ZEE जानकारी: पढ़ाई के बोझ में दबे बच्चे, भारत में खेल-खेल में पढ़ाई कब?

Global Education Census द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक भारत के 40 प्रतिशत बच्चे 2 से 4 घंटे होमवर्क करने पर खर्च करते हैं और वीकेंड पर भी ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहता है. यानी भारत के स्कूली बच्चों को पढ़ाई से Week-Off भी नहीं मिल पाता. इसी सर्वे के मुताबिक दूसरे देशों के मुकाबले भारत के बच्चे ज्यादा Extracurricular Activities में हिस्सा लेते हैं. ये ऐसी गतिविधियां होती हैं, जिनका पढ़ाई से संबध नहीं होता लेकिन ये बच्चे को अलग अलग विधाओं में माहिर बनाती है.

ZEE जानकारी: पढ़ाई के बोझ में दबे बच्चे, भारत में खेल-खेल में पढ़ाई कब?

आज हम भारत के, 30 करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चों के भविष्य का विश्लेषण करेंगे. अगर आपके परिवार में भी स्कूल जाने वाले बच्चे हैं तो आपको ये DNA ज़रूर देखना चाहिए, क्योकि ये विश्लेषण आपके बच्चे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा है. स्कूल बैग का वज़न, स्कूल की टाइमिंग, स्कूल से मिलने वाला Home Work, ट्यूशन और Extracurricular Activities का बोझ आपके बच्चे को वक्त से पहले बीमार, कमज़ोर और चिड़चिड़ा बना रहा है और जिस देश के बच्चे शारीरिक और मानसिक तौर पर बचपन से ही बीमार हो जाते हैं वो देश विश्व की महाशक्ति नहीं बन सकता. आज हमने स्कूल में पढ़ने वाले एक औसत भारतीय बच्चे की दिनचर्या का अध्ययन किया है. इस दिनचर्या को समझने के बाद आपको ऑफिस या घर के कामकाज में की गई अपनी मेहनत भी फीकी लगने लगेगी.

भारत में स्कूल जाने वाले बच्चों को अक्सर सुबह साढ़े पांच बजे से 6 बजे के बीच उठना पड़ता है. इसके बाद सात या साढ़े सात बजे से स्कूल शुरू हो जाता है, जो दोपहर डेढ़ से दो बजे तक चलता है. इसके बाद कई बच्चों को घर लौटने पर भी आराम नहीं मिलता क्योंकि उन्हें तीन-साढ़े तीन बजे के आसपास ट्य़ूशन के लिए जाना होता है. जब बच्चा ट्यूशन से वापस लौटता है तो अक्सर घड़ी में 6 या साढ़े 6 बज चुके होते हैं. इसके बाद कुछ माता-पिता बच्चों को Extracurricular Activities के लिए स्पेशल Classes में भी भेजते हैं. जैसे डांस क्लास, मार्शल आर्ट, Drawing या फिर Skating. यहां से जब बच्चा घर लौटता है तो अक्सर रात के 8 बज गए होते हैं लेकिन इसके बाद भी उसे आराम नहीं मिलता क्योंकि उसे School से मिला Home Work करना होता है. खाना खाने के बाद बच्चे होम वर्क करने में जुट जाते हैं और ये सिलसिला रात के 11 बजे तक चलता रहता है. ज्यादातर बच्चे आधी रात को सोने जाते हैं और फिर 6 साढ़े 6 घंटे की नींद लेने के बाद उन्हें एक बार फिर स्कूल के लिए तैयार होना होता है. 

School से जुड़ी व्यस्त दिनचर्या, पढ़ाई के दबाव और खेलने कूदने के लिए समय ना मिलने की शिकायत करती एक 6 साल की बच्ची का वीडियो इन दिनों वायरल हो रहा है. इस बच्ची का नाम रूही शाह है और ये बच्ची गुजरात की राजधानी गांधीनगर के एक स्कूल में पढ़ती है. पहली कक्षा में पढ़ने वाली ये बच्ची भारत के स्कूली सिस्टम से किस कदर नाराज़ है. पहले आप ये इसी बच्ची की जुबानी सुनिए. फिर हम आपको बताएंगे कि कैसे इस बच्ची ने सिर्फ अपनी परेशानी नहीं बताई है बल्कि भारत के 30 करोड़ स्कूली बच्चों का दर्द दुनिया के सामने रखा है. इस छोटी सी बच्ची की बातें सुनकर आप को हंसी तो आ रही होगी लेकिन असल में इसके पीछे बहुत गंभीर सवाल छिपे हैं. ये बच्ची शिक्षा व्यवस्था को लेकर देश के नेताओं से भी नाराज़ है और ये इस बात का सबूत है..हमारे देश में नेता भी बच्चों की समस्याओं को लेकर गंभीर नहीं हैं. 

आज हमने इस बच्ची की शिकायतों को आधार बनाकर भारत के स्कूली सिस्टम पर एक विश्लेषण किया है. अक्सर हम छोटे बच्चों की बातों को नज़र अंदाज़ कर देते हैं लेकिन कई बार उनकी बालसुलभ बातों में भविष्य निर्माण की कुंजी छिपी होती है. DNA एक पारिवारिक Show है और हम परिवार के हर सदस्य की जिंदगी से जुड़ा विश्लेषण करते रहते हैं और आज हमारा विश्लेषण आपके परिवार के सबसे छोटे सदस्यों को समर्पित है. Unified District Information System for Education से हासिल किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत के स्कूलों में साल भर में औसतन 223 से 225 दिन पढ़ाई होती है. 

