ZEE जानकारीः बांग्लादेश की सड़कों पर सुरक्षित चलने के स्वराज की मांग

एक सर्वे के मुताबिक भारत में 10 में से 9 पैदल यात्री सड़क पर असुरक्षित महसूस करते हैं. भारत की 30 प्रतिशत से भी कम सड़कों पर फुटपाथ हैं .

ZEE जानकारीः बांग्लादेश की सड़कों पर सुरक्षित चलने के स्वराज की मांग

अगर आप स्वस्थ रहना चाहते हैं तो ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलें . इससे आपकी और देश की.... दोनों की सेहत अच्छी रहेगी . ये बात सुनने में जितनी अच्छी है, इसे लागू करना उतना ही कठिन है. हमारे देश की समस्या ये है कि यहां पैदल चलने वालों के लिए कोई जगह नहीं बची है . इसके अलावा पैदल चलने वालों को सम्मान की नज़र से नहीं देखा जाता. आपने अकसर सड़कों पर ऐसे वाहन चालकों को देखा होगा जो पैदल चलने वालों को बहुत मामूली इंसान समझते हैं . उन्हें लगता है कि सड़क पर चलने का पहला हक़...गाड़ी वालों का है. सड़क और परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक -

देशभर में वर्ष 2016 में पैदल यात्रियों से जुड़ी हुईं 46 हज़ार 823 सड़क दुर्घटनाएं हुईं. इन दुर्घटनाओं में सड़क पर चलने वाले 15 हज़ार 746 पैदल यात्रियों की मौत हुई . मारे गये लोगों में 9 हज़ार 486 लोग ऐसे थे जिनकी कोई गलती नहीं थी . ये लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करते हुए सड़क पार कर रहे थे लेकिन गाड़ी चलाने वालों ने इन्हें कुचल दिया. शायद गाड़ी वालों के लिए इन पैदल चलने वालों की ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं थी.  इस परेशानी का दूसरा पहलू ये भी है कि हमारे देश में पैदल चलने वाले लोग सड़कों पर इस अपमान का विरोध कभी नहीं करते. वो सिस्टम से ये मांग नहीं करते, कि पैदल चलने वालों के लिए बनाए गये फुटपाथों से अवैध कब्जे हटाए जाएं . यहां के लोग के इस बात पर एकजुट नहीं होते हैं कि पैदल यात्रियों को.... सड़कों पर सुरक्षित चलने का स्वराज मिलना चाहिए और पैदल चलने की जगह भी मिलनी चाहिए.

ऐसे लोग चाहें तो आज अपने पड़ोसी देश बांग्लादेश से बहुत कुछ सीख सकते हैं. बांग्लादेश के लाखों युवा पिछले 8 दिनों से वहां सड़कों पर सुरक्षित चलने के स्वराज की मांग कर रहे हैं . 29 जुलाई को ढाका में एक सड़क हादसे में दो युवाओं की मौत हो गई थी. इसके बाद पूरे बांग्लादेश में छात्रों ने सरकार के ख़िलाफ आंदोलन शुरू कर दिया. इन लोगों की मांग है कि बांग्लादेश में ट्रैफिक नियमों को सख़्त बनाया जाए और सड़क दुर्घटना में दोषी व्यक्ति को मौत की सज़ा दी जाए . इस पूरे आंदोलन से सीखने वाली बात ये हैं कि ये लोग चाहते तो इस आंदोलन को सिर्फ़ दो युवाओं की मौत तक सीमित कर सकते थे लेकिन इन्होंने इस दुर्घटना को बांग्लादेश के हर पैदल यात्री की सुरक्षा से जोड़ दिया . हम इस आंदोलन में हिंसक प्रदर्शन का समर्थन नहीं करते हैं लेकिन इन लोगों की मांगों पर बांग्लादेश की सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए . 

बांग्लादेश में हर साल सड़क हादसों में करीब 21 हज़ार लोग मारे जाते हैं . इनमें 4 हज़ार लोग पैदल यात्री हैं . यहां रिश्वत के दम पर ड्राइविंग लाइसेंस मिल जाना बहुत बड़ी समस्या है . बांग्लादेश के लोग सड़क हादसों में दोषी लोगों के ख़िलाफ़ पिछले दो दशकों से कड़ी सज़ा देने की मांग कर रहे हैं . इन मामलों में भारत के लोग बहुत शांत हैं . यहां के लोग इस बात का कोई विरोध नहीं करते कि उनके हक़ के फुटपाथों पर अवैध लोगों का कब्ज़ा हैं . किसी सड़क हादसे पर यहां के लोग थोड़े से हंगामे के बाद अपने- अपने घर चले जाते हैं. वो सिस्टम पर इस बात का दबाव नहीं बनाते कि आम इंसान को सड़क पर सुरक्षित चलने का अधिकार मिले . 

एक सर्वे के मुताबिक भारत में 10 में से 9 पैदल यात्री सड़क पर असुरक्षित महसूस करते हैं. भारत की 30 प्रतिशत से भी कम सड़कों पर फुटपाथ हैं . यहां पर आपको देश के फुटपाथ पर होने वाले अवैध कब्ज़े के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए . पूरे देश में फुटपाथ पर करीब 1 करोड़ ठेले वाले हर रोज़ कारोबार करते हैं. सिर्फ दिल्ली की सड़कों पर ही 3 से 4 लाख ठेले वाले अवैध दुकानदार मौजूद हैं . 

सिस्टम ने पैदल चलने वालों के लिए बनाए गये फुटपाथ.... अवैध कब्ज़ा करने वाले दुकानदारों को बेच दिए हैं . जो जगह पैदल यात्रियों के बनाई गयी थीं वहां अब अवैध दुकानें सजा दी गई हैं . इस समस्या की वजह से पैदल यात्री सड़क पर चलने के लिए मजबूर होते हैं और फिर उनके साथ दुर्घटनाएं होती हैं.. यानी हमारे देश में फुटपाथ पर पैदल चलने वाले यात्रियों को पूरी सुरक्षा का अधिकार नहीं मिलता. इसमें परेशानी की बात ये है कि हमारे देश के लोग सड़क पर सुरक्षित चलने के अधिकार के प्रति बहुत लापरवाह हैं . वो सिस्टम से ये मांग नहीं करते कि उनके लिए बनाए गये फुटपाथ खाली कराएं जाएं.

हमारे सिस्टम के मन में पैदल चलने वालों के प्रति सम्मान का कोई भाव नहीं है . लेकिन हमारा सिस्टम अगर चाहे तो आज ब्रिटेन की राजधानी London से बहुत कुछ सीख सकता है. London की सड़कों पर पैदल चलने वाले लोगों को गाड़ियों से डर नहीं लगता. वहां पैदल चलने वाले लोगों को गाड़ी वालों के मुकाबले ज़्यादा सम्मान दिया जाता है. ये एक तुलनात्मक DNA टेस्ट है. इसे आपको ध्यान से देखना चाहिए.

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