Zee जानकारी : भारत में बस की सवारी लोगों की मजबूरी है

भारत में लोग बहुत मजबूरी में बस की यात्रा करते हैं और ऐसा करते हुए उन्हें कोई खुशी नहीं होती। भारत की परिवहन व्यवस्था में बसों की हिस्सेदारी 50 से 60 प्रतिशत है लेकिन भारत में उपलब्ध कुल वाहनों में बसों की संख्य़ा सिर्फ 1 प्रतिशत के आस-पास है। एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बस की सवारी भारत के लोगों की मजबूरी है। भारत में बसों की दुर्दशा का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि लोग प्रदूषण कम करने के लिए या ट्रैफिक का बोझ कम करने के लिए अपनी मर्ज़ी से बस में सवार नहीं होते बल्कि कम किराए और यातायात के दूसरे साधनों के अभाव में भारत के लोग बस से यात्रा करते हैं। भारत में दूसरों के साथ बस यात्रा का अनुभव बांटने में ज्यादातर लोगों को गर्व का नहीं बल्कि शर्म का अनुभव होता है।

Zee जानकारी : भारत में बस की सवारी लोगों की मजबूरी है

नई दिल्ली : भारत में लोग बहुत मजबूरी में बस की यात्रा करते हैं और ऐसा करते हुए उन्हें कोई खुशी नहीं होती। भारत की परिवहन व्यवस्था में बसों की हिस्सेदारी 50 से 60 प्रतिशत है लेकिन भारत में उपलब्ध कुल वाहनों में बसों की संख्य़ा सिर्फ 1 प्रतिशत के आस-पास है। एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए बस की सवारी भारत के लोगों की मजबूरी है। भारत में बसों की दुर्दशा का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि लोग प्रदूषण कम करने के लिए या ट्रैफिक का बोझ कम करने के लिए अपनी मर्ज़ी से बस में सवार नहीं होते बल्कि कम किराए और यातायात के दूसरे साधनों के अभाव में भारत के लोग बस से यात्रा करते हैं। भारत में दूसरों के साथ बस यात्रा का अनुभव बांटने में ज्यादातर लोगों को गर्व का नहीं बल्कि शर्म का अनुभव होता है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि 2014 से 2015 के दौरान भारत के अलग-अलग राज्यों में बस से यात्रा करने वाले लोगों की संख्या 2542 करोड़ थी यानी दुनिया की कुल आबादी से करीब 4 गुना ज्यादा लोग भारत में हर साल बस से यात्रा करते हैं।

भारत के कुल वाहनों के मुकाबले बसों की संख्या हर साल कम हो रही है।1951 में बसें वाहनों की कुल आबादी का 11 प्रतिशत थी लेकिन 2011 तक ये हिस्सेदारी 1.1 प्रतिशत की रह गई।

परिवहन व्यवस्था में इतनी बड़ी हिस्सेदारी के बावजूद भारत में बसों को लेकर कोई भी सरकार गंभीर नज़र नहीं आती। दिल्ली-मुंबई-बैंगलुरु जैसे बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए तो भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में बसों की सवारी करना जान जोखिम में डालने जैसा है। ओवरलोडेड, पुरानी और खटारा बसें छोटे शहरों और गावों की सड़कों पर दौड़ती हैं। इन शहरों और गावों को जोड़ने वाली प्राइवेट और सरकारी बसों में यात्री ठूंसकर भर लिए जाते हैं। यात्रियों के बोझ से आधी झुकी हुई ये बसें नियमों की परवाह किए बगैर सड़कों पर दौड़ती हैं। ये बसें कई बार दुर्घटनाग्रस्त भी हो जाती हैं लेकिन फिर भी ज्यादातर राज्यों की सरकारें बस ट्रांसपोर्ट में कोई बड़ा सुधार नहीं करना चाहतीं।

हमने दिल्ली-एनसीआर और मुंबई में बस ट्रांसपोर्ट सिस्टम का एक तुलनात्मक अध्ययन करके ये पता लगाने की कोशिश की है कि भारत की परिवहन व्यवस्था इतनी बेबस क्यों है। बड़े शहरों में बस ट्रांसपोर्ट सिस्टम की बदहाली देखकर आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में क्या हाल होता होगा।

दिल्ली सरकार के मुताबिक दिल्ली में DTC के पास इस वक्त करीब 5 हज़ार 500 बसें हैं जबकि गैरसरकारी आंकड़े कहते हैं कि दिल्ली में बसों की संख्या 4500 के आस पास है लेकिन ये दोनों ही आंकड़े दिल्ली वालों की जरूरत से काफी कम हैं जबकि दिल्ली सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट में माना है कि दिल्ली में करीब 10 हज़ार बसें होनी चाहिएं लेकिन दिल्ली वालों के पास इससे आधी बसें ही हैं।

