close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

Zee Jankari: पाकिस्तान में आजादी मार्च से इमरान खान की कुर्सी हिल रही है?

DNA में अब हम पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की कुर्सी पर सियासी खतरे का विश्लेषण करेंगे. ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में इमरान खान को सत्ता से हटाने की तैयारी हो रही है. 

Zee Jankari: पाकिस्तान में आजादी मार्च से इमरान खान की कुर्सी हिल रही है?

DNA में अब हम पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की कुर्सी पर सियासी खतरे का विश्लेषण करेंगे. ऐसा लगता है कि पाकिस्तान में इमरान खान को सत्ता से हटाने की तैयारी हो रही है. वहां के कट्टरपंथी नेता मौलाना फजलुर रहमान अपने लाखों समर्थकों के साथ कल इस्लामाबाद पहुंचने वाले हैं. इस विशाल रैली को "आजादी मार्च" का नाम दिया गया है.

इस मार्च का मकसद इमरान खान की गलत नीतियों और लोकतंत्र पर हमले के खिलाफ विरोध जताना है. फजलुर रहमान 15 महीने पुरानी इमरान सरकार को हटाना चाहते हैं. दावा ये भी है कि इमरान खान के इस्तीफा देने से पहले... फजलुर रहमान, इस्लामाबाद नहीं छोड़ेंगे. अब इमरान सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं क्योंकि इस मार्च को पाकिस्तान के विपक्षी दलों का समर्थन भी हासिल है.

पाकिस्तान में एक पुरानी कहावत है कि अगर आपको सत्ता में आना या रहना है तो सिर पर 'अल्लाह-आर्मी और अमेरिका' का हाथ होना जरूरी है. संकट में घिरे पाकिस्तान में ये तीनों फैक्टर इमरान खान के खिलाफ दिखाई दे रहे हैं. पाकिस्तान में अर्थव्यवस्था से लेकर विदेश नीति तक ...हर मोर्चे पर इमरान खान फेल हो चुके हैं. पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा लगातार सरकार के काम में दखल दे रहे हैं.

यानी पाकिस्तान में एक और तख्तापलट की सिर्फ औपचारिकता ही बाकी है. और चीन के करीबी संबंधों की वजह से अमेरिका भी पाकिस्तान से खुश नहीं है. इन सब सियासी परेशानियों के बीच इमरान को मौलाना फजलुर रहमान ने बड़ा चैलेंज दिया है.

इस आजादी मार्च में पाकिस्तान के चारों प्रांत बलोचिस्तान खैबर पख्तून-ख्वा पंजाब और सिंध के दो से ढाई लाख लोग शामिल हैं. 27 अक्टूबर को कराची से इस मार्च की शुरुआत हुई थी आज सुबह ये रैली मुल्तान से चलकर लाहौर तक पहुंच गई है. और कल शाम यानी चौथे दिन इसके इस्लामाबाद पहुंचने की संभावना है. पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इमरान सरकार और आजादी मार्च के आयोजकों के बीच समझौता हो गया है. अब आजादी मार्च शांतिपूर्ण तरीके से होगा और फजलुर रहमान के समर्थक इस्लामाबाद में प्रतिबंधित जगहों पर प्रदर्शन नहीं करेंगे.

इस रैली का मकसद कश्मीर के लिए एकता का प्रदर्शन करना है. यानी फजलुर रहमान एक साथ इमरान और कश्मीर दोनों पर सियासी निशाना लगा रहे हैं. अब पहले ये जानिए कि मौलाना फजलुर रहमान कौन हैं ? और क्या फजलुर रहमान पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री बन सकते हैं ? 66 वर्ष के मौलाना फजलुर रहमान के आजादी मार्च में मदरसे, स्कूल, कॉलेज के छात्रों के साथ राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी शामिल हैं. महंगाई से त्रस्त पाकिस्तान की जनता भी आजादी मार्च को समर्थन दे रही है . फजलुर रहमान का मजहबी कार्ड सबसे मजबूत है. वो पाकिस्तान की सबसे बड़ी धार्मिक और कट्टरपंथी पार्टी 'जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम' के प्रमुख हैं .

तालिबान समर्थक मौलाना पाकिस्तान की संसद में कश्मीर कमेटी के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. इनका सियासी कनेक्शन इतना मजबूत है कि सत्ता में नहीं रहने के बावजूद नवाज शरीफ की पार्टी ने इन्हें केंद्रीय मंत्री का दर्जा दिया था. अब आपके मन में सवाल होगा कि मौलाना फजलुर रहमान इमरान खान के खिलाफ सियासी मोर्चा क्यों निकाल रहे हैं ?

पाकिस्तान में वर्ष 2018 के चुनाव में फजलुर रहमान ने इमरान खान के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने की कोशिश की थी. उनका दावा है कि चुनावों में गड़बड़ी की वजह से ही इमरान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गए थे. और अब पाकिस्तान में आर्थिक संकट के बाद मौलाना फिर से चुनाव कराने की मांग पर अड़े हुए हैं. इनका पाकिस्तान की सत्ता पर कब्जा करने का सपना काफी पुराना है.

वर्ष 2007 में भी फजलुर रहमान ने तत्कालीन मुशर्रफ सरकार को हटाकर अमेरिका के समर्थन से सत्ता पर कब्जे की कोशिश की थी. आजादी मार्च की तैयारियों को देखते हुए इमरान खान ने अपनी पार्टी को मौलाना से बातचीत की कोशिश करने के निर्देश दिए हैं. यानी इमरान की कोशिश है कि किसी भी तरह सत्ता पर अपना कब्जा बनाकर रखा जाए.