भारत में पहली कक्षा से 12वीं कक्षा तक के बच्चों को अपने साथ स्कूल बैग ले जाना होता है. इन School Bags का औसत वज़न 8 किलो होता है. यानी साल भर में एक बच्चा करीब 1800 किलोग्राम वज़न उठाता है. ये वज़न एक बड़ी SUV कार के औसत वज़न के बराबर है. इसी आंकड़े को आप अगर भारत के 24 करोड़ स्कूल जाने वाले बच्चों से गुणा कर देंगे तो School Bags का वार्षिक वज़न 42 हज़ार करोड़ किलोग्राम हो जाएगा. ये आठ करोड़ हाथियों के वज़न के बराबर है. 

ये स्थिति तब है जब नवंबर 2018 में केंद्र सरकार स्कूलों को ये निर्देश दे चुकी है कि बच्चों के School Bags का वज़न घटाया जाए. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देशों के मुताबिक पहली और दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के बैग का वज़न डेढ़ किलोग्राम से ज्यादा नहीं हो सकता. इसी तरह तीसरी कक्षा से पांचवी कक्षा तक School Bags का वज़न 2 से 3 किलोग्राम तक ही होना चाहिए । छठी से सातवीं कक्षा तक ये सीमा चार किलो. आठवीं से नौवीं कक्षा तक साढ़े चार किलो और 10वीं कक्षा के छात्रों के लिए ये सीमा 5 किलोग्राम तय की गई है लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी..कई स्कूल इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं. 

अगर आपके बच्चे के स्कूल Bag का वज़न घट भी चुका है तो ये ज़रूरी नहीं है कि उसे Home Work से भी छुटकारा मिल गया हो. National Achievement Survey द्वारा तीसरी, पांचवी और आठवीं कक्षा के छात्रों पर किए गए एक शोध में ये सामने आया है कि भारत के 74 प्रतिशत शिक्षकों के लिए आज भी होमवर्क ही छात्रों की योग्यता जांचने का एकमात्र तरीका है. सिर्फ 24 प्रतिशत शिक्षक ही Projects के ज़रिए बच्चों की योग्यता जांचते हैं. राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में 90 प्रतिशत से ज्यादा शिक्षक सिर्फ होम वर्क के ज़रिए ही बच्चों का आंकलन करते हैं. उत्तर भारत में ये स्थिति ज्यादा खराब है जबकि तमिलनाडु के 67 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश के 53 प्रतिशत और ओडिशा के 40 प्रतिशत शिक्षक अब Home Work से ज्यादा Practicle और Projects पर ध्यान देने लगे हैं. 

देखें वीडियो:

Global Education Census द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक भारत के 40 प्रतिशत बच्चे 2 से 4 घंटे होमवर्क करने पर खर्च करते हैं और वीकेंड पर भी ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहता है. यानी भारत के स्कूली बच्चों को पढ़ाई से Week-Off भी नहीं मिल पाता. इसी सर्वे के मुताबिक दूसरे देशों के मुकाबले भारत के बच्चे ज्यादा Extracurricular Activities में हिस्सा लेते हैं. ये ऐसी गतिविधियां होती हैं, जिनका पढ़ाई से संबध नहीं होता लेकिन ये बच्चे को अलग अलग विधाओं में माहिर बनाती है. जैसे खेल, संगीत या फिर पेंटिग की शिक्षा. लेकिन कई बार बच्चे ये सब अपने मन से नहीं करते बल्कि माता-पिता उन्हें दौड़ में आगे रखने के लिए उनसे Extracurricular Activities कराते हैं. भारत के 58 प्रतिशत बच्चे स्कूल के बाद भी Extra Classes यानी Tuition लेते हैं. गुजरात की 6 साल की रूही भी इस दौड़ से परेशान है क्योंकि ये दौड़ उसका बचपन छीन रही है. आप रूही के वीडियो का ये दूसरा हिस्सा देखिए जिसे देखकर आप समझ जाएंगे कि कैसे टीचर्स और पैरेटेंस की महत्वकांक्षाएं मिलकर एक बच्चे के बचपन को गला काट प्रतिस्पर्धा में बदल देती है. 

किसी विषय पर पकड़ मजबूत करने के लिए Extra Class लेने में कोई बुराई नहीं है. बच्चों को कुछ ना कुछ नया भी ज़रूर सीखना चाहिए लेकिन ये इस बात का भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि ये सब बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की कीमत पर ना हो. हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं..क्योंकि आगे निकलने की होड़ में स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य से समझौता किया जा रहा है. अमेरिका की The National Sleep Foundation Scientific Advisory Council के मुताबिक स्कूल जाने वाले 12 वर्ष तक के उम्र के बच्चों को कम से 9 से 11 घंटे तक सोना चाहिए लेकिन देर रात तक होमवर्क, मोबाइल फोन, और Television देखने की आदत की वजह से भारत के बच्चे पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं. ठीक से ना सोने की वजह से बच्चों को अस्थमा, इन्फेक्शन, वज़न में कमी, थकावट, चिड़चिड़ापन, दिन में नींद आना और कमज़ोर याददाश्त जैसी परेशानियां हो सकती हैं. लेकिन जिस शिक्षा व्यवस्था ने 6 साल की बच्ची को सिस्टम पर सवाल उठाने के लिए मजबूर किया है वो शिक्षा व्यवस्था पूरी दुनिया में बदल चुकी है. कैसे स्कूल जाने वाले बच्चों की जिंदगी को आसान बनाया जा सकता है ये समझाने के लिए हम आपको आज अमेरिका भी ले चलेंगे.