ZEE Jankari: स्वेज नहर यानी World Economy की जीवनरेखा

स्वेज नहर बनाने का प्रस्ताव. सबसे पहले वर्ष 1789 में. फ्रांस के शासक Napoleon Bonaparte (नेपोलियन बोनापार्ट) ने दिया था. 

ZEE Jankari: स्वेज नहर यानी World Economy की जीवनरेखा

अक्सर कहा जाता है कि जल ही जीवन है . लेकिन, जल सिर्फ जीवन नहीं, बल्कि भारत के लोगों का संस्कार भी है . हमारे कई तीर्थ स्थल जलाशयों के किनारे हैं . कई उत्सव और मेले नदियों और समुद्र के किनारे आयोजित किए जाते हैं . हिंदू कैलेंडर में खास मौकों पर स्नान का बहुत महत्व होता है . हम जल से भगवान का अभिषेक करते हैं, पूजा से पहले जल से शुद्धि करते हैं, मृत्यु के बाद जल में अस्थियों का विसर्जन करते हैं और श्राद्ध में जल से तर्पण भी करते हैं . हमारे पुराणों में जल-समाधि का भी ज़िक्र है .

जब घर में कोई मेहमान आता है, तब हम पानी के लिए ज़रूर पूछते हैं . लेकिन अब जो हालात बन रहे हैं, उससे लग रहा है कि मेहमान खुद ही कहेंगे, पानी के अलावा कुछ भी दे दो, बस पानी मत देना . ध्यान देने की बात ये है कि आजादी के बाद 70 वर्षों में भी हमारी सरकारें 1 ग्लास साफ पानी नहीं दे पा रही हैं, तो ऐसे में हम किसी और चीज की उम्मीद क्या करें . 

जल के प्रदूषण के बाद हम उस पानी की बात करेंगे, जो दुनिया को जोड़ने का काम करता है, यानी मानवता के कल्याण का काम करता है .स्वेज नहर का नाम...आप सभी ने सुना होगा . स्वेज नहर को World Economy की Lifeline यानी जीवनरेखा भी कहा जाता है . ये नहर यूरोप को एशिया से जोड़ती है.

आज से 150 वर्ष पहले...नवंबर 1869 में स्वेज नहर को यातायात के लिए खोला गया था .स्वेज नहर के बनने से पहले...एशिया से निकले जहाज...अफ्रीकी महाद्वीप का पूरा चक्कर लगाकर यूरोप पहुंचते थे . लेकिन इस नहर के बनने के बाद...लगभग 6 हजार किलोमीटर से ज्यादा का रास्ता कम हो गया...यानी 18 घंटे का सफर सिर्फ 11 घंटे का रह गया .

स्वेज नहर बनाने का प्रस्ताव...सबसे पहले वर्ष 1789 में...फ्रांस के शासक Napoleon Bonaparte (नेपोलियन बोनापार्ट) ने दिया था . लेकिन उस वक्त...इस योजना पर काम शुरू नहीं हो पाया . वर्ष 1854 में...मिस्र के राजा मोहम्मद सईद ने...इस परियोजना को शुरू करने की अनुमति दी.

25 अप्रैल 1859 को स्वेज नहर का निर्माण शुरू हुआ. 10 वर्षों में लगभग 3 हजार करोड़ रुपए की लागत से...ये नहर बनकर तैयार हुई . इस नहर को बनाने में करीब 10 लाख लोगों ने दिन रात काम किया.

इन 10 वर्षों में...खाने की कमी और बीमारियों का इलाज ना हो पाने के कारण.

लगभग 1 लाख 20 हजार मजदूरों की मौत हुई . जिस वक्त इस नहर को बनाया गया...तब ये 164 किलोमीटर लंबी और आठ मीटर गहरी थी . हालांकि अब इसकी गहराई 24 मीटर तक बढ़ा दी गई है .इस नहर के कारण यूरोप से एशिया और पूर्वी अफ्रीका तक का...सीधा मार्ग खुल गया . इससे कई देशों को व्यापार करने में सुविधा होने लगी .

स्वेज नहर में जहाज 12 से 15 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलते हैं...क्योंकि तेज गति से चलने पर, नहर के किनारे टूटने का डर बना रहता है . वर्ष 2015 तक इस नहर से एक साथ दो जहाज नहीं निकल पाते थे...क्योंकि इस नहर की चौड़ाई बहुत कम थी . उस वक्त...जब एक जहाज को निकलना होता था.

तो दूसरे जहाज को किनारों पर बांध दिया जाता था . इस कारण तब एक दिन मे सिर्फ 24 जहाज इस जलमार्ग से गुजर पाते थे. लेकिन 6 अगस्त 2015 को स्वेज नहर के ठीक बगल में...लगभग 72 किलोमीटर लंबा नहर का एक नया हिस्सा बनाया गया . इस हिस्से के बनने से अब दोनों तरफ से जहाज आ सकते हैं और जहाजों का 8 घंटे का इंतजार सिर्फ 3 घंटे रह गया.

इस हिस्से के खुलने से अब 49 जहाज प्रतिदिन इस नहर से गुजरते हैं . ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2023 तक प्रतिदिन 97 जहाज इस नहर से होकर गुजरेंगे . यानी आप कह सकते हैं...कि जितने ज्यादा जहाज गुजरेंगे, उतना ज्यादा व्यापार होगा. वर्ष 2019 में मिस्र की सरकार को स्वेज नहर से 41 हजार करोड़ रुपए का वार्षिक Revenue मिला था.

जो वर्ष 2023 में बढ़कर...92 हजार करोड़ रुपए तक हो सकता है. अक्टूबर 2019 में सरकार को...तीन हजार 600 करोड़ का मासिक Revenue स्वेज नहर से प्राप्त हुआ था.
स्वेज नहर बन जाने से...यूरोप और एशिया के कई देशो के बीच दूरी काफी कम हो गई. दुनिया का 10 फीसदी समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होता है . भारत, Russia, चीन और जापान जैसे बड़े देश इस मार्ग का इस्तेमाल करते हैं.