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ZEE जानकारी: चंद्रयान-2 भारत के लिए क्यों है खास, जानिए इसरो की पूरी प्लानिंग

आज भारत सहित पूरी दुनिया की नज़र, दोपहर 2 बजकर 43 मिनट पर टिकी हुई थी. ये वो समय था, जब श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से चंद्रयान-2 को Launch किया जाना था.

ZEE जानकारी: चंद्रयान-2 भारत के लिए क्यों है खास, जानिए इसरो की पूरी प्लानिंग

आज का दिन देश के वैज्ञानिकों को कोटि-कोटि नमन करने का दिन है. आज का दिन इसरो (ISRO) के वैज्ञानिकों को सलाम करने का दिन है. क्योंकि, उनकी मेहनत रंग लाई है. 135 करोड़ से ज़्यादा की आबादी वाले भारत की उम्मीदों के साथ चंद्रयान-2 अपने मिशन पर निकल पड़ा है. इसलिए आज सबसे पहले पृथ्वी से 3 लाख 84 हज़ार किलोमीटर दूर, चंद्रमा के सफर पर लेकर चलेंगे. इस सफर पर इसरो का साथ देना देश की जिम्मेदारी है.

आज भारत सहित पूरी दुनिया की नज़र, दोपहर 2 बजकर 43 मिनट पर टिकी हुई थी. ये वो समय था, जब श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से चंद्रयान-2 को Launch किया जाना था. सबकी धड़कनें बढ़ी हुई थीं. कहीं ना कहीं एक अंजाना सा डर भी, सबको भयभीत कर रहा था. क्योंकि, 14 और 15 जुलाई की रात को चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग, तकनीकी खराबी की वजह से 56 मिनट पहले रोकनी पड़ी थी. लेकिन ISRO के वैज्ञानिकों ने इतने कम समय में ना सिर्फ उस खामी को दूर किया. बल्कि साबित कर दिया कि अगर दिल में कुछ कर गुज़रने का जज़्बा हो, इच्छाशक्ति हो तो, किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है. 

चंद्रयान-2 की सफल लॉन्चिंग, इसका जीता-जागता सबूत है. हालांकि, आप में से कई लोग ये बात नहीं जानते होंगे, पिछले एक हफ्ते से ISRO के वैज्ञानिकों ने अपना सब कुछ चंद्रयान-2 की सफलता में झोंक दिया था. इन वैज्ञानिकों ने अपने परिवार से ऊपर देश की गरिमा को रखा. इन्होंने अपने निजी स्वार्थ से ऊपर चंद्रयान-2 की कामयाबी को रखा. आज हमने बहुत ही साधारण और सरल भाषा में भारत के वैज्ञानिकों की ऐतिहासिक उपलब्धि का विश्लेषण किया है, जिसे देखकर आपको ना सिर्फ एक हिन्दुस्तानी होने के नाते गर्व होगा. बल्कि आज से ठीक 48 दिन के बाद जब चंद्रयान-2 चांद की सतह पर कदम रखेगा. तो आप अपना सीना चौड़ा करके, दुनिया के दूसरे देशों के नागरिकों को कह पाएंगे, कि अमेरिका, रूस और चीन के बाद चांद पर कदम रखने वाला चौथा देश भारत है. 

चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग की प्रक्रिया वैसे तो पूरे 17 मिनट तक चली. लेकिन, हमने आपके लिए इन 17 मिनटों में से वो ख़ास साढ़े तीन मिनट निकाले हैं. जिसमें भारत का चांद वाला सपना साकार हो रहा है. इसलिए सबसे पहले आप दिल पर हाथ रखकर, इन तस्वीरों को देखिए. और पृथ्वी से 3 लाख 84 हज़ार किलोमीटर दूर मौजूद चांद को अपने क़रीब महसूस कीजिए. अब आपके दिमाग में सवाल आ रहा होगा, कि आगे क्या होगा? चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग तो हो गई. ये चांद की सतह पर कब और कैसे उतरेगा? आगे बढ़ने से पहले आपको इसका जवाब देते हैं.

 

चंद्रयान-2 में मुख्य रूप से तीन चरण हैं. पहला Orbiter है, जो चंद्रमा की कक्षा में चक्कर लगाएगा. दूसरा हिस्सा Lander है. इसे विक्रम नाम दिया गया है और ये 48 दिन बाद चंद्रमा की सतह पर उतरेगा. चांद की सतह के नज़दीक पहुंचने पर Lander अपनी कक्षा बदलेगा. और फिर वो सतह की उस जगह को Scan करेगा, जहां उसे उतरना है. क्योंकि इस मिशन की क़ामयाबी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा Soft Landing है. Soft Landing तकनीकी Term है. इसका मतलब Landing की Technique से है. आसान भाषा में कहें, तो Soft Landing का मतलब हुआ, एक ऐसी Technique, जिससे Instruments को बिना किसी नुकसान के चांद की सतह पर Land कराया जा सके.

