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ZEE जानकारीः क्या अब जाति और धर्म देखकर मौत पर आंसू बहाओगे?

देश में लिंचिंग की घटनाएं लगातार हो रही हैं और भीड़तंत्र की आड़ में अपराध करने वाले लोग आराम से घूम रहे है. 

ZEE जानकारीः क्या अब जाति और धर्म देखकर मौत पर आंसू बहाओगे?

2019 के लोकसभा चुनाव के लिए.. लिंचिंग यानी भीड़ द्वारा की गई हत्याओं को एक बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी चल रही है. कुछ दिन पहले लिंचिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया था. लेकिन हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट की सुनता कौन है ? देश में लिंचिंग की घटनाएं लगातार हो रही हैं और भीड़तंत्र की आड़ में अपराध करने वाले लोग आराम से घूम रहे है. ताज़ा मामला राजस्थान के अलवर ज़िले का है. जहां शुक्रवार की रात को रकबर नाम के एक व्यक्ति की कुछ कथित गोरक्षकों ने पीट पीटकर हत्या कर दी. इस हत्या का हमें भी दुख है, इस मामले में पुलिस की भूमिका भी संदेह के घेरे में है. हमें लगता है कि इसकी गहराई से जांच होनी चाहिए और कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. 

वैसे देश में लिंचिंग की घटनाएं बार बार हो रही हैं. और इन घटनाओं को एजेंडे के स्वाद और सुविधा के अनुसार Headlines में जगह दी जा रही है. पिछले 4 दिनों में ये मामला अलवर से निकलकर देश की संसद तक पहुंच चुका है. आज इसे लेकर संसद में हंगामा हुआ. और सोशल मीडिया पर आक्रोश दिखाई दिया. हालांकि आक्रोश की स्क्रिप्ट वही पुरानी है, बड़े बड़े पत्रकार Tweet से लेकर संपादकीय तक... कलमतोड़ लेखन कर रहे हैं. Twitter पर नए नए Hashtags Trend कर रहे हैं. लेकिन ये पूरा हंगामा और विरोध सिर्फ अलवर तक सीमित है. जबकि राजस्थान के बाड़मेर ज़िले में हुई एक दलित की हत्या का ज़िक्र कहीं नहीं है. जाति और धर्म के आधार पर इस ख़बर को दबा दिया गया. क्योंकि हमारे देश में लिंचिंग को भी धर्म और जाति के चश्मे से देखा जाता है.

बाड़मेर में भील जनजाति के एक युवक की हत्या का आरोप इलाके के ही मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों पर लगा है. पुलिस के मुताबिक खेताराम नामक ये युवक, एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था. बाड़मेर ज़िले के मेकरन वाला गांव में शनिवार की सुबह लड़की के घरवालों ने इस युवक की पीट पीटकर हत्या कर दी. उसके शरीर पर चोट के कई निशान थे और पुलिस के मुताबिक उसका गला भी घोंटा गया था. इस य़ुवक से मारपीट करने वाले लोगों की संख्या करीब 10 थी, हालांकि पुलिस ने घटना में शामिल दो युवकों को गिरफ्तार कर लिया है. 

अब मन में ये सवाल उठता है कि हमारे देश में एजेंडा चलाने वाली फैक्ट्रियां इतनी तेज़ी से Selective विरोध का उत्पादन क्यों कर रही हैं? क्या पीड़ित और आरोपियों की जाति और धर्म देखकर ये तय होगा कि कौन सी ख़बर हेडलाइन बनेगी और कौन सी नहीं? पहले मरने वाले का धर्म और उसकी जाति Check की जाती है. अगर पीड़ित मुस्लिम या दलित निकल आए तो हमारे देश के मीडिया का एक वर्ग और आंदोलनों के ठेकेदार उसे हाथों हाथ ले लेते हैं. फिर Social Media में घटनाओं की कड़ी निंदा शुरू हो जाती है. दुर्भाग्य की बात ये है कि ये Trend अभी तक खत्म नहीं हुआ है. अलवर में मारा गया रकबर मुस्लिम था और कथित तौर पर उसे पीट पीटकर मारने वाले हिंदू थे. जबकि खेताराम एक दलित युवक था. जिसे कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने मार डाला. 

दोनों घटनाओं के कारण अलग अलग थे, लेकिन दोनों घटनाओं में कुछ बातें ऐसी हैं, जो बिल्कुल एक जैसी हैं. लोगों की भीड़ दोनों ही घटनाओं में थी और दोनों ही घटनाओं में एक व्यक्ति की हत्या हुई है. लेकिन Lynching की राजनीति करने वालों ने सिर्फ अलवर की घटना को ही Lynching माना और बाड़मेर के इस युवक का ज़िक्र करना भी ज़रूरी नहीं समझा.

आज संसद में भी सिर्फ अलवर की घटना पर राजनीति हुई. विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि जिन राज्यों में चुनाव हैं, वहीं पर Mob Lynching की घटनाएं हो रही हैं. राजस्थान में इसी वर्ष चुनाव होने वाले हैं. लेकिन विपक्ष को वहां हुई Lynching की सिर्फ एक घटना दिखाई दी. क्योंकि इसमें अपना एजेंडा चलाने की पूरी सुविधा है. 

