ZEE जानकारीः मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा बनने का सफर

महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई और खादी को अपनाया. एक तरह से आप ये भी कह सकते हैं कि उन्होंने खादी के धागों से पूरे देश को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की.

ZEE जानकारीः मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा बनने का सफर

2 अक्टूबर का दिन, देश की जनता के लिए राष्ट्रीय अवकाश या सरकारी छुट्टी का दिन होता है, जबकि नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए ये दिन सेमीनार, सभाएं और गोष्ठियां करने का दिन होता है . इस मौके पर बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं . बहुत सारे नेता और बुद्धिजीवी अपने भाषणों की तैयारियां करने के लिए गांधी जी के उपदेशों के Notes बनाते हैं. लेकिन कार्यक्रम खत्म होने के बाद महात्मा गांधी के विचारों को किसी Freezer में रख दिया जाता है.. जिसे हिंदी में ठंडा बस्ता कहते हैं. हमें लगता है कि गांधी जी को इस ठंडे बस्ते से बाहर निकालना बहुत ज़रूरी है. 

विविध संस्कृति और भाषा वाले हमारे देश भारत को एक सूत्र में बांध कर रखने में महात्मा गांधी के महान व्यक्तित्व की बहुत बड़ी भूमिका रही है. लेकिन महात्मा गांधी के उन आदर्शों को हमारा ही समाज और सिस्टम भूल चुका है. महात्मा गांधी की तस्वीरें सरकारी दफ्तरों में लगी होती हैं और इन्हीं सरकारी दफ्तरों में महात्मा गांधी की फोटो के सामने.. अधिकारी घूस लेते हैं . जनता का खून चूसकर अपनी जेबें भरते हैं . झूठ बोलते हैं. गलत रिपोर्ट तैयार करते हैं और आम लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं. महात्मा गांधी की प्रतिमाएं.. देश के ना जाने कितने चौराहों पर स्थापित होंगी. लेकिन उनकी प्रतिमा को साक्षी मानकर सड़कों और चौराहों पर हर तरह के बुरे काम किए जाते हैं. गांधी जी की तस्वीर अब लोगों को सिर्फ एक ही जगह अच्छी लगती है.. और वो हैं नोट. ज़रा सोचिए क्या भारतीयों को गांधी जी की तस्वीर सिर्फ नोटों पर ही चाहिए?

उन्होंने कहा था कि बुरा मत देखो.. बुरा मत बोलो और बुरा मत सुनो.. लेकिन विडंबना ये है कि हमारे देश में बुरी चीज़ें देखी भी जा रही हैं.. सुनी भी जा रही हैं और बोली भी जा रही हैं. अभिव्यक्ति की आज़ादी का जितना दुरुपयोग हमारे देश में होता है, उतना दुनिया के किसी और देश में नहीं होता. लेकिन भारत के इन सभी विरोधाभासों के बावजूद, पूरी दुनिया ने महात्मा गांधी को अपनाया है. आज महात्मा गांधी एक Global Brand बन चुके हैं. 

दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में गांधीजी की मूर्तियां हैं. 70 देशों के 250 से ज्यादा शहरों की सड़कें गांधी के नाम पर हैं. अब तक महात्मा गांधी पर पूरी दुनिया के 150 देश 800 प्रकार के डाक टिकट जारी कर चुके हैं. गांधी जी पर 45 फिल्में और 500 Documentaries बन चुकी हैं. 1982 में उन पर बनी फिल्म Gandhi को 8 Oscar Award मिले थे. एक अनुमान के मुताबिक महात्मा गांधी पर करीब 90 हज़ार किताबें लिखी गई हैं. Luxury Pen बनाने वाली एक विदेशी कंपनी ने 2009 में सोने की निब वाला एक पेन लॉन्च किया था, जिसकी कीमत 14 लाख रुपये थी. इस पेन की निब पर महात्मा गांधी बने हुए थे. 