-मुंबई और आसपास के इलाकों में बसों का संचालन करने वाली BEST के पास करीब 3 हज़ार 888 बसें है जबकि मुंबई में 4500 बसों की जरूरत है।
-यानी बड़े-बड़े बजट वाले भारत के बड़े शहर, बसों की भारी कमी से जूझ रहे हैं..आप सोच सकते हैं कि भारत के छोटे शहरों में क्या हाल होगा।
-अर्बन प्लानिंग के पैमानों के मुताबिक प्रति 1 लाख लोगों की आबादी पर 40 बसें होनी चाहिए लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में प्रति 1 लाख लोगों पर सिर्फ 28 बसें उपलब्ध हैं।
-पूरे देश की बात करें तो भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर 131 बसें हैं जबकि खुद सरकार का मानना है कि प्रति 10 लाख लोगों पर कम से 400 बसें होनी चाहिए।
-नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में सिर्फ कर्नाटक ऐसा राज्य है जहां प्रति 10 लाख लोगों पर 393 बसें है जबकि सबसे बुरा हाल बिहार का है जहां प्रति 10 लाख लोगों पर सिर्फ 2 बसें हैं।
-एक बस की उम्र औसतन 10 साल मानी जाती है यानी 10 साल के बाद बसें सेवा देने लायक नहीं रहती हैं लेकिन सड़क एवं परिवहन मंत्रालय की 2014-15 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 100 प्रतिशत बसें 10 साल से ज़्यादा पुरानी हैं।
-पश्चिम बंगाल में करीब 68 प्रतिशत सरकारी बसें और तमिलनाडु में करीब 67 प्रतिशत बसें 10 साल से ज्यादा पुरानी हैं।
-भारत में सिर्फ पुणे महामंडल और पंजाब रोडवेज़ इकलौती ट्रांसपोर्ट कंपनियां है जिनके बेड़े में कोई भी बस 10 साल से पुरानी नहीं है। 

भारत में ट्रांसपोर्ट व्यवस्था के ये बेबस आंकड़े देखने के बाद आपको भी अपनी बस यात्राएं याद आ रही होंगी। हमें लगता है कि इनमें से ज्यादातर के साथ आपका अनुभव अच्छा नहीं रहा होगा। हालांकि भारत के कुछ शहर ऐसे हैं जिन्होंने बस सेवाओं को बेहतर किया है लेकिन अभी भी ये ग्लोबल स्टैंडर्ड से बहुत पीछे हैं जबकि भारत के ज्यादातर राज्य और शहर आम लोगों को बस सर्विस के नाम पर सिर्फ तकलीफ दे रहे हैं। हमने भारत की बहुत बड़ी आबादी की इसी तकलीफ का एक DNA टेस्ट किया है।

बता दें कि भारत में सरकारी बसों का संचालन ज्यादातर राज्यों के लिए नुकसान का सौदा है DTC और BEST समेत देश की ज्यादातर सरकारी बस कंपनियां नुकसान में चल रही हैं।

-वर्ष 2014-15 में सबसे ज्यादा नुकसान DTC को हुआ था। DTC को 3991 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था।
-जबकि BEST ने 2016 की पहली तिमाही तक करीब 900 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया था।
-वैसे भारत के ज्यादतर राज्य Bangalore Metropolitan Transport Corporation यानी BMTC से सबक ले सकते हैं।
-BMTC ने 2015-2016 में करीब 34 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। 
-BMTC के पास दिल्ली और मुंबई के मुकाबले ज्यादा बसें है। BMTC इस वक्त करीब 6 हज़ार 388 बसों का संचालन कर रही है। 
-BMTC हर साल अपने बेड़े यानी Fleet में नई और आरामदायक बसों को शामिल कर रही है।
-BMTC की एक बस दिन भर में औसतन 270 किलोमीटर की दूरी तय करती है।
-जबकि मुंबई में ये औसत 210 किलोमीटर और दिल्ली में 180 किलोमीटर का है। 
-दिल्ली में Traffic congestion की वजह से DTC पूरी क्षमता से बसों का संचालन नहीं कर पाती है। खराब ट्रैफिक और बड़ी और Low Floor बसों के मुड़ने के लिए जगह का अभाव DTC बसों के संचालन में सबसे बड़ी रुकावट है।

आपने गौर किया होगा कि अक्सर बस स्टॉप्स ऐसी जगहों पर बना दिए जाते हैं जहां बसों के खड़े होने के लिए जगह बेहद कम होती है। कई बार तो बस स्टॉप्स का निर्माण ऐसी जगह कर दिया जाता है जहां फ्लाई ओवर खत्म हो रहा होता है। ऐसी जगहों पर बसों के रुकने से ट्रैफिक जाम हो जाता है और वाहनों को रास्ता नहीं मिल पाता। इसी तरह यू-टर्न से मुड़ते ही बस स्टॉप बना दिए जाते हैं जो शहरों में ट्रैफिक जाम की वजह बनते हैं।

यानी आप कह सकते हैं कि सड़कों पर बसों को चलाने से पहले हमें उन कमियों को दूर करना होगा जिनकी वजह से बस से सफर करना ना सिर्फ थकान भरा साबित होता है। बल्कि आधी अधूरी अर्बन प्लानिंग की वजह से बसें ट्रांसपोर्ट सिस्टम को सपोर्ट करने के बजाय परेशानी की वजह बन जाती है। बसें जब अपनी पूरी रफ्तार और क्षमता से नहीं चल पाती तो उनमें बार बार ब्रेक डाउन की समस्या आ जाती है। दिल्ली में करीब 500 से 600 बसें ब्रेक डाउन और दूसरी समस्याओं की वजह से डिपो में खड़ी रहती हैं।

एक बस एक कार के मुकाबले सिर्फ 2.5 गुना ज्यादा जगह घेरती है जबकि बस में एक बार में कम से कम 40 लोग सफर कर सकते हैं। फिर भी दिल्ली जैसे शहरों में बसों का संचालन ठीक से नहीं हो पाता और इसकी वजह है खराब और पिछड़ी हुई अर्बन प्लानिंग यानी अगर दिल्ली में बसों की संख्या दो गुनी भी हो जाए तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि इन बसों का संचालन ठीक से हो पाएगा।