दूसरी तरफ़ सरकार ने विपक्ष के आरोपों का जवाब ये कहकर दिया कि देश में 1984 से ही Lynching हो रही है. सरकार की तरफ से गृहमंत्री राजनाथ सिंह जवाब दे रहे थे. और राजनाथ सिंह 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के खिलाफ हुए दंगों की तरफ इशारा कर रहे थे. लेकिन मौजूदा हालात में सरकार आज से 34 वर्ष पहले हुए दंगों का ज़िक्र करके अपनी ज़िम्मेदारियों से बच नहीं सकती. सुप्रीम कोर्ट का फैसला आए हुए एक हफ्ता बीत चुका है. अब तक इस फैसले का ज़्यादा असर दिखाई नहीं दिया है. लेकिन हमें उम्मीद है कि देश की राज्य सरकारें इस फैसले को बहुत जल्द लागू करेंगी. और अगर लागू नहीं करेंगी तो हम उनसे सवाल पूछेंगे.

इस विश्लेषण की शुरुआत में हमने आपसे कहा था कि दुर्भाग्य से हमारे देश में सुप्रीम कोर्ट की बात कोई सुनता ही नहीं है. Mob Lynching पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने ही फैसला सुनाया था. आज चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा पर आयोजित एक सेमीनार में बोल रहे थे. और इस सेमीनार में उन्होंने सोशल मीडिया की वजह से होने वाली हिंसा पर काफ़ी चिंता जताई. 

लिंचिंग एक ऐसा शब्द है जो हमारे देश की संस्कृति और स्वभाव से मेल नहीं खाता. वसुधैव कुटुंबकम... यानी... दुनिया में मौजूद हर इंसान एक ही परिवार का हिस्सा है . ये भारतीय संस्कृति का महान जीवन दर्शन है . धर्म और जाति के नाम पर इंसानों के बीच चाहे कितनी ही दूरियां आ जाएं लेकिन कुदरती तौर पर इंसान एक जैसे होते हैं. और लिंचिंग की तमाम घटनाओं, चर्चाओं और राजनीति के बीच एक अच्छी ख़बर भी आई है.

दिल्ली में एक हिंदू मरीज़ को एक मुस्लिम व्यक्ति की किडनी लगाई गई और एक मुस्लिम मरीज़ को एक हिंदू व्यक्ति की किडनी लगाई गई. ये ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर सिख थे और मरीज़ की सेवा करने वाली नर्स, क्रिश्चियन थीं. यानी ये ऑपरेशन धार्मिक सदभाव की मिसाल था. किडनी का कोई धर्म नहीं होता. किडनी ट्रांसप्लांट करवाते हुए ये बात मायने नहीं रखती कि किडनी देने वाले, और लेने वाले का धर्म क्या है. ऐसे मामलों को धर्म के चश्मे से नहीं, मानवता की नज़र से देखना चाहिए. 

आज जब पूरे देश में सोशल मीडिया पर नफरत फैलाने की मशीनें चल रही हैं . अफवाहों के कांटों से इंसानियत लहूलुहान हो रही है . ऐसे दौर में इस तरह की खबरें बहुत सुकून देती हैं. देश का दुर्भाग्य ये है कि इस तरह की खबरों पर कभी मुहिम नहीं चलाई जाती. ये कभी सोशल मीडिया पर ट्रेंड नहीं करतीं. इस तरह की घटनाएं जानबूझकर दबा दी जाती हैं . जबकि Celebrities द्वारा प्रायोजित एजेंडा तुरंत ख़बरों में आ जाता है.

आपको याद होगा कि कुछ दिन पहले Social Media पर एक अभियान चलाया गया था.. जिसका नाम था TALK TO A MUSLIM... इस अभियान के तहत कुछ Celebrities ने ये जताने की कोशिश की - कि देश में मुसलमानों से कोई बात ही नहीं करता. उनकी राय नहीं ली जाती, और उन्हें समाज का हिस्सा नहीं माना जाता. इस तरह के अभियानों से माहौल बनाया जाता है और फिर असहनशीलता जैसे शब्दों को Push किया जाता है. लेकिन आज ऐसे Celebrities के लिए परीक्षा की घड़ी है. आज हम चाहते हैं कि ये सारे सेलिब्रिटीज़, सांप्रदायिक सौहार्द की इस खबर को Tweet करें. और देश को एक Positive संदेश दें. लेकिन क्या वो ऐसा करेंगे ? हमें पता है कि वो नहीं करेंगे क्योंकि इसमें कोई विवाद नहीं है. इससे उनकी दुकानें नहीं चलेंगी . भाईचारे और सहनशीलता वाली घटनाएं ऐसे लोगों के लिए फायदे का सौदा नहीं होतीं. 

इस तरह की ख़बरें ये बताती हैं कि हमारे देश के लोग इतने बुरे भी नहीं हैं. आज भी हमारे देश में अच्छे लोगों की संख्या ज़्यादा है, और बुरे लोग मुठ्ठी भर हैं. लेकिन दुर्भाग्य ये है कि मीडिया सिर्फ मुठ्ठी भर लोगों की ही बात करता है और अच्छे लोगों की बात नहीं करता. हमें पूरी उम्मीद है कि आपको इस ख़बर ने सुकून ज़रूर दिया होगा. इस सुकून और सौहार्द के लिए आप किसी सरकार या प्रशासन के मोहताज नहीं हैं. आप चाहें तो ये सुकून खुद अपने आचरण के ज़रिए हासिल कर सकते हैं.