ZEE जानकारी: शाहीन बाग में पिछले एक महीने से क्यों हो रहा है धरना प्रदर्शन?

लोग सड़क घेर कर बैठे हुए हैं, जिसकी वजह से करीब 4 किलोमीटर लंबा रास्ता बंद हो गया है. इसका असर ये हुआ कि रोजाना शाहीन बाग से होकर गुजरने वाले लाखों लोग अपना समय और पैसा बर्बाद करते हुए दूसरे रास्तों से आना-जाना कर रहे हैं.

ZEE जानकारी: शाहीन बाग में पिछले एक महीने से क्यों हो रहा है धरना प्रदर्शन?

दिल्ली के शाहीन बाग में पिछले एक महीने से नए नागरिकता कानून के विरोध में धरना प्रदर्शन हो रहा है. दिल्ली का ये इलाका पिछले एक महीने से चर्चा में है. दिल्ली और उत्तर प्रदेश के बॉर्डर पर स्थित शाहीन बाग में 15 दिसंबर से, नए नागरिकता कानून और नागरिकता रजिस्टर के विरोध में धरना और प्रदर्शन चल रहा है. 

लोग सड़क घेर कर बैठे हुए हैं, जिसकी वजह से करीब 4 किलोमीटर लंबा रास्ता बंद हो गया है. इसका असर ये हुआ कि रोजाना शाहीन बाग से होकर गुजरने वाले लाखों लोग अपना समय और पैसा बर्बाद करते हुए दूसरे रास्तों से आना-जाना कर रहे हैं. और दिल्ली के कई इलाके महीने भर से बंधक बने हुए हैं. 

आज हम यही सवाल उठा रहे हैं कि जब कुछ लोग अपने अधिकारों के लिए दूसरों के अधिकार का अतिक्रमण करने लगें, तो फिर ऐसे आंदोलन को आंदोलन कहेंगे या अत्याचार?

दिल्ली हाईकोर्ट ने आज कहा कि प्रशासन को पूरा अधिकार है कि वो ट्रैफिक को कंट्रोल करे. कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से कहा कि वो शाहीन बाग के मामले में कानून-व्यवस्था को बहाल करें और जनहित का भी ध्यान रखें.

विश्लेषण को आगे बढ़ाने से पहले सुनते हैं कि कोर्ट ने क्या कहा. आम तौर पर ऐसे आंदोलनों में, कोर्ट कोई विशेष आदेश जारी नहीं करता. शाहीन बाग के मामले में भी यही हुआ. सब कुछ पुलिस और प्रशासन के विवेक पर छोड़ दिया गया .

तो क्या सब कुछ सिर्फ सरकार के भरोसे रहना चाहिए? और अगर सब कुछ सरकार पर ही छोड़ना है तो इस सवाल का क्या जवाब है कि दिल्ली के लोगों को इस परेशानी से आजादी कब मिलेगी? ये सवाल इसलिए क्योंकि पिछले 30 दिनों से स्थिति जैसी थी, वैसी ही है.

इसीलिए आज हम सरकार नहीं, बल्कि आम नागरिकों के अधिकार और कर्तव्यों की बात करेंगे. हमारे संविधान का अनुच्छेद 19 देश के नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी देता है. आपको इस बात की आजादी है कि अपनी बात को रखने के लिए, बिना किसी हथियार के, किसी जगह पर इकट्ठा हो सकते हैं. लेकिन अनुच्छेद 19 में भी लिखा है कि अभिव्यक्ति की ये स्वतंत्रता अपने आप में संपूर्ण नहीं है. जनहित में अनुच्छेद 19 पर आंशिक पाबंदी भी लगाई जा सकती है.

ध्यान देने की बात ये है कि आज दिल्ली हाईकोर्ट ने भी अपने फैसले में कहा कि शाहीन बाग के मामले में कार्रवाई करते हुए जनहित का ध्यान रखा जाना चाहिए. इतना ही नहीं, संविधान का अनुच्छेद 19 ये भी कहता है कि देश के हर नागरिक को एक जगह से दूसरी जगह बिना किसी गतिरोध के आने या जाने का अधिकार है.
 माना जा रहा है कि शाहीन बाग में सड़क बंद होने की वजह से दिल्ली और आस-पास के इलाकों में कम से कम 10 लाख लोगों का समय बर्बाद हो रहा है. तो क्या हम ये मान लें कि इन 10 लाख लोगों के मौलिक अधिकारों का कोई मोल नहीं है?

अब हम आपको एक ग्राउंड रिपोर्ट दिखाते हैं. जी न्यूज की टीम ने उन लोगों से भी बात की, जो शाहीन बाग के धरने और प्रदर्शन की वजह से परेशान हैं, घंटों ट्रैफिक जाम को झेल रहे हैं. यानी उनके मौलिक अधिकार का हनन हो रहा है. और हमने उन लोगों से भी बात की जो सड़क पर बैठे हुए हैं और कह रहे हैं कि धरना उनका संवैधानिक अधिकार है. आपको ये भी देखना चाहिए कि कैसे शाहीन बाग का धरना-स्थल पिकनिक स्पॉट बन गया है.

खास बात ये है कि शाहीन बाग में सियासत को भी संभावना दिखाई दे रही है. आए दिन वहां राजनीतिक पर्यटन के शौकीन नेता भी पहुंच रहे हैं. और उनकी कोशिश इतनी भर है कि किसी तरह इस पूरे मुद्दे को वोट बैंक का हथियार बनाया जाए. अब सुनिए, कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने आज शाहीन बाग में जाकर क्या कहा?

मणिशंकर अय्यर कांग्रेस के पुराने नेता हैं. वो केंद्र सरकार में मंत्री भी रहे हैं. अच्छा होता कि वो धरना-स्थल पर जाकर अपने विवेक का इस्तेमाल करते. वहां के लोगों को समझाते. बीच का कोई रास्ता निकालने की कोशिश करते. लेकिन, उन्होंने शाहीन बाग के लोगों से ये कहा कि- वो पुण्य का काम कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि मणिशंकर अय्यर, वहां जाकर प्रदर्शनकारियों को देश का नागरिक नहीं, बल्कि वोट समझ बैठे. और ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जो बेहद आपत्तिजनक हैं. हालांकि एक सच ये भी है कि मणिशंकर अय्यर ऐसे ही बयानों के लिए जाने जाते हैं. 

आज आपको ये भी जानना चाहिए कि धरना और प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है. जुलाई 2018 में एक केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आम लोग अगर सभा करना चाहें तो सरकार को इस अधिकार में मददगार होना चाहिए. लेकिन, सरकार चाहें तो वो सड़क या हाइवे पर ट्रैफिक को व्यवस्थित करने के लिए किसी जनसभा पर रोक लगा सकती है. हालांकि सरकार को इसके लिए विकल्प भी देना होगा.

आपको याद होगा कि पिछले दिनों जब मुंबई में प्रदर्शन हो रहे थे, तब वहां की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गेटवे ऑफ इंडिया से आजाद मैदान भेज दिया था. राजधानी दिल्ली में भी सरकार की तरफ से रामलीला मैदान में धरना और प्रदर्शन की अनुमति है. वर्ष 2017 में NGT यानी National Green Tribunal के आदेश के बाद, जंतर-मंतर पर धरना और प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी.

हमने अपने विश्लेषण की शुरुआत में भी कहा था कि संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को बोलने की आज़ादी देता है. और एक दायरे में लोकतंत्र में ये अधिकार मिलने भी चाहिए. लेकिन, ये तभी संभव है, जब सरकार के साथ-साथ आम जनता भी जागरूकता दिखाए और विपक्ष पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाए.