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ZEE Jankari: वायको ने किया हिंदी का अपमान, विभाजनकारी राजनीति का हिस्‍सा

वायको और उनके जैसे लोग एक ब्रिटिश विद्वान Lord मैकाले की 184 वर्ष पुरानी साज़िश का शिकार हो गए हैं. आज हम इस साज़िश को Decode करेंगे. हम आपको बताएंगे कि अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद भी देश अंग्रेज़ी की गुलामी क्यों कर रहा है?

ZEE Jankari: वायको ने किया हिंदी का अपमान, विभाजनकारी राजनीति का हिस्‍सा
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आज भारत की अपनी भाषा हिंदी का घोर अपमान हुआ है. और ये अपमान भी भारत के ही एक सांसद ने किया है. राज्यसभा के सांसद वायको ने दुर्भावना से भरकर हिंदी भाषा की गरिमा को ठेस पहुंचाई है. वायको ने आज एक बयान में कहा है कि हिंदी एक मृत भाषा है, हिंदी का कोई साहित्य नहीं है, हिंदी में कोई गहराई नहीं हैं और हिंदी में भाषण देने से संसद में बहस का स्तर गिर रहा है. भारत में 76 करोड़ लोग हिंदी को बोलते और समझते हैं. आज हर हिंदी प्रेमी व्यक्ति का हृदय आहत है. हमने भाषा के इतिहास का अध्ययन किया है. आज हम तथ्यों की कसौटी पर वायको के बयान का DNA टेस्ट करेंगे. हमारा ये विश्लेषण आज वायको और हिंदी भाषा के विरोधियों को आत्मचिंतन करने के लिए मजबूर कर देगा.

वायको और उनके जैसे लोग एक ब्रिटिश विद्वान Lord मैकाले की 184 वर्ष पुरानी साज़िश का शिकार हो गए हैं. आज हम इस साज़िश को Decode करेंगे. हम आपको बताएंगे कि अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद भी देश अंग्रेज़ी की गुलामी क्यों कर रहा है?

MDMK, तमिलनाडु की एक क्षेत्रीय पार्टी है. इस पार्टी का लोकसभा में कोई सांसद नहीं है. वायको इस पार्टी के एक मात्र सांसद हैं, जो राज्यसभा के सदस्य हैं. लेकिन वायको और उनकी पार्टी का पूरा इतिहास विभाजनकारी शक्तियों के समर्थन का है. आज हम वायको की इस विभाजनकारी राजनीति को भी Expose करेंगे. लेकिन सबसे पहले सुनते हैं? आज वायको ने क्या कहा है? जिससे हर हिंदी भाषी के दिल में एक गुस्सा है.

वायको के बयान का सारांश ये है... कि पंडित नेहरू से लेकर Doctor मनमोहन सिंह तक सभी प्रधानमंत्री, गैर हिंदी भाषी राज्यों के लोगों के साथ बराबर का व्यवहार करने के लिए अंग्रेज़ी का इस्तेमाल करते थे. हम वायको के इस बयान को तथ्यों की कसौटी पर कसेंगे. भारत में हिंदी समझने वालों की संख्या 76 करोड़ है. भारत में अंग्रेज़ी समझने वालों की संख्या 14 करोड़ है.

अगर तथ्यों के आधार पर देखा जाए तो 57 प्रतिशत लोग हिंदी समझते हैं, जबकि सिर्फ 10 प्रतिशत लोग अंग्रेज़ी समझते हैं. वायको एक सम्मानित सांसद हैं, लेकिन उनके बयान, तथ्यों से मेल नहीं खाते हैं. कोई भी सामान्य बुद्धि की व्यक्ति बहुत आसानी से ये समझ सकता है कि देश के प्रधानमंत्री को 76 करोड़ लोगों की भाषा हिंदी बोलनी चाहिए या फिर 14 करोड़ लोगों की भाषा हिंदी. हमें लगता है कि वायको को आत्मचिंतन करना चाहिए.

