ZEE जानकारी: हरियाणा का वो गांव जो आज भी अंग्रेजों के कानून का गुलाम है

जब आप इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आपको पता चलेगा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ बहुत नाइंसाफी हुई और उनके पूरे व्यक्तित्व के साथ राजनीति का खेल खेला गया.

ZEE जानकारी: हरियाणा का वो गांव जो आज भी अंग्रेजों के कानून का गुलाम है

Oxfam के इस सर्वे को देखकर एक बात तो तय है कि दुनिया की मौजूदा अर्थव्यवस्था गरीबों के साथ अन्याय कर रही है और कुछ लोग... अन्याय करने वालों का साथ दे रहे हैं. आज ऐसे लोगों को... नेताजी सुभाष चंद्र बोस की एक बात बड़े ध्यान से सुननी चाहिए. नेताजी ने कहा था कि सबसे बड़ा अपराध होता है... अन्याय सहना और गलत विचारधारा के साथ समझौता करना. आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 121वीं जयंती है और इस मौके पर देश के इस नायक को याद करना बहुत ज़रूरी है.

जब देश के असली नायकों की बात आती है, तो अक्सर हम फिल्मी पर्दे के कलाकारों की बात करते हैं, उनका जन्मदिन मनाते हैं. लेकिन कोई भी भारत की आज़ादी के सबसे बड़े नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बात नहीं करता. उनकी जयंती या पुण्यतिथि आने पर सिर्फ औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं. आज बहुत सारे लोगों ने फेसबुक और Twitter पर नेताजी को याद करके और उनके बारे में एक Post लिखकर अपनी नैतिक ज़िम्मेदारी से छुट्री पा ली होगी. इसमें कोई बुराई नहीं.. क्योंकि आम आदमी अपने सीमित दायरे में अगर किसी महापुरुष को किसी भी रूप में याद करता है.. तो उसकी कोशिश का सम्मान होना चाहिए.

लेकिन नेताजी का चरित्र बहुत विशाल था.. वो बहादुरी, साहस, संकल्प और राष्ट्रभक्ति के बेमिसाल प्रतीक हैं...सुभाष चंद्र बोस जैसा व्यक्तित्व पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा. दुनिया में शायद पहली बार ऐसा हुआ था, जब अपने देश की आज़ादी के लिए किसी नेता ने देश से बाहर जाकर एक बड़ी सेना तैयार की थी. आज़ाद भारत के लिए सुभाष चंद्र बोस के मन में एक बड़ा प्लान था... और उनकी कही हुई बातों और विचारों को आज भी पूरी दुनिया याद करती है... आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की वीरता को याद करने का दिन है....ज़ी न्यूज़ देश के इस अमर सेनानी को श्रद्धांजलि देता है... 

जब आप इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आपको पता चलेगा कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ बहुत नाइंसाफी हुई और उनके पूरे व्यक्तित्व के साथ राजनीति का खेल खेला गया. दुख की बात ये है कि उस समय की व्यवस्था ने कभी भी नेताजी के शौर्य को उभरने नहीं दिया. और उन्हें गुमनामी के अंधेरे में ढकेलने की पूरी कोशिश हुई. लेकिन नेताजी का व्यक्तित्व इतना विशाल था.. कि वो अपने आप उभरकर सामने आ गया. हमें लगता है कि नेताजी के शौर्य को जिस तरह नज़रअंदाज़ किया गया,, वो नहीं होना चाहिए था और आधुनिक भारत को अब अपनी ये भूल जल्द से जल्द सुधार लेनी चाहिए

भारत को आज़ादी दिलाने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था ... "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा'. लेकिन ये एक बहुत बड़ा विरोधाभास है कि खून देने के बाद भी कुछ लोगों को आज भी आज़ादी नहीं मिली है. इस बात को समझने के लिए आपको हमारा अगला विश्लेषण ध्यान से देखना होगा.

