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ZEE जानकारीः संस्कारों पर बच्चों का गुस्सा हावी हो रहा है?

भारत में माता-पिता को भगवान से भी ऊपर माना जाता है. लेकिन इस कलियुग में ऐसे संस्कार बहुत फीके पड़ चुके हैं और इन संस्कारों पर बच्चों का गुस्सा हावी हो रहा है. 

ZEE जानकारीः संस्कारों पर बच्चों का गुस्सा हावी हो रहा है?

दिल्ली में 19 साल के एक लड़के ने अपने माता-पिता और बहन की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी. और इसकी वजह सिर्फ ये थी कि इस लड़के के माता-पिता उसे डांटते थे और पढ़ाई पर ध्यान लगाने को कहते थे. इस लड़के पर उसके परिवार ने पाबंदियां भी लगाई हुई थीं और कई बार अपने आचरण की वजह से उसके साथ मारपीट भी होती थी. लेकिन क्या सिर्फ इतनी सी बात पर कोई बेटा अपने माता-पिता और बहन की हत्या कर सकता है? ये ख़बर भले ही दिल्ली की हो, लेकिन इन सवालों पर आज पूरा देश चर्चा कर रहा है. भारत में 25 करोड़ परिवार रहते हैं और इन 25 करोड़ परिवारों के लिए ये सबसे बड़ी और सबसे ज़रूरी ख़बर है.

ज़रा सोचिए - आप जिस कॉलोनी या सोसायटी में रहते हैं, वहां आपको ये ख़बर मिले कि आपके पड़ोस में एक बच्चे ने अपने मां-बाप और बहन की हत्या कर दी, तो आपके मन पर क्या बीतेगी? ये मन को खराब करने वाली ख़बर है. इसका गहरा असर होता है. और जहां ऐसी घटना होती है, वहां के आसपास के लोग वर्षों तक इसके Trauma या दर्द को महसूस करते हैं. 

भारत में माता-पिता को भगवान से भी ऊपर माना जाता है. लेकिन इस कलियुग में ऐसे संस्कार बहुत फीके पड़ चुके हैं और इन संस्कारों पर बच्चों का गुस्सा हावी हो रहा है. हमारे पास आज बहुत सी ख़बरें थीं. लेकिन हमने इस ख़बर को इसलिए प्राथमिकता दी, क्योंकि ये ख़बर भारत के हर परिवार और हर माता-पिता से जुड़ी हुई है. यहां हम ये भी साफ कर देना चाहते हैं कि अपने इस विश्लेषण के ज़रिए हम आपको डरा नहीं कर रहे हैं, बल्कि सावधान कर रहे हैं. आपको ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि आप अपने बच्चों को पहचानिए. उनकी मानसिक अवस्था को समझिए. और उनसे लगातार बात करने की कोशिश कीजिए. क्योंकि मानसिक बीमारियां आसानी से दिखाई नहीं देतीं .

ये अकेला ऐसा मामला नहीं है पिछले कुछ महीनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं. 21 मई 2018 को दिल्ली के रहने वाले एक उद्योगपति अनिल खेड़ा की गाज़ियाबाद में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. 8 अक्टूबर को पुलिस ने अनिल खेड़ा के बेटे को अपने पिता की हत्या करवाने के आरोप में गिरफ्तार किया. हत्या की वजह ये थी कि पिता ने बेटे की फिज़ूलखर्ची के लिए पैसे देने बंद कर दिए थे. और उसकी पिटाई भी की थी. और इसी वजह से नाराज़ बेटे ने अपने ही पिता की हत्या की साज़िश रच दी. 

ऐसी ही एक घटना पिछले साल दिसंबर में नोएडा एक्सटेंशन में भी हुई थी. यहां एक नाबालिग लड़के ने अपनी मां और बहन की हत्या कर दी. वजह ये थी कि ये लड़का मोबाइल फोन पर गेम खेलता था, तो उसके घरवालों ने मोबाइल फोन छीन लिया था. जिसके बाद वो नाराज़ रहने लगा और इसी वजह से उसने अपनी मां और बहन की हत्या कर दी. ये हत्या की सामान्य घटनाएं नहीं हैं, बल्कि समाज के लिए बहुत बड़ा अलार्म हैं. इसलिए अगर वक्त रहते इस अलार्म से नींद नहीं खुली तो बहुत देर हो जाएगी. 