Hard Landing वो होती है, जिसमें Landing होने पर Instruments को नुकसान होता है. इसीलिए कहा जा रहा है, कि मिशन की क़ामयाबी के लिए आखिरी के 15 मिनट बेहद चुनौतीपूर्ण होंगे. एक बार चांद की सतह पर Land करने के बाद, Lander से एक Rover निकलेगा. दूसरी भाषा में कहें, तो Landing के बाद Lander यानी विक्रम का दरवाजा खुलेगा और वो Rover यानी प्रज्ञान को Release करेगा. 27 किलोग्राम का Rover, 6 पहिए वाला एक Robot वाहन है. इसका नाम संस्कृत से लिया गया है, जिसका मतलब 'ज्ञान' होता है. और अपने नाम के ही मुताबिक, ये चांद की सतह पर घूमते हुए जानकारियां इकट्ठा करेगा. 

भारत का चंद्रयान-2 मिशन इसलिए भी बेहद ख़ास है, क्योंकि ये चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने की कोशिश करेगा. ध्यान देने वाली बात ये है, कि अब तक चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर कोई भी यान नहीं उतर पाया है. दूसरी बड़ी बात ये है, कि 2008 में चंद्रयान-1 मिशन के दौरान चांद के इसी हिस्से पर पानी होने के संकेत मिले थे. और अगर चंद्रयान-2 ने चांद की सतह पर उतरकर पानी खोज लिया, तो ये मानव इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना होगी. चंद्रयान-2, चांद की सतह पर पानी, खनिज और जीवन की संभावनाओं के बारे में जानकारी देगा. इस मिशन में अभी तक सब कुछ ठीकठाक चल रहा है.

चंद्रयान-2 में टैरेन मैपिंग कैमरा लगा है जो चंद्रमा की सतह की 3D इमेज तैयार करेगा. इसमें एक ऐसा X-Ray उपकरण भी लगा है जो चंद्रमा की सतह पर मौजूद पत्थरों की जांच करेगा. इसमें High Resolution कैमरे लगे हैं जो चंद्रमा की तस्वीरें लेंगे.
इसमें InfraRed Device लगा है, जिसकी मदद से चंद्रमा की सतह पर खनिज पदार्थों की जांच की जाएगी और पानी की मौजूदगी का भी पता लगाया जाएगा. चंद्रयान-2 आठ दिन की देरी से तो लॉन्च हुआ है लेकिन ये अपने तय वक़्त पर ही चंद्रमा की सतह पर उतरेगा. क्योंकि इस मिशन की कामयाबी के लिये ये बहुत ज़रूरी है कि चंद्रयान-2, 6 और 7 सितंबर के बीच चांद की सतह पर उतरे. क्योंकि चंद्रमा पर जिस जगह पर इसकी लैंडिंग तय की गई है, उसका रुख़ 6 और 7 सितंबर के बीच पृथ्वी की तरफ़ होगा और उस हिस्से पर सूर्य की रोशनी भी पड़ रही होगी.

इस डेडलाइन को हासिल करने के लिये चंद्रयान-2 पहले के मुक़ाबले चंद्रमा के 15 चक्कर कम लगाएगा, जबकि उसे पृथ्वी के 6 चक्कर ज़्यादा लगाने पड़ेंगे. भारत को ज़्यादा वक़्त ज़रूर लग रहा है, लेकिन ये पूरी प्रक्रिया मिशन पर होने वाले ख़र्च को कई गुना कम कर देती है. अमेरिका और रूस के पास भारत से शक्तिशाली रॉकेट हैं और वो बहुत कम वक़्त में सीधे चंद्रमा तक पहुंच सकते हैं. लेकिन भारत ने इस कमी का रास्ता निकाला है. भारत का चंद्रयान पृथ्वी की Gravity से बाहर निकलने के लिये पहले पृथ्वी के कई चक्कर लगाता है और फिर धीरे-धीरे पृथ्वी की कक्षा को छोड़कर चंद्रमा की तरफ़ बढ़ जाता है. इस वजह से ना बड़े रॉकेट की ज़रूरत पड़ती है, और ना ही ज्यादा ईंधन की जरूरत होती है.