ये भी संभव है कि फजलुर रहमान के आजादी मार्च को पाकिस्तान की सेना का समर्थन हासिल हो. और कुछ समय के बाद आपको पाकिस्तान में नया प्रधानमंत्री देखने को मिले. क्योंकि पाकिस्तान में होता वही है जो वहां की सेना चाहती है. इससे पहले वर्ष 2014 में विपक्षी नेता के रूप में इमरान खान ने आजादी मार्च निकालकर 126 दिनों तक प्रदर्शन किया था. तत्कालीन नवाज शरीफ सरकार के खिलाफ हजारों लोगों ने इमरान खान के नेतृत्व में धरना दिया था . पाकिस्तान की राजनीति में जितने भी विरोध प्रदर्शन हुए हैं उनमें कंटेनरों की भूमिका सबसे खास रही है.

दुनिया भर में इनका इस्तेमाल सामान को एक से दूसरी जगह ले जाने के लिए होता है . लेकिन पाकिस्तान में इनका इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के लिए करते हैं. फजलुर रहमान के इस मार्च के लिए इस्लामाबाद में कंटेनर पहुंच चुके हैं इसमें नेताओं और प्रदर्शनकारियों के रहने का इंतजाम हो जाता है. इमरान खान सरकार ने भी कई जगहों पर कंटेनर जमा कर रखे हैं.

क्योंकि इसकी मदद से शहर बंद करना आसान होता है. इन कंटेनरों की मदद से इमरान खान शायद इस्लामाबाद बचाने में कामयाब हो जाएंगे. लेकिन अगर कट्टरपंथी फजलुर रहमान का पाकिस्तान की सत्ता पर कब्जा हो गया... तो पाकिस्तान को आतंकवादियों से कोई नहीं बचा पाएगा. पाकिस्तान में वहां की सेना. रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाती है ये सच्चाई पूरी दुनिया जानती है.

लेकिन अब पाकिस्तान की मीडिया को भी नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है. इसकी वजह है पाकिस्तान के टेलीविजन न्यूज चैनल में सरकार के खिलाफ हो रही मीडिया कवरेज. आपके मन में सवाल होगा कि क्या प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा इतने कमजोर हो गए हैं कि वो मीडिया की आवाज बंद करने की कोशिश कर रहे हैं?

पूरे मामले की शुरुआत कैसे हुई सबसे पहले ये समझिए . 26 अक्टूबर को Pakistan Electronic Media Regulatory Authority ने सभी टीवी न्यूज़ चैनलों के लिए 9 Point का आदेश जारी किया था. इसमें कहा गया कि न्यूज चैनल में शो करने वाले एंकर अपने या किसी दूसरे चैनल के Talk Show में विशेषज्ञ की तरह शामिल ना हों. इस आचार संहिता में एंकर को निष्पक्ष, तटस्थ और बिना भेदभाव... कार्यक्रम का संचालन करने का निर्देश दिया गया. और उन्हें किसी मुद्दे पर व्यक्तिगत राय या कोई फैसला देने से बचने की बात की गई थी. पाकिस्तान में टीवी चैनलों पर होने वाली बहस के लिए मेहमानों के चुनाव में भी सतर्कता बरतने और उनके ज्ञान और विशेषज्ञता को भी ध्यान में रखने के लिए कहा गया.

आपके मन में सवाल होगा कि पाकिस्तान की सरकार ऐसा क्यों कर रही है? असल में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर इस्लामाबाद हाईकोर्ट 26 अक्टूबर को फैसला देने वाली थी. और इससे एक दिन पहले कुछ पत्रकारों ने जमानत देने पर सरकार से डील होने की बात की थी. हालांकि 26 अक्टूबर को नवाज शरीफ को जमानत दे दी गई थी . आपको लग रहा होगा कि इस मुद्दे पर पाकिस्तान की सरकार गंभीर है और वो न्यूज चैनलों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है .

लेकिन सच्चाई ये है कि पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान की मीडिया में चर्चा के दौरान सरकार और सेना के काम पर सवाल उठाए गए हैं. और पाकिस्तान की सेना नहीं चाहती की उसपर कोई सवाल उठाए जाएं  उनकी कोशिश है कि जनता के बीच हमेशा उनकी हीरो वाली इमेज बनी रहे. जब पाकिस्तान की मीडिया को दिए गए दिशानिर्देश पर सवाल उठाए गए. तो इमरान सरकार ने सफाई दी कि उन्होंने कोई रोक नहीं लगाई. और ये सिर्फ एक ADVISORY है. ताकि कोर्ट में चल रहे मामलों की संवेदनशील रिपोर्टिंग हो.

पाकिस्तान में एक तरफ टेलीविजन पत्रकारों को अपनी राय देने से रोकने की कोशिश हुई. तो दूसरी तरफ मानव अधिकार की बात करने वाले कार्यकर्ताओं की आवाज भी जनता तक पहुंचने से रोक दी गई. आपको पाकिस्तान की एक तस्वीर दिखाते हैं जिसमें पाकिस्तान के मानव अधिकार कार्यकर्ता जिब्रान नासिर को Freedom Of Speech लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का मौका नहीं दिया गया. जिब्रान नासिर पाकिस्तान के कराची में सरकार के समर्थन से की जा रही गैरकानूनी हत्याओं पर सवाल उठा रहे थे. उनका आरोप है कि उसी समय पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के कुछ अफसरों ने इसे जबरदस्ती बंद करवा दिया .