Zee जानकारी : वायु प्रदूषण की विनाशलीला का विश्लेषण

वैचारिक प्रदूषण के बाद अब हम असली प्रदूषण का DNA टेस्ट करेंगे। हम जिस प्रदूषण की बात कर रहे हैं उसे अब राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का समय आ गया है। लेकिन हमारे देश की किसी भी सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं है हमें लगता है कि वायु प्रदूषण लापरवाही द्वारा प्रायोजित एक ऐसा दंगा यानी Riot है जो सभी धर्मों के लोगों की जान ले रहा है।

Zee जानकारी : वायु प्रदूषण की विनाशलीला का विश्लेषण

नई दिल्ली: वैचारिक प्रदूषण के बाद अब हम असली प्रदूषण का DNA टेस्ट करेंगे। हम जिस प्रदूषण की बात कर रहे हैं उसे अब राष्ट्रीय आपदा घोषित करने का समय आ गया है। लेकिन हमारे देश की किसी भी सरकार का ध्यान इस तरफ नहीं है हमें लगता है कि वायु प्रदूषण लापरवाही द्वारा प्रायोजित एक ऐसा दंगा यानी Riot है जो सभी धर्मों के लोगों की जान ले रहा है।

भारत में वायु प्रदूषण का स्तर इस हद तक खतरनाक हो चुका है कि ये हर एक मिनट में 2 लोगों की जान ले रहा है। 'द लांसेट काउंटडाउन' 'द लांसेट काउंटडाउन' नामक एक नई रिपोर्ट के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली और बिहार की राजधानी पटना दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में शामिल है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर वर्ष 10 लाख से ज्यादा लोग वायु प्रदूषण की वजह से बेमौत मारे जा रहे हैं। यानी भारत में हर रोज़ करीब 2 हज़ार 880 लोगों की मौत वायु प्रदूषण से हो रही है।

'द लांसेट काउंटडाउन' के मुताबिक पूरी दुनिया में हर रोज़ 18 हज़ार लोगों की मौत वायु प्रदूषण की वजह से होती है। इसमें बाहर के प्रदूषण के साथ साथ घरों के अंदर का वायु प्रदूषण भी शामिल है यानी आप घर के अंदर रहकर दुनिया भर की परेशानियों से तो शायद बच भी जाएं, लेकिन वायु प्रदूषण वहां भी आपकी जान ले सकता है। यानी जिस वक्त आप डीएनए देख रहे हैं उस वक्त भी आप और आपका पूरा परिवार वायु प्रदूषण के खतरे से अछूता नहीं है।

इस रिपोर्ट को 16 अलग अलग संस्थानों के 48 वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। इन वैज्ञानिकों के मुताबिक (जिन शहरों में प्रदूषण का स्तर WHO द्वारा तय किए गए मानकों के मुताबिक है वहां भी लोगों के मरने का खतरा काफी ज्यादा है) दिल्ली और पटना में वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार Pm 2.5 कणों का औसत वार्षिक स्तर 120 MicroGram Per Cubic Meter है। ये WHO द्वारा निर्धारित मानकों से 12 गुना ज्यादा है।

WHO के मुताबिक प्रदूषण का औसत वार्षिक स्तर 10  MicroGram Per Cubic Meter से ज्यादा नहीं होना चाहिए। चीन से तुलना की जाए तो भारत में प्रदूषण ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहा है। पिछले हफ्ते वायु प्रदूषण से जुड़ी एक और इंटरनेशनल रिपोर्ट आई थी। 'स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2017' नामक रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 2015 में ओजोन परत को हो रहे नुकसान की वजह से भारत में 2 लाख 54 हज़ार लोगों की मौत हुई थी।

ओजोन पर्यावरण की वो परत है जो सूरज से आने वाले हानिकारक  अल्ट्रावॉयलेट रेडिेएशन को रोकती है। ओजोन की परत को जब नुकसान होता है तो लोगों को फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां होने लगती हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में भारत में ढ़ाई लाख लोग फेफड़ों की बीमारियों की वजह से ही मारे गए थे।

