ZEE जानकारी: क्या भारत की न्याय व्यवस्था में क्रांति की जरूरत है

4G वाले भारत में कानून की कछुए वाली रफ्तार अब जनता को स्वीकार नहीं है. इसलिए रेप के मामलों में दोषियों को तय वक्त में सज़ा मिलनी चाहिए और सबसे ज़रूरी है कि न्याय प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव होने चाहिए जिससे देश की जनता को अदालत से इंसाफ मिलने पर जश्न मनाने का मौका मिलना चाहिए. 

ZEE जानकारी: क्या भारत की न्याय व्यवस्था में क्रांति की जरूरत है

देशभर में जिस तरह का High जोश दिख रहा है, उसका एक मतलब ये भी हो सकता है कि अब भारत की न्याय व्यवस्था में क्रांति की जरूरत है. अब सवाल ये है कि निचली अदालतों में सज़ा मिलने के बाद उसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए Deadline कब तय की जाएगी? इस देश में हर जरूरी काम के लिए Deadline है. आपके घर और ऑफिस में भी काम पूरा करने के लिए Deadline होती है. ये प्रोग्राम DNA, जिसे आप देख रहे हैं इसकी भी Deadline है. आपके घर पिज्जा पहुंचाने के लिए भी एक Deadline तय है. लेकिन जब देश की बेटियों के साथ कोई अनहोनी हो जाए तो दोषी को सज़ा कितने वर्षों में मिलेगी इसकी कोई Deadline नहीं है. अगर किसी मामले में निचली अदालत ने फांसी की सज़ा दी... तो उसके बाद सुप्रीम कोर्ट तक ये सुनवाई कितने वर्षों तक चलती रहेगी इसकी भी कोई समयसीमा नहीं है. और सुप्रीम कोर्ट ने भी अगर फांसी की सजा को बरकरार रखा. तो दया याचिका को कब तक राष्ट्रपति के पास भेजा जाए. इसकी भी कोई Deadline तय नहीं है. समय सीमा तय ना होने की वजह से ही देश की अदालतों में वर्षों तक मामले चलते रहते हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक देश की निचली अदालतों में किसी भी मामले की सुनवाई में करीब 3 से साढ़े 9 वर्ष का समय लगता है. औसतन High Courts में किसी केस की सुनवाई 4 वर्ष से अधिक समय तक चलती है. और इसकी बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर Courts में न्यायाधीशों की कमी है. देश के 18 High Courts में न्यायाधीशों के 25 प्रतिशत से ज्यादा पद खाली हैं.

हम अपने बजट का 1 प्रतिशत भी न्यायपालिका पर खर्च नहीं करते हैं. अगर हम अपनी न्याय व्यवस्था के लिए पर्याप्त धन खर्च करें तो... हमारी न्याय व्यवस्था में तेजी आ सकती है. और वर्षों से Pending मुकदमे जल्द खत्म हो सकते हैं. देश में क्रांति के बाद अक्सर बड़े बदलाव होते हैं... इस मौके का इस्तेमाल करके सरकार और न्यायपालिका चाहे तो हमारे देश को 'तारीख पर तारीख' वाले अभिशाप से मुक्ति दे सकते हैं.

गोलियों से इंसाफ करने वाली फिल्मी मानसिकता को अगर हमारा सिस्टम और समाज अपनाने लगे तो ये हमारी न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है. न्याय और लोकतंत्र पर विश्वास रखने वाले किसी भी राष्ट्र के लिए ये शुभ संकेत नहीं हो सकता.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करता है लेकिन इस घटना के बाद फैसला On The Spot वाली मानसिकता बढ़ने का भी डर है. कहीं ऐसा ना हो जाए कि हमारा सिस्टम सुपारी किलिंग की ओर बढ़ जाए. सबसे बड़े लोकतंत्र और एक जिम्मेदार देश के तौर पर ये एक बड़ा सवाल है क्योंकि ऐसा तो तालिबान करता है. आतंकवादी संगठन ISIS करता है. ज्यादातर ऐसी घटनाएं इस्लामिक देशों में देखने को मिलती हैं. कई इस्लामिक देशों में रेप के आरोपियों को पत्थर से पीटकर मार दिया जाता है. तो नॉर्थ कोरिया जैसे देश में रेप के गुनहगारों के सिर पर गोली मार दी जाती है. कई मामलों में ऐसा सार्वजनिक तौर पर भी किया जाता है. यहां तक कि पाकिस्तान और चीन में भी तय समय सीमा के अंदर बलात्कारियों को फांसी की सजा देने का प्रावधान है.

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अब हम आपको इस्लामिक देश यमन का एक वीडियो दिखाना चाहते हैं. ये वीडियो वर्ष 2017 का है. जिसमें यमन का एक पुलिस अधिकारी रेप के आरोपी को लोगों के सामने बीच सड़क पर गोली मार देता है. इस आरोपी ने एक 4 वर्ष की बच्ची से रेप करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी. इस एनकाउंटर की पूरी तस्वीर हम आपको नहीं दिखा सकते. लेकिन 25 सेकेंड का ये वीडियो...सुपारी किलिंग वाले डर को महसूस कराने के लिए काफी है. हमारा सिस्टम भी अगर इसी तरह आरोपियों का एनकाउंटर करके इंसाफ देने लगे तो फिर उसकी तुलना उन इस्लामिक देशों के साथ होगी जहां इस तरह की घटनाएं आम बात है.

