़ताल से आम लोग बहुत परेशान हुए. दूसरे शहरों से दिल्ली पहुंचने वालों को रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर टैक्सी या ऑटो नहीं मिले . School बसों के ना आने की वजह से छात्र स्कूल नहीं जा पाए. इसी तरह कामकाजी लोगों को दफ्तर जाने के लिए भी ऑटो रिक्शा और कैब की कमी से जूझना पड़ा. ये हो सकता है कि नए ट्रैफिक नियमों में तय की गई चालान की राशि... कुछ लोगों को ज्यादा लग रही हो. ये भी हो सकता है कि कानूनों का पालन कराने के नाम पर Cab और Auto Rickshaw Drivers को परेशान किया जा रहा हो..

.लेकिन इन सब परेशानियों का हल... हड़ताल से नहीं निकल सकता . हमें लगता है कि गर्मी और उमस भरे मौसम में लाखों लोगों को परेशानी में डालना भी एक प्रकार की हिंसा है. और इस हिंसा का विरोध किया जाना चाहिए . ट्रांसपोर्ट संगठनों की हड़ताल का एक पक्ष और भी है, जिसे आपको जानना चाहिए . इसके लिए हमने आज कुछ ऐसे Cab और Auto Rickshaw Drivers से भी बात की... जो आज की हड़ताल से परेशान थे. आज आपको इनका पक्ष भी समझना चाहिए . आजादी के बाद से आज तक कई सरकारें आईं . इसी दौरान नागरिकों से खुद जिम्मेदार बनकर ट्रैफिक नियमों को मानने की अपेक्षा की जाती रही .

अफसोस की बात ये है कि यातायात नियमों को लेकर देश में एक उदासीनता का भाव रहा है . लोग यातायात नियमों को लेकर लापरवाह बने रहे . देश का एक बड़ा वर्ग कार में बैठकर सीट बेल्ट पहनना या फिर हेलमेट लगाकर दोपहिया वाहन चलाना अपनी शान के खिलाफ समझता है . ये लापरवाही लोगों की जान पर कितनी भारी पड़ती है...ये समझने के लिए आज हमने कुछ आंकड़ों की मदद ली है .

देश में हर वर्ष करीब 5 लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं . जिसमें करीब 1 लाख 50 हजार लोगों की जान चली जाती है . यानि देश में हर घंटे 17 से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं . और अब आपको इन सड़क दुर्घटनाओं की वजह भी जाननी चाहिए . वर्ष 2017 में देश में 70 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाओं की वजह over speeding यानि वाहनों का तेज रफ्तार से दौड़ना था .

देश में हर साल करीब एक लाख लोगों की मौत इसी over speeding की वजह से होती है . वर्ष 2017 में 6 प्रतिशत दुर्घटनाएं गलत दिशा में वाहन चलाने की वजह से हुई थी . वर्ष 2017 में 3 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं नशे की हालत में वाहन चलाने के दौरान हुई..जबकि वाहन चलाते हुए मोबाइल फोन का इस्तेमाल 2 प्रतिशत दुर्घटनाओं की वजह बना . और सिग्नल जंप करने की वजह से 1 प्रतिशत दुर्घटनाएं हुईं . हमारी आपको सलाह है कि जीवन का महत्व समझिए, यातायात नियमों का पालन कीजिए, नए यातायात कानून का सम्मान कीजिए, ये आपके जीवन को और बेहतर बनाने के लिए ही है .

और जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं...उन्हें जागरुक और शिक्षित करने का काम कीजिए....क्योंकि लड़ झगड़कर जुर्माना तो कम कराया जा सकता है...लेकिन किसी की जान नहीं बचाई जा सकती . हिंदू धर्म में कहा जाता है कि परिवर्तन ही संसार का नियम है. आपने भी समय और जरुरत के हिसाब से अपने मकान में बदलाव किया होगा. अपने रहन सहन में बदलाव किया होगा. वाहन बदलना भी इसी परिवर्तन का हिस्सा है. यानि वक्त के साथ व्यवस्था में परिवर्तन होता रहता है. भारत में ट्रैफिक से जुड़ा पहला कानून वर्ष 1914 में बना था. वर्ष 1939 में इसमें बदलाव किया गया और फिर वर्ष 1989 में Motor Vehicles Act, 1988 लागू हुआ .

इसी में संशोधन करके इस वर्ष नया Motor Vehicles Act बनाया गया, जो एक सितंबर से लागू हुआ . पिछले 27 वर्षों में ट्रैफिक कानूनों और देश की ट्रैफिक व्यवस्था में क्या क्या बदलाव हुए हैं, आज हमने इस पर भी रिसर्च किया है. वर्ष 1990 में देश में रजिस्टर्ड गाड़ियों की संख्या 1 करोड़ 92 लाख थी . जो वर्ष 2017 में बढ़कर 23 करोड़ हो चुकी है. यानि कि वर्ष 1990 की तुलना में वर्ष 2017 में गाड़ियों की संख्या में 11 सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई. वर्ष 1990 में देश में 19 लाख 84 हजार किलोमीटर सड़क थी, 27 साल बाद वर्ष 2017 में देश में 56 लाख किलोमीटर सड़कों का जाल बिछ चुका है .

वर्ष 1990 में देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या 2 लाख 82 हजार थी, जो वर्ष 2017 में बढ़कर 4 लाख 65 हजार हो गई . यानि कि 27 वर्षों में सड़क दुर्घटनाओ में 65 प्रतिशत की वृद्धि हुई . वर्ष 1990 में देश में सड़क दुर्घटनाओं से मरने वालों की संख्या 54 हजार थी, जो वर्ष 2017 में बढ़कर 1 लाख 48 हजार हो गई . यानि कि 27 वर्षों में सड़क दुर्घटनाओ में मरने की वालों की संख्या में 174 प्रतिशत की वृद्धि हुई .