अमेरिका के Child Mind Institute की एक रिपोर्ट के मुताबिक....बच्चा चाहे किसी भी उम्र का क्यों ना हो...अगर वो छोटी-छोटी बातों पर उत्तेजित हो जाता है, तो वो ना सिर्फ अपने लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा है. बल्कि दूसरे बच्चों के साथ-साथ, वो अपने माता-पिता को भी नुकसान पहुंचा सकता है.जो बच्चे...हत्या जैसा अपराध करते हैं, उनके साथ बचपन में या तो अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता...या फिर वो अकेलेपन के शिकार होते हैं.ऐसे बच्चे अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते. जिसकी वजह से, वो काफी आक्रामक हो जाते हैं और दूसरों को नुकसान पहुंचाते हैं.अगर किसी बच्चे ने अपनी आंखों के सामने कोई हिंसा होते हुए देखी है, तो इस बात की गुंजाइश ज़्यादा है, कि वो खुद भी ऐसी कोई हिंसक हरकत कर सकता है.आज तक जितने भी Research हुए हैं, उनके आधार पर ये कहा जाता है, कि हत्या जैसा अपराध करने वाले बच्चों को ये पता ही नहीं होता, कि वो कितना बड़ा जुर्म कर रहे हैं ?

यहां हम उन माता-पिता को भी कुछ ज़रूरी जानकारियां देना चाहते हैं, जिनके बच्चे छोटी-छोटी बातों पर आक्रामक हो जाते हैं. यानी हम आपको समस्या के साथ साथ समाधान भी बता रहे हैं.. दुनिया भर के Experts के मुताबिक...अगर आपके बच्चों की उम्र 7 से 8 साल की है...और वो बिना किसी बात पर गुस्सा करने लगते हैं, तो आपको सावधान हो जाना चाहिए.गुस्सैल रवैये की वजह से, अगर वो दूसरे बच्चों के साथ घुल-मिल नहीं पाते और उन्हें दूसरी गतिविधियों से दूर रखा जाता है, तो वो कोई भी गलत हरकत कर सकते हैं.अगर आपका बच्चा, किसी चीज़ के लिए ज़िद करता है, तो आसानी से उसे वो चीज़ ना दें. क्योंकि, इससे बच्चे को ये लगेगा, कि ज़िद करने से.. उसे कुछ भी मिल सकता है और ये धीरे-धीरे उसका स्वभाव बन जाएगा.

इसके लिए आपको Zero-Tolerance की नीति अपनानी होगी. ताकि आपका बच्चा ज़िद्दी ना बने.आपको खुद भी अपने ऊपर काबू रखना चाहिए. अगर आप अपने बच्चों पर चिल्लातें हैं या भड़कते हैं, तो इस बात की आशंका ज़्यादा है, कि बच्चों का व्यवहार भी झगड़ालू हो जाए और वो शारीरिक तौर पर किसी को नुकसान पहुंचाए. छोटी छोटी बातों पर बच्चों को ना डांटे. अगर वो कोई गलत हरकत करता है, तो उसे समझाएं...और अगर वो अच्छा काम करे, तो उसे प्रोत्साहित करें. अगर आपके बच्चे हिंसक फिल्में देखते हैं...या फिर आक्रामक Video Games खेलते हैं..तो ये उनके लिए अच्छी बात नहीं है. उन्हें किसी और Positive आदत की तरफ Divert करें.बच्चे को किसी भी प्रकार का शारीरिक दंड देने से बचें. इससे बच्चे में उग्र व्यवहार पैदा होता है. इन छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखकर आप अपने बच्चों को सही और गलत की परिभाषा समझा सकते हैं.