आगे अपने बयान में वायको कहते हैं कि हिंदी का कोई साहित्य नहीं है. मोदी से पहले प्रधानमंत्री बनने वाले राजनेता, अंग्रेज़ी भाषा के महान कवियों Milton, Shelley, Shakespeare और Bernard Shaw के Quotes का इस्तेमाल करते थे. वायको शायद ये बात नहीं समझ पा रहे हैं कि भारत की संसद आम लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए है. भारत का सबसे बड़ा संवैधानिक मंच कोई साहित्यिक मंच नहीं है. अंग्रेज़ी के महान कवियों की कविताओं का विश्लेषण करने के लिए देश में दूसरे मंच भी हैं. संसद, देश के आम लोगों का मंच है, जिसमें सामान्य बोलचाल की भाषा का ही इस्तेमाल होता है.

संभव है वायको अंग्रेज़ी के बहुत बड़े विद्वान हैं और उनको Milton, Shelley, Shakespeare और Bernard Shaw के Quotes आसानी से समझ में आ जाते हों. वायको खुद को अभिजात्य वर्ग का समझते हैं. लेकिन देश की साधारण जनता उनकी तरह अभिजात्य वर्ग में नहीं आती है. अगर ये बात वायको समझते तो आज उनकी पार्टी MDMK संसद में सिर्फ एक सांसद वाली पार्टी नहीं होती.

MDMK तमिलनाडु का एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल है, जिसका लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है. राज्यसभा में वायको ही MDMK के एक मात्र सांसद हैं और वायको को ये बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि वो चुनाव जीतकर नहीं आए हैं. वो DMK की दया से राज्यसभा के रास्ते संसद में भेजे गए हैं.

वायको MDMK के संस्थापक सदस्य और महासचिव हैं. देश में वायको की राजनीतिक शक्ति शून्य के करीब है. वर्ष 2016 में तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में MDMK ने 29 सीटों पर चुनाव लड़ा था. MDMK एक भी सीट नहीं जीत पाई और 27 सीटों पर उसकी ज़मानत ज़ब्त हो गई. लेकिन वायको सिर्फ सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए भाषा के नाम पर लोगों को बांटने की कोशिश कर रहे हैं.

वायको ने हिंदी पर कुछ और आरोप भी लगाए हैं. वायको ने कहा कि हिंदी में कोई गहराई नहीं है. हिंदी में कोई साहित्य नहीं है. हिंदी एक मृत भाषा है और हिंदी में भाषण देने से संसद में बहस का स्तर गिर गया है. हिंदी भाषा पर ये गंभीर आरोप, दुर्भावना से लगाए गए हैं. गहराई हर भाषा में होती है, लेकिन अलग-अलग योग्यता वाले व्यक्ति अलग-अलग तरह से भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हिंदी में दिए गए भाषण...आज भी लोगों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं. गहराई हर भाषा में होती है, क्योंकि हर भाषा के विकास में सैकड़ों-हजारों वर्षों का समय लगता है. भाषा का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के ज्ञान में गहराई होनी चाहिए.

वायको ने ये भी कहा है कि हिंदी में कोई साहित्य नहीं है? शायद... वायको को हिंदी भाषा के इतिहास की कोई जानकारी नहीं है? हिंदी के महान साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी किताब 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' में लिखा है- 13वीं शताब्दी में पैदा हुए कवि चंदबरदाई हिंदी के पहले महाकवि हैं और पृथ्वी राज रासो, हिंदी का पहला महाकाव्य है. इस ग्रंथ की रचना, आज से करीब 750 वर्ष पहले हुई थी. तुलसी दास का महान ग्रंथ रामचरित मानस, पूरी दुनिया की सबसे महान और लोकप्रिय रचनाओं में से एक है. ये ग्रंथ भी करीब 450 वर्ष पुराना है.

