ZEE जानकारी: इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू चलेगा भ्रष्टाचार का मुकदमा

नेतन्याहू इजराइल में सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले प्रधानमंत्री हैं. उन्हें वहां का सबसे शक्तिशाली नेता माना जाता है और इजरायल के इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसे गंभीर आरोप लगे हैं. नेतन्याहू पर धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी और विश्वासघात करने के तीन आरोप लगे हैं. यानी कामयाबी का रिकॉर्ड बनाने के साथ नेतन्याहू पर असफलता का दाग भी लगा है. 

ZEE जानकारी: इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू चलेगा भ्रष्टाचार का मुकदमा

दुनिया के बहुत कम देश ऐसे हैं जहां प्रधानमंत्री पद के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत है. इजरायल की गिनती ऐसे ही देशों में की जाती है और वहां के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के आरोपों के तहत मुकदमा चलाया जाएगा. ये अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है, इसलिए आज हम इसका एक संक्षिप्त विश्लेषण करेंगे. नेतन्याहू इजराइल में सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले प्रधानमंत्री हैं. उन्हें वहां का सबसे शक्तिशाली नेता माना जाता है और इजरायल के इतिहास में पहली बार किसी प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसे गंभीर आरोप लगे हैं. नेतन्याहू पर धोखाधड़ी, रिश्वतखोरी और विश्वासघात करने के तीन आरोप लगे हैं. यानी कामयाबी का रिकॉर्ड बनाने के साथ नेतन्याहू पर असफलता का दाग भी लगा है. 

इजरायल के अटॉर्नी जनरल ने 3 साल की जांच के बाद नेतन्याहू के खिलाफ 63 पेज की रिपोर्ट पेश की है लेकिन इजरायल की Special Force के टीम लीडर रह चुके नेतन्याहू आसानी से हार मानने वालों में नहीं हैं. नेतन्याहू ने आरोप लगाया है कि विरोधियों और मीडिया ने उन्हें निशाना बनाया है और उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए तख्तापलट का षडयंत्र हो रहा है. नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे मामलों को केस 1 Thousand केस 2 Thousand और केस 4 Thousand के नाम से जाना जाता है. इजरायल के अटॉर्नी जनरल ने जुलाई 2016 में इन मामलों की जांच का आदेश दिया था और पिछले महीने इन तीनों केस पर आखिरी सुनवाई हुई थी. 

केस 1 Thousand में नेतन्याहू पर धोखाधड़ी करने और भरोसा तोड़ने के आरोप लगे हैं. आरोप हैं कि एक अमीर दोस्त से किसी काम के बदले उन्हें 1 करोड़ रुपए से ज्यादा के महंगे तोहफे मिले. दूसरा मामला यानी केस 2 Thousand पेड न्यूज़ से जुड़ा मामला है. इसमें एक अखबार के Publisher के साथ उन्होंने अपनी पार्टी की बढ़िया कवरेज के लिए डील की थी. इसके बदले में नेतन्याहू ने विरोधी अखबार की सर्कुलेशन को कम करने का वादा किया था. 

और नेतन्याहू पर सबसे ज्यादा गंभीर आरोप लगे हैं केस 4 Thousand में. इसमें नेतन्याहू पर रिश्वत लेने के आरोप हैं. दावा है कि नेतन्याहू ने एक टेलीकम्युनिकेशन कंपनी के पक्ष में फैसले लिए. इन फैसलों की वजह से इस कंपनी को साढ़े 3 हजार करोड़ रुपए का फायदा हुआ और बदले में कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर नेतन्याहू के पक्ष में Positive खबरों को जगह दी. यानी इससे नेतन्याहू को राजनीतिक फायदा पहुंचाया गया. 

