ZEE जानकारी: अवैध कब्ज़े की आदत को सिस्टम का साथ कैसे मिलता है?

प्रशासन या सिस्टम के हाथ बंधे हुए नहीं हैं. वो अगर चाहे तो अतिक्रमण को पनपने ही न दे. लेकिन सिस्टम ऐसा क्यों करेगा, क्योंकि वो तो रिश्वतखोरी की गोलियां खाकर.. गहरी नींद में सो रहा है.

ZEE जानकारी: अवैध कब्ज़े की आदत को सिस्टम का साथ कैसे मिलता है?

DNA में अब हम देश की अतिक्रमण वाली बीमारी की बात करेंगे. अतिक्रमण के खिलाफ हमारी मुहिम लगातार जारी है. और हमारी टीम देश के तमाम शहरों में रिपोर्टिंग कर रही है. बहुत जल्द हम आपके शहर में भी आने वाले हैं. क्योंकि अतिक्रमण की समस्या किसी एक शहर की नहीं.. बल्कि पूरे देश की राष्ट्रीय समस्या है. अवैध कब्ज़े की आदत को सिस्टम का साथ कैसे मिलता है, ये आपने सुना तो होगा, लेकिन शायद कभी देखा नहीं होगा. आज हम आपको ये दिखाएंगे कि अगर सिस्टम चाहे तो अतिक्रमण को जड़ से उखाड़कर फेंक सकता है. लेकिन परेशानी ये है कि सिस्टम ये काम करना ही नहीं चाहता. वैसे जब कभी किसी इलाके में मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का दौरा होता है तो अतिक्रमण हटाने का नाटक पूरी ईमानदारी से किया जाता है. 

दिल्ली के पास नोएडा में भी दो दिन पहले ऐसा ही नाटक देखने को मिला. नोएडा में सोमवार यानी 25 दिसंबर को एक मेट्रो लाइन का उद्घाटन होना था. और इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को आना था. देश और प्रदेश के मुखिया जिस इलाके में आएं, वहां अतिक्रमण कैसे हो सकता है? इसलिए नोएडा के पूरे सिस्टम ने ज़ोर लगाकर कुछ ही देर में उस इलाके से अतिक्रमण हटा दिया, जहां इन दोनों VIPs को आना था. लेकिन जैसे ही ये VIP दौरा खत्म हुआ, अतिक्रमण की तुरंत वापसी हो गई.

आप ये दो तस्वीरें देखिए. ये एक ही जगह की तस्वीरें हैं. बस फर्क इतना है कि एक तस्वीर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के दौरे से पहले की है. और दूसरी तस्वीर दौरा खत्म होने के बाद की है. पहली तस्वीर में आप साफ तौर पर ये देख सकते हैं कि जिन सड़कों पर ठेले वाले, रेहड़ी वाले, अवैध दुकान वाले, रिक्शेवाले और ऑटो वाले अतिक्रमण करते थे, वो गायब हैं. क्योंकि पुलिस ने उन्हें पहले ही ये बता दिया था कि उन्हें 20 से 25 दिसंबर तक ठेला या अपनी दुकान नहीं लगानी है. लेकिन जैसे ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वापस गए, तस्वीर दोबारा पहले जैसे ही हो गई. 

अब सवाल ये है कि अगर प्रशासन 4 दिनों के लिए अतिक्रमण हटवा सकता है, तो फिर इस समस्या का Permanent इलाज क्यों नहीं कर सकता? क्या हमारे प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को खुश करने के लिए हैं... क्या जनता के प्रति उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है? इसका मतलब ये भी है कि प्रशासन या सिस्टम के हाथ बंधे हुए नहीं हैं. वो अगर चाहे तो अतिक्रमण को पनपने ही न दे. लेकिन सिस्टम ऐसा क्यों करेगा, क्योंकि वो तो रिश्वतखोरी की गोलियां खाकर.. गहरी नींद में सो रहा है. अतिक्रमण के Business Model से किसी को.. कोई शिकायत नहीं है.