हैदराबाद में आज जो कुछ हुआ उसे देखकर बहुत सारे लोग ये कह रहे हैं कि ऐसा तो फिल्मों में होता है. कहते हैं सिनेमा समाज का आईना होता है. यानी फिल्मों में वही दिखाया जाता है जो कुछ हमारे समाज में और देश में होता है या हो चुका होता है. लेकिन कभी कभी हमारा समाज और हमारा सिस्टम भी सिनेमा का आईना बन जाता है. आपने कई ऐसी फिल्में देखी होंगी जिसमें एक पुलिस अधिकारी...किसी बलात्कारी को सजा देने के लिए कानून अपने हाथ में ले लेता है. खुद जज बन जाता है और गुनहगार का एनकाउंटर कर देता है. और ऐसे दृश्यों पर दर्शक खूब ताली भी बजाते हैं. इसी तरह आज हैदराबाद में पुलिस ने रेप के आरोपियों का एनकाउंटर किया और इसके बाद लोगों ने पुलिस के लिए तालियां बजाईं, जश्न मनाया. आज आपको कुछ फिल्मी दृष्यों की मदद से ये समझना चाहिए कि अब असल जिंदगी में भी लोग जल्द से जल्द Climax तक पहुंचना चाहते हैं.

आज पूरा देश इस एनकाउंटर के साथ खड़ा दिख रहा है. ऐसे अपराधियों के साथ फैसला On The Spot वाले कदम की तारीफ सड़क से संसद तक हो रही है. आपको याद होगा..हैदराबाद में रेप की घटना के बाद देश के कानून निर्माताओं ने आरोपियों की सार्वजनिक लिंचिंग की मांग की थी. राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने संसद में ये कहा था रेप के आरोपियों की लिंचिंग होनी चाहिए. और अब रेप के आरोपियों के एनकाउंटर के बाद देश की ज्यादातर महिला सांसद...फिर चाहे वो किसी भी पार्टी की हों...सभी एनकाउंटर की घटना से खुश दिख रही हैं.

संदेश साफ है कि महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों को लेकर अब सड़क हो या संसद महिलाएं चुप नहीं रहने वाली हैं. ये देश फैसले के लिए अब वर्षों का इंतज़ार नहीं करेगा. ये वो लोग हैं जिनपर कानून बनाने की जिम्मेदारी है और आपने देखा ये सभी एनकाउंटर को सही ठहरा रहे हैं. लेकिन देश में कुछ पत्रकारों..नेताओं और मानवाधिकार के ठेकेदारों का एक वर्ग ऐसा भी है जो इस एनकाउंटर को साजिश के तौर पर देख रहा है. उन्हें अब बलात्कार जैसा गंभीर अपराध करने वाले भी..अब पीड़ित दिखने लगे हैं. ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी Air Conditioned कमरों में बैठकर...भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं. लेकिन अब भी वो देश के मूड को समझ नहीं पा रहे हैं.

हैदराबाद में गैंगरेप के आरोपियों के एनकाउंटर पर पूरे देश में जश्न मनाया गया. लेकिन हमारे देश के कुछ सांसद एनकाउंटर पर सवाल भी उठा रहे हैं. हैदराबाद के सांसद और AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी और उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर से बीजेपी सांसद मेनका गांधी ने एनकाउंटर को गलत बताया.. मेनका गांधी ने कहा कि अगर ऐसे ही एनकाउंटर होने लगेंगे तो कोर्ट और पुलिस की क्या जरूरत है... जबकि असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि जब हम मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब को न्यायिक प्रक्रिया से फांसी दिला सकते हैं तो फिर एनकाउंटर की क्या जरूरत है. 

आज हमने न्याय व्यवस्था की सुस्त रफ्तार वाली इस समस्या का विश्लेषण किया और इसके बाद..इसका समधाऩ भी तलाशने की कोशिश की. इसके लिए हमने कई विशेषज्ञों से बात की और कानून का जानकारों की भी राय ली. इन सबसे बात करके हमें ये पता लगा कि समस्या का सबसे बड़ा समाधान है न्याय की डिलिवरी के लिए Deadline यानी समय सीमा तय करना. अगर पुलिस वक्त पर चार्जशीट फाइल कर दे, सबूतों से छेड़छाड़ ना हो और पीड़ित और उसके परिवार को सुरक्षा मिले तो न्याय की राह आसान हो सकती है और सबसे ज़रूरी बात ये है कि अदालतों को भी पीड़ित को न्याय देने के लिए एक Time Frame तय करना होगा और निश्चत तारीख तक फैसला सुना देना होगा.

कहा जाता है Justice Delayed Is Justice Denied हैदराबाद में एनकाउंटर के बाद इस बात को पूरे देश को... पूरे सिस्टम को... और हमारी न्याय व्यवस्था को बहुत गंभीरता से विचार करने की जरूरत है. आखिर हैदराबाद के इस एनकाउंटर के और क्या संदेश हैं. इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने कानून के जानकारों से बातचीत की... उनका मानना है कि नए भारत में न्याय व्यवस्था में रफ्तार की क्रांति बहुत जरूरी है. 

4G वाले भारत में कानून की कछुए वाली रफ्तार अब जनता को स्वीकार नहीं है. इसलिए रेप के मामलों में दोषियों को तय वक्त में सज़ा मिलनी चाहिए और सबसे ज़रूरी है कि न्याय प्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव होने चाहिए जिससे देश की जनता को अदालत से इंसाफ मिलने पर जश्न मनाने का मौका मिलना चाहिए. एनकाउंटर पर नहीं. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और सड़क पर एनकाउंटर से इंसाफ हमारे लिए आदर्श नहीं हो सकते हैं. हमारा आदर्श हमारा संविधान है, जहां पर अपराध करने वाले गुनहगार को भी अपने बचाव का अधिकार देते हैं लेकिन हमें ये भी तय करना होगा कि अपराधी को बचाव के नाम पर कोर्ट से तारीख पर तारीख लेने की आज़ादी नहीं मिलनी चाहिए.