भारत के अंतरिक्ष मिशन बहुत क़िफ़ायती रहे हैं. चंद्रयान-2 पर सिर्फ़ 978 करोड़ रुपये ख़र्च हुए हैं. इसलिये भारत के अनुभव से आज अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों को भी कुछ सबक़ लेने की ज़रूरत है. हालांकि इन तीनों देशों के अंतरिक्ष कार्यक्रम भारत से कई दशक पुराने हैं. अमेरिका ने 1950 के दशक से ही अपने Mission Moon की तैयारी शुरू कर दी थी और उसने अगले दो दशकों में 15 मिशन भेजे थे. अगर आज की लागत के हिसाब से देखा जाए, तो अमेरिका के इन सभी Projects पर 7 लाख करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे.

इनमें 6 ऐसे मिशन भी शामिल थे, जिसमें इंसान को भी चंद्रमा पर उतारा गया था. ये वो दौर था जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष में रेस चल रही थी. तब सोवियत संघ ने 1960 और 1970 के दशक में क़रीब 50 Lunar Mission भेजे थे, इनमें 25 मिशन फेल हो गये थे. आज के हिसाब से इन प्रोजेक्ट पर क़रीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये ख़र्च हुए थे. हालांकि रूस ने चंद्रमा पर कोई मानव मिशन नहीं भेजा है. चीन ने वर्ष 2007 में चंद्रमा पर पहला मिशन भेजा था. अब तक चीन 10 Moon Mission भेज चुका है. चीन हर वर्ष अंतरिक्ष कार्यक्रम पर क़रीब 50 हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करता है. जबकि भारत में इस वर्ष बजट में अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिये 12,000 करोड़ रुपये दिये गये है. इज़रायल ने इसी वर्ष फरवरी में अपना Moon Mission- Beresheet (बैरेशीट) लॉन्च किया था, लेकिन ये मिशन फेल हो गया था. इस प्रोजेक्ट पर इज़रायल ने क़रीब 700 करोड़ रुपये ख़र्च किये थे. 

इस लिहाज़ से ISRO के वैज्ञानिक पूरी दुनिया के सामने मिसाल हैं. भारत ने वर्ष 2008 में 386 करोड़ रुपये की लागत से चंद्रयान-1 मिशन को लॉन्च किया था. इस मिशन में सिर्फ़ Orbiter था, जिसने 312 दिन तक चंद्रमा के 3400 चक्कर लगाये थे. 
अब 11 वर्षों बाद चंद्रयान-2 पर 978 करोड़ रुपये ख़र्च हुए हैं. यानी इन दोनों प्रोजेक्ट पर भारत ने अभी तक 1400 करोड़ रुपये से भी कम ख़र्च किये हैं.

कुछ लोग कहते हैं कि भारत को Space Programme की ज़रूरत नहीं है. उनका तर्क है कि भारत ने Moon Mission पर जो पैसे खर्च किए, वो रक़म देश में बुनियादी ढांचों पर खर्च की जा सकती थी. आज हम ऐसे लोगों की बंद पड़ी आंखें खोलना चाहते हैं. ऐसे लोगों को मालूम होना चाहिये कि Hollywood की कुछ मशहूर फिल्में हैं, जिनका बजट चंद्रयान-2 मिशन से भी ज़्यादा था. इसी वर्ष रिलीज़ हुई हॉलीवुड फिल्म Dark Phoenix का बजट 1350 करोड़ रुपये से ज़्यादा था. वर्ष 2018 में आई फिल्म Solo: A Star Wars Story को बनाने में 1700 करोड़ रुपये से ज़्यादा ख़र्च हुए थे. पिछले साल ही फिल्म Avengers Infinity War आई थी, इसे बनाने में 2100 करोड़ रुपये से ज़्यादा रक़म ख़र्च हुई. जबकि इसी वर्ष रिलीज़ हुई फिल्म Avengers Endgame का बजट 2400 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा था.

आप ये भी कह सकते हैं कि पश्चिम देशों में जितने बजट में फिल्में बनाई जाती हैं, भारत उससे भी आधी रक़म ख़र्च करके चांद पर पहुंच जाता है. इसलिये हमें ISRO के वैज्ञानिकों को सलाम करना चाहिये. चंद्रयान-2 की कामयाब Launching के पीछे दो ऐसी मशीन हैं, जो इस वक़्त भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की Backbone यानी रीढ़ बन चुकी हैं. पहला है स्वदेशी GSLV रॉकेट यानी Geo-Synchronous Satellite Launch Vehicle. अभी इसका Mark three Version इस्तेमाल किया जा रहा है. ये रॉकेट क़रीब 5 टन वज़न तक के सैटेलाइट अंतरिक्ष में लॉन्च कर सकता है. और दूसरा है स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन, इस तकनीक से भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक क्रांति आ गई है.