हमारे Reporters ने 4 दिनों तक कड़ी मेहनत करके आपके लिए ये स्पेशल रिपोर्ट तैयार की है. इस रिपोर्ट की खासियत ये है कि हमने एक ही जगह की दो तस्वीरें आपको दिखाई हैं. पहले आपको ये दिखाया है कि कैसे दिखावे के लिए अतिक्रमण हटा दिया गया और फिर जब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चले गए, तो हमने दोबारा उसी जगह पर जाकर रिपोर्टिंग की. आज हम इस पूरे मामले की लाइव शिकायत भी करेंगे. आप भी हमारी इस मुहिम में हिस्सा ले सकते हैं. हम आपको उन ज़िम्मेदार नेताओं और अधिकारियों तक पहुंचने का रास्ता भी बताएंगे, लेकिन उससे पहले हम आपको कुछ तस्वीरें दिखाना चाहते हैं. 

अतिक्रमण की इस राष्ट्रव्यापी समस्या पर हमारी ये मुहिम लगातार चल रही है. और अब हम Live शिकायत करेंगे. लेकिन उससे पहले हम आपको ये बताएंगे कि नोएडा में इस अतिक्रमण को रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी है? नोएडा में Land Owning Agency... नोएडा अथॉरिटी है. इसलिए नोएडा से अतिक्रमण हटाने की पहली ज़िम्मेदारी उसकी बनती है. अतिक्रमण की वजह से सड़कें जाम होती हैं. फुटपाथ पर अतिक्रमण होता है, इसलिए लोगों को सड़कों पर चलना पड़ता है. ऐसे हालात में ट्रैफिक को सुचारू रूप से चलाने की ज़िम्मेदारी पुलिस की है. इसलिए नोएडा पुलिस भी अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती. 

नोएडा के DM और SSP भी अतिक्रमण हटाने की ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते. वैसे इस मामले में नोएडा के सांसद और विधायक की सीधी जिम्मेदारी तो नहीं है, लेकिन वो भी अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी से इंकार नहीं कर सकते. केन्द्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा नोएडा के सांसद हैं. और गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह नोएडा के विधायक हैं. और अंतिम जिम्मेदारी बनती है, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की. वो प्रदेश के मुखिया हैं. हालांकि हमें पता नहीं है कि वो प्रशासन के इस दिखावे को समझ भी पा रहे हैं या नहीं..

अतिक्रमण या अवैध कब्ज़े को हटाना इसलिए मुश्किल होता है... क्योंकि अवैध कब्ज़ा करने वाले लोग प्रशासन और पुलिस को पैसा देते हैं.. उनसे वसूली की जाती है और इसके बाद वो उस सरकारी ज़मीन को अपनी जागीर समझते हैं. हालांकि ये कहना मुश्किल है कि ये वसूली किस स्तर तक जाती है. VIPs के आगमन पर अतिक्रमण से छुटकारे वाली तस्वीरें देखकर ये पता चलता है कि अगर हमारा सिस्टम चाहे तो लोगों को अतिक्रमण की परेशानी से मुक्ति दिलवा सकता है यानी ये समस्या लाइलाज नहीं हैं. अतिक्रमण की परेशानी का Permanent इलाज करने के लिए कुछ बुनियादी और कठोर फैसले लेने की ज़रूरत है हालांकि हमारे सिस्टम की रीढ़ की हड्डी बहुत नाज़ुक है और इसकी चेतना.... किसी VIP के आगमन पर ही जागृत होती है. लेकिन मज़बूत इच्छा शक्ति हो.. तो कुछ भी संभव है. इस बात को समझने के लिए चीन के शहर... शंघाई का उदाहरण लिया जा सकता है.. ख़बर ये है कि वहां की Municipality ने ये तय किया है कि वर्ष 2017 से 2035 तक के मास्टरप्लान के तहत शंघाई शहर की अधिकतम आबादी 2 करोड़ 50 लाख तक सीमित कर दी जाएगी.. फिलहाल शंघाई की आबादी करीब 2 करोड़ 41 लाख है. ये एक क्रांतिकारी फैसला है जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है.