हिंदी को मृत भाषा कहना, अज्ञान की पराकाष्ठा है क्योंकि हिदी भाषा, दुनिया की सबसे ज्यादा संघर्ष करने वाली भाषा है. बीते 800 वर्षों में लगातार हिंदी का दमन किया गया. इसके बाद भी हिंदी ज़िंदा है और आज भारत की शान है. संघर्ष को झेलने की क्षमता ज़िंदा लोगों में होती है... मृत लोगों में नहीं.

दुर्भाग्य की बात ये है कि हमारे देश के कुछ सांसद राज्य सभा के रास्ते चुनकर संसद में पहुंच जाते हैं. वो खुद को बहुत विद्वान समझते हैं. लेकिन उनको ना ही भाषा का इतिहास पता है और ना ही भारत का.

1206 ईस्वी में यानी आज से करीब 800 वर्ष पहले दिल्ली पर गुलाम वंश के पहले सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक का कब्जा हो गया. इसके बाद मुगल वंश खत्म होने तक और फिर अंग्रज़ों का राज खत्म होने तक... लगातार हिंदी का दमन किया गया. गुलामी के दौर में विदेशी हमलावरों ने भारत पर विदेशी भाषाएं थोपने की कोशिश की. इन विदेशी हमलावरों ने कभी भी हिंदी को राज भाषा का सम्मान नहीं दिया. मुसलमान बादशाहों ने राजभाषा का सम्मान फारसी जैसी विदेशी भाषाओं को दिया. मुस्लिम बादशाहों ने कभी हिंदी का संरक्षण नहीं किया. इसके बाद भी आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हिंदी के बड़े-बड़े कवि, अमीर खुसरो, मलिक मुहम्मद जायसी और रसखान, मुसलमान थे, जिन्होंने हिंदी भाषा में कविताएं और गीत लिखे. ये हिंदी भाषा का आकर्षण है जिसने मुसलमान साहित्यकारों को भी अपना बना लिया.

वायको का ये भी कहना है कि हिंदी में बहस करने से संसद में बहस का स्तर गिर गया है. ये बात बिलकुल आधारहीन है. अगर सांसद मर्यादा का पालन नहीं करते हैं तो इसके लिए किसी भाषा को ज़िम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है? अपने बयान में वायको ने ये भी कहा है कि नरेंद्र मोदी हिंदी के बहुत अच्छे वक्ता हैं और वो लोगों को सम्मोहित कर लेते हैं. वायको ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री नहीं बल्कि पिकनिक मिनिस्टर कहा है.

इस बयान से वायको के मन में छुपी सच्चाई सामने आ जाती है. वास्तव में वायको इस बात से दुखी हैं कि Hindi Heart Land की पार्टी को आज पूरे देश ने बहुमत दिया है और देश की जनता ने एक हिंदी बोलने वाले व्यक्ति को दोबारा प्रधानमंत्री के रूप में चुना है.

अगर देखा जाए तो वायको का पूरा बयान, बयान नहीं है बल्कि उनका गुस्सा है. वायको आज पूरे देश के सामने Expose हो गए हैं. संविधान ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया है, राष्ट्रभाषा का नहीं. लेकिन हम गर्व के साथ कहना चाहेंगे कि हिंदी को ऐसे किसी दर्जे की जरूरत नहीं है.

अगर वायको ने आज तमिल भाषा की प्रशंसा में दो शब्द बोले होते तो हम भी आज वायको की प्रशंसा करते. क्योंकि हिंदी की ही तरह तमिल भी भारतीय भाषा है, लेकिन उन्होंने एक भारतीय भाषा....हिंदी का अपमान करने के लिए एक विदेशी भाषा.... अंग्रेज़ी का सहारा लिया है.