आपको इसके बारे में और गहराई से बताएंगे, लेकिन उससे पहले जानिये कि चंद्रयान-2 के असली नायक कौन हैं? चंद्रयान-2 की सफल Launching का पहला श्रेय जाता है, ISRO के चेयरमैन K. Sivan को. इस मिशन की Project Director का नाम है, Muthayya Vanitha...जो एक Data Specialist हैं. बतौर Mission Director, चंद्रयान-2 की सफलता में Ritu Karidhal का भी अहम योगदान रहा. इसके अलावा Mechanical Engineer, S. Somanath ने भी अपनी भूमिका निभाई है. चंद्रयान-2 के Launch के Mission Director, J. Jayaprakash और Vehicle Director, Raghunath Pillai ने भी अपना योगदान दिया है. ये दोनों ही वैज्ञानिक ISRO में Rocket Specialist हैं.

इसके अलावा मंगलयान मिशन की क़ामयाबी के स्तंभ रहे, Dr. Anil Bharadwaj भी चंद्रयान-Two की सफल Launching के हीरो बने. अभी हमने सिर्फ कुछ नाम आपको बताएं हैं. सच्चाई तो ये है, कि ये क़ामयाबी ISRO के हर वैज्ञानिक की जीत है. लेकिन दुख की बात ये है कि जो लोग एक क्रिकेट मैच में भारत की जीत का जश्न मनाने के लिए सड़कों पर उतर जाते हैं. वो लोग ISRO और भारत के वैज्ञानिकों की कामयाबी का जश्न कभी नहीं मनाते. ये उदासीनता बताती है कि हमारे देश के लोग मनोरंजन के गुलाम हैं और वैज्ञानिकों के प्रति उनके मन में कितना सम्मान है. आज हमारे देश के लोग क्रिकेटर्स और अभिनेताओं के नाम तो जानते हैं.. लेकिन वैज्ञानिकों के नाम कोई नहीं जानता...जबकि वो देश के असली हीरो हैं. हमें लगता है कि ये तस्वीर बदलनी चाहिए.

चंद्रयान-2 को चांद के सफर पर ले जाने वाले Rocket GSLV Mark-Three को बाहुबली भी कहा जाता है. क्योंकि, ये भारत का सबसे वज़नदार Rocket है. GSLV Mark-Three रॉकेट में CE-20 क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया गया है. और आपको ये जानकर अच्छा लगेगा, कि ये पूरी तरह से स्वदेशी है. यानी Made In India है. 80 के दशक के अंत में अमेरिका ने भारत के GSLV कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की थी और अमेरिका इसमें कामयाब भी हो गया था. GSLV रॉकेट में क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया जाता है. 1980 के दशक के अंत में भारत ने Russia से क्रायोजेनिक इंजन मांगे थे. Russia 230 करोड़ रुपये में भारत को ये इंजन देने के लिए तैयार भी हो गया था . लेकिन तब अमेरिका ने ISRO पर पाबंदी लगा दी और Russia को ऐसा करने से रोक दिया.

अमेरिका को शक था, कि भारत क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक का इस्तेमाल अपने मिसाइल कार्यक्रम में कर सकता है. इसके बाद भारत ने स्वदेशी तकनीक पर आधारित क्रायोजेनिक इंजन बनाने का फैसला किया. और आखिरकार वर्ष 2010 में भारत को इसमें कामयाबी मिल ही गई. आज भारत के पास खुद का क्रायोजेनिक इंजन भी है और भारत Missile Technology Control Regime का सदस्य भी है. GSLV Mark-three रॉकेट ही भविष्य में भारत के अंतरिक्ष यात्रियों को ले जाएगा. वर्ष 2021 में GSLV रॉकेट भारत और अमेरिका के संयुक्त सैटेलाइट NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar को लेकर उड़ेगा और ये भारत के लिए गर्व का एक और लम्हा होगा.

इसे NISAR कहा जा रहा है. जो दुनिया का सबसे महंगा सैटेलाइट होगा. ये सैटेलाइट हर हफ्ते पृथ्वी की तस्वीरें खींचेगा. ये इतना शक्तिशाली होगा कि इसकी मदद से ज़मीन के नीचे की Tectonic प्लेट, बर्फ की परत, कृषि योग्य ज़मीन और जंगलों में आने वाले ज़रा से बदलाव को भी पकड़ा जा सकेगा.