1931 में दुनिया के महान वैज्ञानिक Albert Einstein ने महात्मा गांधी को एक चिट्ठी लिखी थी. इस चिट्ठी से आपको महात्मा गांधी की महानता का एहसास होगी. उन्होंने लिखा था कि आपने अपने काम के ज़रिए ये दिखाया है कि अहिंसा के रास्ते पर चलकर भी कामयाबी हासिल की जा सकती है. हम उन लोगों का भी अहिंसा से मुकाबला कर सकते हैं जिन्होंने हिंसा का रास्ता नहीं छोड़ा है. हमें उम्मीद है कि आपका काम और आपकी मिसाल सिर्फ आपके देश की सरहदों तक सीमित नहीं रहेगी. बाकी दुनिया भी इससे सबक लेगी. ये एक ऐसी व्यवस्था कायम करने में मददगार होगा जिसका सब सम्मान करेंगे. 

मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा बनने का सफर उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति से पूरा किया. भारत से बाहर दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए महात्मा गांधी ने 21 वर्षों तक वहां के अश्वेत लोगों के लिए संघर्ष किया. इतिहास की किताबों में महात्मा गांधी को बहुत से लोगों ने एक ज़िद्दी भारतीय भी बताया है. ऐसा कहा जाता है कि उनकी ज़िद उनकी सबसे बड़ी शक्ति थी. इस ज़िद के दम पर महात्मा गांधी ने भारत को अहिंसा का कवच पहना दिया. और अंग्रेज़ी हुकूमत की बंदूकें fail हो गईं. 

महात्मा गांधी ने विदेशी कपड़ों की होली जलाई और खादी को अपनाया. एक तरह से आप ये भी कह सकते हैं कि उन्होंने खादी के धागों से पूरे देश को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की. उन्होंने स-विनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह जैसे कई Innovation किए. और अहिंसक क्रांति का आविष्कार किया. ऐसे आंदोलनों और गाँधी जी की सकारात्मक ज़िद की वजह से पूरी दुनिया में उनका कद बहुत बढ़ गया और इसी के साथ पूरी दुनिया में भारत की Branding हो गई. इसीलिए हम कह रहे हैं कि महात्मा गांधी पूरी दुनिया में भारत के सबसे बड़े Brand Ambassador बन गए. 

जिस तरह संगीत को सरहदों में नहीं बांटा जा सकता है उसी तरह महात्मा गांधी के विचारों को भी सरहदों में नहीं बांटा जा सकता. महात्मा गांधी का सबसे प्रिय भजन था... 'वैष्णव जन तो, तेने कहिये जे, पीर पराई जाणे रे' इसका मतलब है... 'भगवान का भक्त उसे कहना चाहिए... जो दूसरों के दर्द को जानता है'यही भारतीय संस्कृति के विचारों का सारांश भी है... भारत के हर घर में इस बात की शिक्षा दी जाती है कि दूसरे के दर्द और परेशानी को समझना चाहिए.इस भजन में संगीत भी है और विचार भी . इसीलिए ये भजन आज सभी देशों की सीमाओं को पार कर चुका है और Global बन चुका है. 

आज महात्मा गांधी की 149वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस भजन के Global Version को Launch किया है . विदेश मंत्रालय ने ये जानकारी दी है कि 124 देशों के कलाकारों ने इस भजन में अपना योगदान दिया है . और पूरी दुनिया ने इस भजन के माध्यम से महात्मा गांधी को श्रद्धाजलि अर्पित की है . Armenia से Angola तक, Sri Lanka से Serbia तक और Iraq से Iceland तक... दुनिया के मशहूर कलाकारों और गायकों ने महात्मा गांधी को इस भजन के माध्यम से याद किया है . 

ये एक गुजराती भजन है जिसे 15वीं शताब्दी के कवि नरसिंह मेहता ने लिखा था . महात्मा गांधी इस भजन को बहुत पसंद करते थे. महात्मा गांधी की बैठकों से पहले ये भजन हमेशा गाया जाता था . आज महात्मा गांधी के इस प्रिय भजन के माध्यम से भारतीय संस्कृति के विचार पूरी दुनिया में फैल रहे हैं और ये भारत के लिए बहुत गर्व की बात है . आज आपको इस भजन का अंतर्राष्ट्रीय Version देखना चाहिए.