इस ख़बर से घबराने या दहशत में आने के बजाए इस बात पर विचार करना ज़्यादा ज़रूरी है कि हमारे देश के युवाओं के मन में इतने हिंसक विचार क्यों पैदा हो रहे हैं ? इन युवाओं में इतना गुस्सा कहां से आ रहा है कि ये अपने माता-पिता की हत्या से भी संकोच नहीं कर रहे ? इसे सिर्फ़ दिल्ली जैसे महानगर की अपराध वाली ख़बर नहीं समझना चाहिए . क्योंकि हमारे देश के ज़्यादातर युवाओं की सोच हिंसक होती जा रही है . देश में मानसिक रोगों का इलाज करने वाले सबसे बड़े इंस्टीट्यूट(((National Institute of Mental Health and Neuro Sciences)) NIMHANS के मुताबिक भारत में 80 प्रतिशत युवा गुस्से में हैं . 

इस इंस्टीट्यूट ने जब युवाओं से उनके गुस्से के बारे में बात की तो करीब 35 प्रतिशत युवाओं ने ये माना कि वो गुस्सा आने पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं. करीब 21 प्रतिशत युवा गुस्से में वो मारपीट करते हैं . 12 प्रतिशत युवाओं का कहना है कि गुस्से में वो हथियार का भी इस्तेमाल कर लेते हैं . 37 प्रतिशत युवाओं ने ये कहा कि माता-पिता के सख़्त व्यवहार की वजह से वो मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं . 

यानी हमारे देश के युवाओं की मानसिक स्थिति अच्छी नहीं हैं. इसके अलावा World health Organisation के मुताबिक भारत में हर 13 में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारियों से पीड़ित है.और मशहूर Medical Journal... The Lancet के मुताबिक भारत में 2020 तक हर 5 में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारियों का शिकार होगा. हमारे देश में अक्सर ये कहा जाता है कि मन के हारे हार है.. मन के जीते जीत.... यानी मन की स्थिति से ही किसी व्यक्ति की जीत या हार का फैसला होता है. लेकिन जब भारत के लोगों का मन ही बीमार होगा तो वो जीवन में जीत की उम्मीद कैसे कर सकते हैं . इसका दूसरा पहलू ये भी है कि भारत में मानसिक समस्याओं के बारे में बात करने में लोगों को संकोच और शर्म महसूस होती है. उन्हें लगता है कि लोग उन्हें पागल कहकर उनका मज़ाक उड़ाएंगे . 

हमारे देश के युवा भी मानसिक समस्याओं के बारे में ऐसा ही सोचते हैं और धीरे धीरे अपने आसपास के लोगों से बात करना बंद कर देते हैं. ऐसी परिस्थियों में वो अपने मोबाइल फोन को अपना सबसे बड़ा सहारा बना लेते हैं. और यही उनकी सबसे बड़ी गलती होती है.हमारे देश के युवाओं में मानसिक बीमारी का एक बहुत बड़ा कारण.... उनका Smart Phone है . ज़रूरत से ज़्यादा इंटरनेट का इस्तेमाल और Video Games खेलने की आदत उन्हें मानसिक रोगी बना रही है.ऐसे युवाओं को ध्यान में रखकर दिल्ली के AIIMS((अस्पताल)) में दो वर्ष पहले internet addiction Clinic खोला गया था. और पिछले एक वर्ष में इस Clinic में internet addiction के मरीज़ों की संख्या दो गुनी हो चुकी है. 

इस Clinic में हर हफ़्ते, इंटरनेट एडिक्शन के 5 से 6 मरीज़ आ रहे हैं. इनमें ज़्यादातर मरीज़, स्कूल और कालेज के छात्र हैं . यानी इंटरनेट और मोबाइल फोन की लत ने इन बच्चों को स्कूल और कॉलेज के बजाए.. अस्पताल पहुंचा दिया. इन बच्चों का इलाज कर रहे डॉक्टरों के मुताबिक इंटरनेट के ज़्यादा इस्तेमाल से बच्चों की पढ़ाई का स्तर गिर जाता है . और उनके अंदर दिमाग को इस्तेमाल करने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है. 2018 की शुरूआत में WHO ने बीमारियों की एक नई लिस्ट जारी की थी और इस लिस्ट में Video Game Addiction को एक Mental disorder माना गया था. यानी इंटरनेट और मोबाइल फोन पर Game खेलने की आदत.. मनोरंजन नहीं... बल्कि मानसिक बीमारियां दे रही है.