नेतन्यूह पर आरोप ऐसे वक़्त में लगे हैं जब इजरायल में राजनीतिक संकट जैसे हालात हैं. पिछले 8 महीनों में यहां दो बार चुनाव हुए हैं लेकिन किसी भी पार्टी या गठबंधन को बहुमत नहीं मिला है. नेतन्याहू के विरोधी Benny Gantz(बेनी गैंट्ज) को सरकार बनाने का मौका मिला लेकिन वो भी इस कोशिश में नाकाम रहे हैं. अब एक साल में तीसरा चुनाव रोकने के लिए इजरायल में कोशिशें चल रही हैं. हालांकि नेतन्याहू के खिलाफ अभी औपचारिक तरीके से आरोप लगाए गए हैं और वो इन मामलों में दोषी साबित नहीं हुए हैं. उनके लिए राहत की बात ये है कि अभी उन्हें पद छोड़ने की जरूरत नहीं है और इन मुकदमों का फैसला आने में वर्षों का वक्त लग सकता है लेकिन ऐसे आरोपों से नेतन्याहू की राजनीतिक शक्ति कमजोर होगी और अगले चुनाव में उनके जीतने की संभावना पर भी असर पड़ेगा. 

बेंजामिन नेतन्याहू किसी भी दूसरे नेता से ज्यादा 4 बार इजरायल के प्रधानमंत्री बने और कुल मिलाकर 13 वर्षों तक प्रधानमंत्री पद पर रहे. इजरायल में उनके शासन को Golden Period के नाम से जाना जाता है. वहां की जनता मानती है कि नेतन्याहू ने इजरायल के मुद्दों को पूरी मजबूती के साथ दुनिया के सामने रखा. नेतन्याहू को इजरायल के दुश्मन यानी अरब देशों का समर्थन भी मिला . इस दौरान भारत और इजरायल के रिश्ते बेहतर हुए लेकिन इसके बावजूद नेतन्याहू अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित नहीं कर पाए.  

नेतन्याहू के खिलाफ अगले कुछ महीनों में मुकदमा दर्ज हो सकता है लेकिन इजरायल के कानून के मुताबिक इन आरोपों के बावजूद नेतन्याहू के लिए इस्तीफा देना जरूरी नहीं है. जब तक नेतन्याहू पर आरोप साबित ना हो जाएं तब तक वो निर्दोष माने जाएंगे और प्रधानमंत्री पद पर बने रह सकते हैं. 

इजरायल के कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस मुकदमे सुनवाई में 2 वर्ष भी लग सकते हैं. अगर नेतन्याहू पर घूस लेने का आरोप साबित हो जाए तो उन्हें 10 साल और विश्वासघात के लिए 3 साल की सजा संभव है. अगर पद पर रहते हुए नेतन्याहू कोर्ट में खुद का बचाव करेंगे तो उनकी मजबूत नेता की छवि पर बुरा असर पड़ेगा. हालांकि इजरायल की सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर नेतन्याहू को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया जा सकता है. वहां की सर्वोच्च अदालत ने एक कैबिनेट मंत्री को आरोप तय होने के बाद इस्तीफा देने का आदेश दिया था. लेकिन पहले ये तय करना होगा कि क्या प्रधानमंत्री पर भी ये नियम लागू होगा? हालांकि नेतन्याहू इसके बावजूद अपना राजनीतिक करियर बचा सकते हैं. नेतन्याहू के सहयोगी दल इजरायल की संसद में नया कानून बना सकते हैं ताकि प्रधानमंत्री पद पर बने रहने तक उन्हें इस मुकदमे से छुटकारा मिल जाए. हालांकि नेतन्याहू और उनके दोस्त अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump का हाल एक जैसा ही है. 

इजरायल में प्रधानमंत्री का पद सबसे शक्तिशाली है और वहां पर प्रधानमंत्री की मर्जी के बिना कोई काम नहीं होता है. इसके बावजूद नेतन्याहू के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच सिर्फ 3 वर्षों में पूरी हो गई लेकिन हमारे देश में भ्रष्टाचार करना जितना आसान है भ्रष्टाचारियों को सज़ा मिलना उतना ही मुश्किल काम है. भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार की समस्या एक पुरानी बीमारी की तरह है. 44 वर्ष पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर चुनाव में भ्रष्टाचार का आरोप लगा था लेकिन पद छोड़ने के बदले उन्होंने वर्ष 1975 में देश में इमरजेंसी लगा दी थी. 21 महीनों तक भारत में आपातकाल लगा रहा. इसे भारत के लोकतंत्र का काला अध्याय भी कहा जाता है. 