आपने नोट किया होगा कि हमारे देश के शहरों में भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है. शहरों में उपलब्ध सुविधाओं और रोज़गार की तलाश में देश के दूसरे हिस्सों की आबादी.... शहरों की तरफ चल देती हैं. और फिर धीरे धीरे शहरों पर जनसंख्या का बोझ बढ़ता जाता है. इसकी वजह से ना तो सड़कों पर चलने की जगह बचती है.. और ना ही रहने के लिए मकान बचते हैं.. गाड़ियों की पार्किंग के लिए मर्डर हो जाते हैं... और जहां.. जिसको मौका मिलता है... वहां अवैध कब्ज़े हो जाते हैं. जो Infrastructure कुछ लाख लोगों के लिए बनाया गया था.. उसका इस्तेमाल करोड़ों लोग करने लगते हैं. इस तरह शहरों के कंधे टूटने लगते हैं.. इसे अंग्रेज़ी में Big City Disease भी कहा जाता है. ये बीमारी हमारे देश में भी बड़े पैमाने पर फैली हुई है.. लेकिन यहां इसे... किसी ने पहचाना नहीं है... और अगर पहचाना भी है... तो इसे ठीक करने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाया है. लेकिन चीन ने वक़्त रहते इस बीमारी को पहचान लिया है और इसका उपचार भी शुरू कर दिया है.

चीन के शहर... शंघाई की Municipality ने शहर की आबादी को काबू में करने के लिए एक Masterplan तैयार किया है. जिसके तहत अगले 18 वर्षों में शंघाई शहर की आबादी ढाई करोड़ तक सीमित कर दी जाएगी. पिछले कुछ वर्षों से शंघाई में बढ़ती आबादी की वजह से ....प्रदूषण और ट्रैफिक की समस्या बहुत तेजी से बढ़ी है. इसके अलावा सरकारी सुविधाओं.. चिकित्सा और शिक्षा व्यवस्था पर ज़रूरत से ज़्यादा बोझ है.. यही वजह है कि चीन की सरकार ने शंघाई की आबादी को नियंत्रित करने का फैसला लिया है 

Masterplan के तहत वर्ष 2017 से 2035 के दौरान शंघाई की आबादी को कैसे काबू किया जाएगा .. इसकी रूपरेखा तैयार कर ली गई है. चीन की सरकार शंघाई में रहने वाले लोगों को नज़दीक के दूसरे शहरों में बसाने का काम शुरू करेगी यानी ये लोग अपने काम के लिए दूसरे शहरों से रोज़ाना up-down करेंगे. इसके अलावा कई सरकारी दफ्तरों और करीब 300 प्राइवेट कंपनियों को दूसरो शहरों में Shift किया जाएगा.

कई Wholesale Markets को भी दूसरे शहरों में भेजा जाएगा, ये ऐसे बाज़ार हैं जो पूरी दुनिया में कच्चे माल की supply करते हैं. शंघाई शहर के बाहरी हिस्सों में सरकारी सुविधाओं को बढ़ाने का काम किया जाएगा यानी इन इलाकों में अस्पताल और education centers खोले जाएंगे. इसके अलावा शंघाई शहर की स्थाई नागरिकता लेने वाले नियमों को और मुश्किल बनाया जाएगा. हालांकि शंघाई में ये नियम पहले से ही है कि जिस व्यक्ति के पास स्थाई नागरिकता नहीं है उसे शहर में सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं दिया जाता और ऐसे लोग वहां मकान भी नहीं खरीद सकते.

शंघाई का प्रशासन इससे पहले भी ऐसे नियमों को समय-समय पर लागू करता रहा है. और इसका असर भी दिखा है. चीन की एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में शंघाई शहर की आबादी में एक लाख से ज्यादा लोगों की कमी आई थी. जनसंख्या के मामले में चीन...दुनिया में पहले नंबर पर है..जहां लगभग 140 करोड़ लोग रहते हैं. इसके बाद दूसरा नंबर भारत का है जहां करीब 133 करोड़ लोग रहते हैं. भारत के चार महानगर... दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई की आबादी मिला दी जाए तो ये 6 करोड़ से भी ज्यादा है. 

इसमें सिर्फ़ दिल्ली का उदाहरण लें तो दिल्ली शहर की आबादी करीब ढाई करोड़ है... हैरानी बात ये है कि शंघाई का क्षेत्रफल दिल्ली से करीब 4 गुना ज़्यादा है. लेकिन इसके बाद भी चीन... शंघाई की 2 करोड़ 41 लाख की आबादी को शहर के लिए ख़तरे का अलार्म समझता है जबकि भारत का सिस्टम जनसंख्या के विस्फोट का इंतज़ार कर रहा है. अगर शंघाई की तरह भारत भी अपनी शहरी आबादी को सीमित करने की दिशा में काम करे... तो शहरों में बढ़ती समस्या को कम किया जा सकता है. इसके लिए मज़बूत इच्छाशक्ति की ज़रूरत है जो अकसर VIPs के आगमन पर दिखाई देती है.