National Mental Health Survey के मुताबिक भारत में करीब 11 प्रतिशत लोग ऐसी मानसिक बीमारियों से पीड़ित हैं... जिन्हें तुरंत इलाज की ज़रूरत है वर्ना उनकी स्थिति, गंभीर हो सकती है. इन सारी समस्याओं का एक ही इलाज है.. और वो है संवाद. संवाद से ही युवाओं के गुस्से और डिप्रेशन को कम किया जा सकता है.

बच्चों को डांटने या उनकी पिटाई करने के बजाए उनसे संवाद कीजिए. ये समस्या घर में तनाव फैलाने के बजाए... बातचीत करके सुलझाई जा सकती है . आज हमने देश के युवाओं की मानसिक सेहत को ध्यान में रखकर एक रिपोर्ट तैयार की है. इससे आपको अपने मन की कमज़ोरियां दूर करने में मदद मिल सकती है . इस रिपोर्ट में आपको उन लोगों की पीड़ा का भी एहसास होगा जो डिप्रेशन वाले दौर से गुज़र कर... ठीक हो चुके हैं. लेकिन उनके परिवार, उन्हें वापस घर नहीं लाना चाहते.इस विषय को हल्के में मत लीजिएगा.. क्योंकि मन की बीमारियां आसानी से दिखाई नहीं देतीं.

मानसिक समस्याओं को दूर करने के लिए अपनों से संवाद करने की ज़रूरत हैं लेकिन दुख की बात ये है कि हमारे देश के ज़्यादातर लोग इस संवाद को ही एक मानसिक तनाव समझते हैं . यानी ये वो लोग हैं जो बदलाव तो चाहते हैं लेकिन बदलाव का हिस्सा नहीं बनना चाहते. 

भारत के 8 शहरों में हुए एक सर्वे मुताबिक 46 प्रतिशत लोग ये मानते हैं कि डिप्रेशन से पीड़ित लोगों से बचकर रहना चाहिए जबकि 57 प्रतिशत लोग मानसिक रोगियों से डरते हैं . 60 प्रतिशत लोगों का मानना है कि मानसिक रूप से परेशान लोगों के साथ रहने से उनकी मानसिक बीमारी का असर स्वस्थ व्यक्ति पर पड़ सकता है

68 प्रतिशत लोगों ने ये कहा कि मानसिक रूप से बीमार लोगों को कोई ज़िम्मेदारी नहीं देनी चाहिए. 44 प्रतिशत लोग मानते हैं कि मानसिक रूप से परेशान लोग कभी भी हिंसक हो सकते हैं . इस सर्वे को देखकर ये लगता है कि हमारे देश में डिप्रेशन से लड़ना बहुत मुश्किल काम है . जब देश के स्वस्थ लोगों की सोच नकारात्मक है तो वो किसी का डिप्रेशन कैसे दूर कर सकते हैं . ऐसे लोगों को अपनी सोच में बहुत बड़े और सकारात्मक बदलाव की आवश्कता है. आपको इस बात पर यक़ीन करना होगा कि आपकी एक कोशिश आपके आस-पास के लोगों की ज़िंदगी में बड़े बदलाव ला सकती है . 

अध्यात्म और विचारों की शक्ति के नज़रिए से देखा जाए तो भारत, दुनिया का सबसे अमीर देश है.हमारे देश में कई ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने आसपास के लोग से संवाद करके बदलाव की शुरूआत की . भगवान बुद्ध, भगवान महावीर, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और ओशो ऐसे विचारक हैं जिन्होंने संवाद के ज़रिए दुनिया के विचारों को बदलने का काम किया. और आज उन्हीं का देश भारत, मानसिक रूप से बीमार लोगों का देश बन गया है. ये सबसे बड़ा विरोधाभास है.