ओजोन परत को हो रहे नुकसान की वजह से भारत में हर साल लाखों लोग मारे जा रहे हैं। मौत का ये आंकड़ा बांग्लादेश से 13 गुना ज्यादा और पाकिस्तान के मुकाबले 21 गुना ज्यादा है। बांग्लादेश और पाकिस्तान की हवा में विचारों का प्रदूषण भले ही ज़्यादा हो। लेकिन वायु प्रदूषण के मामले में वहां कि हवा भारत से ज्यादा साफ है।

साल दर साल बीत जाने के बाद भी भारत में वायु प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। चाहे केंद्र सरकार हो या फिर राज्य सरकारें, कोई भी प्रदूषण से लड़ने के लिए गंभीर नहीं दिखता। केंद्र सरकार ने लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए ये माना था कि भारत, वायु प्रदूषण की मॉनिटरिंग पर हर साल सिर्फ 7 करोड़ रुपये खर्च करता है। ये रकम 132 करोड़ की आबादी वाले इस विशाल देश के लिए बहुत कम है।

इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि भारत में वायु प्रदूषण के खतरे को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है। सभी को 5 राज्यों में हो रहे चुनाव के नतीजों का इंतज़ार है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी और गुस्सा भी आएगा कि राजनीतिक पार्टियां प्रदूषण जैसे मुद्दे को अपने घोषणा पत्र में जगह नहीं देती हैं और अगर इस संबंध में कोई जिक्र किया भी जाता है। तो वो बिल्कुल खानापूर्ति जैसा होता है।

ये सब तब हो रहा है जब वायु प्रदूषण की वजह से भारत में हर साल 10 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो रही है। हमें लगता है कि मंदिर, मस्जिद, जाति और धर्म के नाम पर वोट मांगने वाले राजनेताओं को साफ हवा के नाम पर वोट मांगने चाहिए। नेताओं को लोगों से वादा करना चाहिए कि जब वो सत्ता में आएंगे तो प्रदूषण का नामो निशान मिटा देंगे। घोषणा पत्र में उन कदमों के बारे में बताया जाना चाहिए जिनसे वायु प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

लेकिन हमारे देश की राजनीति, प्रदूषण से लड़ने की कोई नीति नहीं बनाना चाहती, हमें शिकायत आम लोगों से भी है, बुद्धिजीवियों से भी है और उन पत्रकारों से भी है जो असहनशीलता के मुद्दे पर बड़ी बड़ी बहस करते हैं लेकिन प्रदूषण के नाम पर रिपोर्टिंग नहीं करते बहस नहीं करते।

आम लोग भी नेताओं से ये नहीं पूछते कि वो चुनाव जीतने पर प्रदूषण से कैसे लड़ेंगे ? हमें लगता है कि ये स्थिति बहुत जल्द बदलनी होगी क्योंकि हर साल 10 से 12 लाख लोगों का बेमौत मर जाना बहुत बुरी बात है और प्रदूषण जैसे मुद्दों पर संवाद ना करना उससे भी शर्मनाक स्थिति है।

भारत में वायु प्रदूषण से जुड़ा सबसे खतरनाक पहलू ये है कि भारत प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में दुनिया के दूसरे देशों से पिछड़ रहा है। इसे आप भारत और चीन के बीच के तुलनात्मक उदाहरण से समझिए। भारत में ओजोन परत को हुए नुकसान से होने वाली मौतें वर्ष 1990 के बाद से 53 प्रतिशत बढ़ी हैं और वर्ष 2005 के बाद से इसमें 24 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ है।

जबकि चीन में वर्ष 1990 के बाद से ओज़ोन को हुए नुकसान से होने वाली मौतें 16 प्रतिशत बढ़ी हैं और वर्ष 2005 से इसमें गिरावट आने लगी हैं इसी तरह चीन में वर्ष 1990 से लेकर अब तक PM 2.5 कणों से होने वाली मौतें 17 प्रतिशत बढ़ी हैं.. जबकि भारत में PM 2.5 कणों से होने वाली मौतों का आंकड़ा 47 प्रतिशत बढ़ा है।

 

 

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