आज हम आपको हरियाणा के 'रोहनात गांव' लेकर चलेंगे. ये गांव देश की संसद से सिर्फ़ 145 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है. और इस गांव के माथे पर आज़ादी के 70 साल बाद भी गुलामी का दाग़ लगा हुआ है. कहने को...ये गांव आज़ाद भारत में है.. लेकिन यहां आज भी... अंग्रेज़ो के बनाए हुए कानूनों का राज चल रहा है.... यहां के लोग सिस्टम का विरोध करने के लिए आज़ादी का जश्न नहीं मनाते. यहां ना तो गणतंत्र दिवस मनाया जाता है.. और ना ही स्वतंत्रता दिवस. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि इस गांव में आज़ादी के बाद से आज तक.. तिरंगा नहीं फहराया गया है. इसकी वजह क्या है ये समझने के लिए आपको इस गांव के DNA को समझना होगा. 

1857 की क्रांति में इस गांव की ऐतिहासिक भूमिका थी. लेकिन इस बात का ज़िक्र इतिहास के पन्नों में आपको बहुत कम दिखाई देगा. 1857 की क्रांति की शुरुआत 10 मई को मेरठ से हुई इसके बाद आंदोलन की आग  दिल्ली होते हुए पूरे देश में फैल गई. कई इतिहासकारों के मुताबिक

29 मई 1857 को रोहनात गांव के लोगों ने अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ अपना विद्रोह तेज़ कर दिया था और कई अंग्रेज़ अफ़सरों की हत्या कर दी थी. इस विद्रोह से ब्रिटिश सरकार घबरा गई और उसने पूरे गांव से बदला लेने की ठान ली.

इस घटना के कुछ महीने बाद ही अंग्रेज़ अफसरों ने रोहनात गांव पर तोपों से हमला कर दिया. इस हमले में ज़्यादातर लोग ज़िंदा जल गये और वहां की महिलाएं और बच्चें जान बचाने के लिए कुएं में कूद गये. ये घटना भी जलियांवाला बाग़ के नरसंहार की याद दिलाती है. 

वहां जो क्रांतिकारी ज़िंदा पकड़े गये थे उन्हें काला पानी की सज़ा दी गई और अंडमान भेज दिया गया. इतने अत्याचार करने के बाद भी अंग्रेज़ों का मन नहीं भरा और उन्होंने इस गांव के लोगों को ज़िंदगी भर के लिए सज़ा देने का इंतज़ाम कर दिया. इसके लिए अंग्रेज़ सरकार ने रोहनात गांव की नीलामी करने का फ़ैसला किया. 

20 जुलाई 1858 को रोहनात गांव को 8100 रुपये में बेच दिया गया और इस पूरे गांव पर दूसरे गांव के लोगों का कब्जा हो गया. इसी के साथ इस गांव के लोग अपने घर और संपत्ति से बेदखल हो गये. आज़ादी के बाद 70 वर्षों में देश में कई सरकारें आईं और चली गईं लेकिन इस गांव को सबने नज़रअंदाज़ किया.

आपको सुनकर यक़ीन नहीं होगा कि इस गांव में आज भी मोबाइल फोन की सुविधा पूरी तरह से उपलब्ध नहीं है. यहां तक कि Landline फोन के कनेक्शन के लिए भी यहां के लोग इंतज़ार कर रहे हैं.

इस गांव की हालत देखकर लगता है कि देश की आज़ादी के लिए बलिदान देने की सज़ा इस गांव के लोगों आज भी मिल रही है. यहां के लोग खुद को गुलाम समझते हैं और इसीलिए इस गांव में अब तक तिरंगा नहीं फहराया गया है. आज हमने देश के सिस्टम को जगाने के लिए रोहनात गांव का एक DNA टेस्ट किया है जिसे आपको ध्यान से देखना चाहिए. इसे देखकर आपको आज़ादी की असली कीमत का एहसास होगा.