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ZEE जानकारीः महात्मा गांधी की वजह से आज भी हमारा कश्मीर पर दावा मजबूत

 नटवर सिंह के मुताबिक अगर आज कश्मीर पर भारत का दावा मज़बूत है तो इसमें महात्मा गांधी की बहुत बड़ी भूमिका है.

ZEE जानकारीः महात्मा गांधी की वजह से आज भी हमारा कश्मीर पर दावा मजबूत

भारत की विदेश नीति और कूटनीति की जब बात होती है, तो नटवर सिंह का नाम काफी प्रमुखता से लिया जाता है. पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह ने पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉक्टर मनमोहन सिंह तक के साथ काम किया. भारतीय विदेश सेवा से जुड़ने के बाद वो 1953 में विदेश मंत्रालय से जुड़े थे. वो 31 वर्षों तक भारतीय विदेश सेवा से जुड़े रहे. और उसके बाद राजनीति में आ गए. वो राजीव गांधी की सरकार में विदेश मंत्री रहे. और फिर डॉक्टर मनमोहन सिंह की पहली सरकार में भी विदेश मंत्री बने. 

इसलिए आप ये कह सकते हैं कि भारत की विदेश नीति के संदर्भ में नटवर सिंह का अनुभव काफी ज्यादा है. इस पूरे मामले पर जब हमने नटवर सिंह से बात की तो, उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं. लेकिन उन्होंने महात्मा गांधी के विषय में एक ऐसी जानकारी दी. जिसके बारे में ज्यादातर लोगों को जानकारी नहीं होगी. आप खुद ही सुनिए कि नटवर सिंह ने क्या कहा? 

यानी नटवर सिंह के मुताबिक अगर आज कश्मीर पर भारत का दावा मज़बूत है तो इसमें महात्मा गांधी की बहुत बड़ी भूमिका है. महात्मा गांधी ने उस समय बहुत दूरदर्शिता दिखाई थी. क्योंकि इस बात की पूरी आशंका थी कि संयुक्त राष्ट्र की तरफ से कश्मीर की आज़ादी पर मुहर लग जाती. 

जब भारत ब्रिटेन का गुलाम था तब अंग्रेज़ों ने भारत में Governor-General या Viceroy नियुक्त किए थे . जिस तरह आज राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रमुख होता है उसी तरह अंग्रेजों के राज में Governor-General या Viceroy भारत का संवैधानिक प्रमुख होता था . इसका मतलब ये है कि ब्रिटेन की महारानी और ब्रिटेन की संसद के बाद भारत के संबंध में लिए गए फैसलों में Governor-General या Viceroy की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती थी . 

ये जानकर आपको कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अंग्रेज़ों के राज में भारत के आखिरी संवैधानिक प्रमुख, एक अंग्रेज़... लॉर्ड माउंटबेटन थे . लेकिन ये जानकर आपको आश्चर्य होना चाहिए कि आखिर आज़ाद भारत का पहला गवर्नर जनरल यानी संवैधानिक प्रमुख लॉर्ड माउंटबेटन को क्यों बनाया गया? गुलाम भारत का संवैधानिक प्रमुख एक अंग्रेज़ बने तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है लेकिन अगर आज़ाद भारत का पहला संवैधानिक प्रमुख भी एक अंग्रेज़ ही हो.. तो क्या इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए ? 

ये इतिहास का एक बहुत उलझा हुआ प्रश्न है . विद्यार्थी जीवन में आपने स्कूल में इतिहास ज़रूर पढ़ा होगा . हो सकता है... ये सवाल आपके मन में भी आया हो ? लेकिन आपको इसका जवाब नहीं मिला होगा . क्योंकि आपको सही इतिहास कभी पढ़ाया ही नहीं गया.

इस संदर्भ में आपको एक और बात ध्यान रखनी चाहिए. पाकिस्तान ने किसी अंग्रेज़ को अपने देश का गवर्नर जनरल नहीं बनाया . मुहम्मद अली जिन्ना, खुद पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल बने . पाकिस्तान ने किसी अंग्रेज़ पर भरोसा नहीं किया . मुहम्मद अली जिन्ना... शायद ये बात अच्छी तरह समझते होंगे कि पाकिस्तान के हितों की समझ... एक अंग्रेज़ से ज़्यादा एक पाकिस्तानी को होगी . ये एक देश के स्वाभिमान का सवाल है. अगर आज़ादी अंग्रेज़ों से लड़कर मिली है तो किसी अंग्रेज़ को आज़ादी के बाद देश का पहला संवैधानिक प्रमुख क्यों बनाया गया.

हम आपको वर्ष 1947 की कुछ तस्वीरें भी दिखा रहे हैं . जब Lord Mountbatten भारत आए तो उनके स्वागत में एक समारोह किया गया . इस समारोह की Video Recording की गई थी. इसकी कुछ तस्वीरें बहुत खास हैं . उस वक्त Lord Mountbatten भारत के बड़े नेताओं के साथ बैठे हुए दिख रहे हैं . उनके एक तरफ पंडित जवाहर लाल नेहरू बैठे थे और दूसरी तरफ मौलाना अबुल कलाम आज़ाद बैठे थे.

हमने ऐसे बहुत सारे लेख पढ़े, कई किताबें पढ़ीं.. तब जाकर ये विश्लेषण तैयार हुआ. हमें उम्मीद है कि इससे आपका नज़रिया साफ हुआ होगा. 1947 में हम आज़ाद तो हो गये थे, लेकिन तब भी मानसिक रूप से हम गुलाम ही थे. तब भारत को नई-नई आज़ादी मिली थी, और बड़े मुद्दों पर क्या करना है, इसके बारे में किसी को पता नहीं था. पंडित नेहरू के पास कश्मीर जैसी परिस्थिति को Handle करने का अनुभव नहीं था . और अंग्रेज़ों ने इसी बात का फायदा उठाया.