ZEE जानकारी: क्या आप अपनी मर्ज़ी से कभी राष्ट्रगान नहीं गाएंगे या उसके सम्मान में नहीं खड़े होंगे

8 जनवरी केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक Affidavit दाखिल किया और अदालत को बताया कि उसने इस मामले में मंत्रियों की एक कमेटी बनाई है, जो 6 महीने में सरकार को अपनी रिपोर्ट देगी.

ZEE जानकारी: क्या आप अपनी मर्ज़ी से कभी राष्ट्रगान नहीं गाएंगे या उसके सम्मान में नहीं खड़े होंगे

आज सबसे पहले आपसे एक सवाल,,. सिनेमाघरों में फिल्म देखने से पहले राष्ट्रगान के सम्मान खड़े होने से.. आपमें से कितने लोगों को तकलीफ होती थी.. आपमें से कितने लोग ऐसे हैं.,. जिन्हें राष्ट्रगान की गाने से परेशानी होती थी. दूसरे शब्दों में.. क्या आप राष्ट्रगान के लिए तभी खड़े होंगे या तभी राष्ट्रगान गाएंगे जब कानून आपको बाध्य करेगा.. क्या आप अपनी मर्ज़ी से कभी राष्ट्रगान नहीं गाएंगे.. या उसके सम्मान में नहीं खड़े होंगे. सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है. अदालत के इस फैसले के बाद बहुत से लोगों ने राहत की सांस ली होगी. उन्हें ये लग रहा होगा कि अब उन्हें सिनेमा घरों में राष्ट्रगान गाने और उसके सम्मान में खड़े होने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन ये खुशी.. बड़ी ख़तरनाक है.. इसे शुभ संकेत नहीं माना जा सकता. 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का एक मतलब ये भी है कि अब राष्ट्रगान सिर्फ 15 अगस्त, 26 जनवरी और सरकारी आयोजनों में ही सुनाई देगा. हमारे देश में लोग अक्सर ये पूछते हैं कि उन्हें देश से क्या मिला.. लेकिन वो कभी इस बात पर ध्यान नहीं देते कि उन्होंने देश को क्या दिया ? वो अपनी निजी ज़िंदगी से राष्ट्रगान के लिए 52 सेकेंड समर्पित करने के लिए भी तैयार नहीं हैं. सिनेमाघरों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता खत्म होने के बाद.. देश की रक्षा करने वाले हमारे जवान... ये पूछ सकते हैं कि सब कुछ उनके लिए ही क्यों अनिवार्य है ? बॉर्डर पर शहीद होना सिर्फ उनके हिस्से में ही क्यों आता है ?

सुप्रीम कोर्ट ने 30 नवंबर 2016 को अपने एक आदेश में सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाने और खड़े होकर उसका सम्मान करने को अनिवार्य कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर बहुत बहस हुई. और कुछ लोगों ने कहा था कि उन पर देशभक्ति थोपी जा रही है. विरोध इस बात का था कि देशभक्ति दिखाने के लिए सिनेमा घरों को ही क्यों चुना गया? इस फैसले पर दोबारा विचार करने के लिए अदालत में याचिकाएं भी दाखिल हुई थीं. इसके बाद अक्टूबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को निर्देश दिया था कि वो सिनेमा हॉल और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर राष्ट्रगान बजाने की नीति खुद तय करें. 

8 जनवरी केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक Affidavit दाखिल किया और अदालत को बताया कि उसने इस मामले में मंत्रियों की एक कमेटी बनाई है, जो 6 महीने में सरकार को अपनी रिपोर्ट देगी. साथ ही केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से ये भी आग्रह किया था कि कमेटी की रिपोर्ट आने तक कोर्ट 30 नवंबर 2016 से पहले की यथास्थिति बरकरार रखे. यानी सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान का बजाया जाना अनिवार्य न हो. 

इसीलिए 9 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा Halls में फिल्म दिखाने से पहले राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को खत्म कर दिया. यानी जब तक केन्द्र सरकार की बनाई गई कमेटी अपनी रिपोर्ट देगी तब तक सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं है. वैसे राष्ट्रगान का सम्मान दिल से होता है, देशभक्ति की भावना से होता है. और इस भावना को दिल में लाने या जागृत करने के लिए किसी अदालत और कानून की ज़रूरत नहीं है. राष्ट्रगान का सम्मान शुद्ध और साफ मन से होना चाहिए. देशभक्ति कोई दवा नहीं है.. जो इंजेक्शन के ज़रिए शरीर और मन के अंदर पहुंच जाएगी. ये सम्मान दिल से आता है, किसी अदालत या कानून के दबाव से नहीं. इसलिए आज आपको ये तय करना होगा कि आप इस फैसले से खुश हैं.. या फिर इससे दुखी हैं ? 

ये भी एक सच्चाई है कि राष्ट्रगान ही वो भावना है, जो आपको देशप्रेम के लिए जागृत करती है. हो सकता है कि बहुत से लोग ये सोच रहे हों.. कि वो राष्ट्रगान क्यों गाएं? लेकिन ज़रा सोचिए कि अगर किसी दिन भारत के सैनिकों ने पलटकर ये पूछ लिया कि मैं ही देश के लिए शहादत क्यों दूं? तो क्या होगा? क्या सिनेमाघरों में पॉपकॉर्न खाने वाले लोग.. जवानों के इस सवाल का जवाब दे पाएंगे ? 

राष्ट्रगान पूरे देश की आत्मा होता है. इसीलिए दुनिया का हर देश अपने राष्ट्रगान का सम्मान करता है. ऐसा माना जाता है कि दुनिया का सबसे पुराना National Anthem.. Netherlands का है, जिसे वर्ष 1568 से 1572 के बीच लिखा गया था.. और वर्ष 1626 के आसपास उसकी धुन तैयार की गई थी. इसके बाद दुनिया के तमाम देशों ने अपने अपने National Anthem बनाए. और भारत भी इन देशों में से एक है. भारत के राष्ट्रगान ..जन गण मन..की रचना रबिन्द्र नाथ टैगोर ने वर्ष 1911 में की थी. उनके इस गीत को 1950 में राष्ट्रगान के रूप में अपनाया गया था. 

ये गीत और इसकी धुन.. भारत के DNA में बसी हुई है. आज भी अगर कहीं ये धुन बजती हुई सुनाई दे जाए.. तो हर भारतवासी के दिल में देशभक्ति की लहरें उठने लगती हैं. लेकिन कुछ लोगों ने इन भावनाओं को भी कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगवाने शुरू कर दिए हैं. रबिंद्र नाथ टैगोर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि राष्ट्रगान की रचना के 107 वर्षों के बाद.. भारत में इस बात पर बहस होगी कि राष्ट्रगान बजना चाहिए या नहीं ? और ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाएगा. ख़ैर आपके दिल की भावनाओं को अदालतों के चक्कर नहीं लगवाए जा सकते.. आप जब चाहें.. राष्ट्रगान को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं. इसके लिए आपको किसी से Permission लेने की ज़रूरत नहीं है. राष्ट्रगान वो डोर है.. जिससे पूरा देश एकता और ज़िम्मेदारी के सूत्र में बंधा रहता है.. इसलिए जहां तक हो सके.. इस डोर को कसकर पकड़े रहिए. आप ऐसा करेंगे.. तो देश.. किसी भी विनाशकारी सोच का सामना कर लेगा.