इसी तरह तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता पर भ्रष्टाचार के मामले में 21 वर्षों की सुनवाई के बाद फैसला आया था और इस दौरान 11 वर्षों तक वो मुख्यमंत्री पद पर रहीं. हमारे देश में भ्रष्टाचार के दोषियों को गंभीर मामले में भी बहुत कम सजा मिलती है और ये सजा भी तब मिलती है जब भ्रष्टाचार का दोष साबित होता है. सच्चाई ये है कि देश की अदालतों में आज भी नेताओं से जुड़े मामलों की हजारों फाइलें.. धूल के नीचे दबी रहती हैं.  

भारत की सुप्रीम कोर्ट में 4 हजार 122 क्रिमिनल केस वर्तमान और पूर्व सांसदों और विधायकों के खिलाफ विचाराधीन हैं. इनमें कई केस तो 30 वर्ष से भी ज्यादा पुराने हैं. इन 4 हजार 122 मामलों में आधे से ज्यादा((2324)) वर्तमान सांसदों और विधायकों के खिलाफ दर्ज हैं और 1675 केस भूतपूर्व नेताओं के खिलाफ लंबित हैं. और ये समस्या भारत के किसी एक हिस्से में नहीं बल्कि पूरे देश में समान रूप से पाई जाती है. इसलिए देश के 724 में से 440 जिलों में ऐसे केस विचाराधीन हैं और ये आंकड़े सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देशित जांच में मिले हैं. 

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हमारा देश और यहां का सिस्टम चाहे तो इजरायल से सबक ले सकता है क्योंकि भारत में अगर आप सांसद या विधायक हैं तो सबसे पहले पुलिस आपके खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं करेगी और अगर किसी तरह केस दर्ज हो भी गया तो वो फाइलों में ही बंद होकर रह जाएगा. उन पर कोई कार्रवाई होने की संभावना नहीं के बराबर है. वैसे ये बाद हमारे देश की जनता भी सौ प्रतिशत समझती है. हमारे देश में चुनाव और नेताओं पर अध्ययन करने वाली संस्था Association for Democratic Reforms यानी ADR ने एक सर्वे किया और दो सवालों का जवाब जानने की कोशिश की. पहला सवाल, आपराधिक मामलों में आरोपी लोगों को राजनीतिक पार्टियां टिकट क्यों देती हैं ? और दूसरा सवाल ये कि आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार चुनाव कैसे जीत जाते हैं?

इस सर्वे के बाद पता चला कि बाहुबली नेताओं में लोग रॉबिन हुड वाली छवि देखते हैं. उन्हें लगता है कि अगर उनका नेता बाहुबली होगा तो नियमों को तोड़-मरोड़कर लोगों की भलाई के लिए काम करेगा. कई बार लोगों को ये भी लगता है कि नेताओं पर चल रहे मामले राजनीतिक साज़िश का नतीजा होते हैं..यानी उन्हें जान-बूझकर झूठे मुकदमों में फंसा दिया जाता है. जबकि कई बार आपराधिक छवि के उम्मीदवार को वोट देने के अलावा मतदाताओं के पास कोई और बेहतर विकल्प ही नहीं होता क्योंकि सभी पार्टियों के उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले चल रहे होतें हैं. भारत में भ्रष्टाचार के फलने-फूलने की एक बड़ी वजह समाज की सोच भी है... हम भारतीय भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलते तो हैं लेकिन मौका आने पर ज्यादातर लोग भ्रष्टाचार को गले भी लगा लेते हैं.