यानी जो अमेरिका कभी भारत को अंतरिक्ष की तरफ देखने भी नहीं देता था. वो आज भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अंतरिक्ष को निहार रहा है. इतना ही नहीं, वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को GPS से जुड़ा DATA भी देने इनकार कर दिया था. इस DATA की मदद से भारत आतंकवादियों और पाकिस्तानी सैनिकों की स्थिति का पता लगाना चाहता था. उस घटना के 17 वर्षों के बाद अप्रैल 2016 में भारत ने अपना स्वदेशी Navigation System विकसित कर लिया. यानी अंतरिक्ष की दुनिया में भारत अब पूरी तरह से आत्मनिर्भर देश बन चुका है, और दुनिया खुले दिल से ISRO के पराक्रम का स्वागत कर रही है.

इस बीच अब से थोड़ी देर पहले अमेरिका की स्पेस एजेंसी NASA ने भी ISRO को बधाई दी है. लेकिन इस बधाई में भी ईर्ष्या की झलक दिखाई देती है. NASA ने चंद्रयान-2 के लिए मुबारकबाद तो दी है. साथ में भविष्य में अपने मिशन का प्रचार भी कर दिया है. नासा ने लिखा है कि इसरो को चंद्रयान-2 के लिए बधाई. हम आपके मिशन का समर्थन ऐसे ही करते रहेंगे और उम्मीद करते हैं कि आप चांद के दक्षिणी ध्रुव के बारे में जो जानकारी इकट्ठा करेंगे, वो हमारे काम आएगा. 

यहां पर किसी के भी मन में ये सवाल ज़रूर आएगा, कि सब लोग चांद पर क्यों जाना चाहते हैं ? अलग-अलग देश अपने मिशन चांद पर क्यों भेज रहे हैं ? आज हमने इस सवाल का जवाब ढूंढने की भी कोशिश की है. अलग-अलग देशों के अलावा कई कंपनियां भी चांद तक पहुंचना चाहती हैं. भारत का चंद्रयान-Two 48 दिन बाद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने की कोशिश करेगा. ठीक इसी तरह Blue Origin नाम की Aerospace Company भी दक्षिणी धुव्र तक जाना चाहती है. इज़रायल की संस्था ने इसी साल अप्रैल में चांद तक पहुंचने की कोशिश की. लेकिन उसका रॉकेट आखिरी समय में फेल हो गया.

सवाल ये है, कि पूरी दुनिया में चांद तक पहुंचने की रेस क्यों लगी हुई है ? इसका जवाब है, अंतरिक्ष की दुनिया में चांद पर बसाई जाने वाली संभावित Human Colony. चांद को हर देश अपना Base बनाना चाहता है. पिछले साल अमेरिकी स्पेस एजेंसी NASA ने कुछ तस्वीरें जारी की थीं. जिसमें चांद की सतह पर पानी और बर्फ मिलने के संकेत मिले थे. ये एक बड़ी घटना थी. क्योंकि, मानवजाति को जीवित रहने के लिए पानी की ज़रूरत पड़ेगी. वैज्ञानिकों का मानना है, कि चांद पर कम से कम 10 लाख टन बर्फ मौजूद हो सकती है. बर्फ या पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अंश मौजूद होते हैं. और Rocket में इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन में भी ये दोनों तत्व बड़ी मात्रा में मौजूद होते हैं.

यानी अगर चांद की सतह पर पानी खोज लिया जाए. और वहां उसे Rocket Fuel में बदलने की तकनीक तैयार कर ली जाये, तो खर्च काफी कम हो जाएगा. साधारण भाषा में कहें, तो आप अंतरिक्ष में मौजूद पानी को वहां मौजूद तेल भी कह सकते हैं.
अगर चांद पर Human Colony बस जाती है. और वहां पर Rocket Fuel का निर्माण शुरू हो जाता है, तो चांद से आगे जाने का रास्ता साफ हो जाएगा. ये ना सिर्फ आसान होगा. बल्कि काफी सस्ता भी होगा. हालांकि, चांद की रेस का एक दूसरा पहलू ये भी है, कि ये सिर्फ वैज्ञानिक रेस नहीं है. बल्कि ये दुनिया की महाशक्तियों के बीच चांद पर होने वाला राजनीतिक युद्ध है. एक ऐसा युद्ध जिसका मकसद ही है, दुनिया का Commercial Space Player बनना.