वायको और उनके जैसे लोग, आज भी भारत में अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत के गुलाम हैं. आज हम भारत के इन नए अंग्रेज़ों को ब्रिटेन के इतिहासकार, शिक्षाविद् और राजनेता Lord Macaulay का एक Quote सुनाना चाहते हैं.
Lord Macaulay ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटेन की संसद को ये संदेश दिया था कि "मैं भारत के कोने कोने में घूमा हूं. मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो भिखारी या चोर हो! इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है. इतने ऊंचे चरित्र और आदर्श वाले गुणवान लोग देखे हैं कि मुझे नहीं लगता है कि हम कभी इस देश को जीत पाएंगे. इस देश की असली ताकत है यहां की आध्यात्मिक संस्कृति और इसकी विरासत! इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ! कि भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बदल डालें, क्योंकि भारत के लोग ये सोचने लगें कि जो भी विदेशी है और अंग्रेजी है. वही अच्छा है और बेहतर है तो वो अपने आत्म गौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे! और वैसे ही बन जाएंगे जैसा हम चाहते है! पूरी तरह से एक गुलाम देश.

मैकाले ने ये बात आज से 184 वर्ष पहले कही थी. वायको जैसे लोग... आज मैकाले की इसी 184 वर्ष पुरानी साजिश का शिकार हो गए हैं.

वायको का एक और परिचय, आज हम पूरे देश के सामने रखना चाहते हैं. वायको की पार्टी MDMK खुलकर LTTE का समर्थन करती थी. राजीव गांधी के राज में जब भारत की शांति सेना, श्रीलंका में LTTE के विद्रोहियों का मुकाबला कर रही थी. तब श्रीलंका में भारत के करीब एक हजार जवान शहीद हुए थे, लेकिन आज भी ये पार्टी LTTE का समर्थन करती है. वाइको LTTE के कट्टर समर्थक रहे हैं.

वर्ष 2009 में वायको ने LTTE के समर्थन में एक भाषण दिया था. इस मामले में... इसी महीने... 5 जुलाई को चेन्नई की स्पेशल कोर्ट ने वायको को देशद्रोह का दोषी माना और एक वर्ष की सजा सुनाई. वाइको ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की है.

हमारे पास एक Video भी है... जिसमें MDMK के नेता वाइको एक LTTE Camp में दिखाई दे रहे हैं. इस Video में वो LTTE की वर्दी पहने हुए दिखाई दे रहे हैं. माना जाता है कि ये Video वर्ष 1989 का है. वीडियो में वायको, LTTE के प्रमुख प्रभाकरन, वाइको के साथ बैठे हैं. Note करने वाली बात ये भी है कि वो प्रभाकरन को कुछ समझाते हुए नजर आ रहे हैं और प्रभाकरन के साथ बहुत सहज हैं.

हिंदी का विरोध करने वालों को ये बात समझनी चाहिए कि हिंदी भाषा में पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने की क्षमता है. हिंदी के महान विद्वान और साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'संस्कृति भाषा और राष्ट्र' में राष्ट्र भाषा और राष्ट्रीय एकता को लेकर बहुत महत्वपूर्ण विचार रखे हैं. उन्होंने लिखा है कि हिंदी में भाषा को भाषा से और प्रांत को प्रांत से जोड़ने की ताकत है. लेकिन दक्षिण भारत की ऐसी कोई भी भाषा नहीं है जो तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम बोलने वालों को जोड़ सके.

हिंदी की पश्चिमी सीमा राजस्थान और पंजाब हैं... और पूर्वी सीमा बिहार है. राजस्थान से बिहार तक लोग अपने घरों में राजस्थानी, ब्रज भाषा, बुंदेलखंडी, अवधी और भोजपुरी बोलते हैं. ये हिंदी की ही बोलियां हैं और संस्कृत भाषा से पैदा हुई हैं. लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों के बीच ऐसी कोई क्षेत्रीय भाषा विकसित नहीं हो पाई जो हर क्षेत्र में समझी जा सके.

हिंदी भाषा को महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल, असम और ओडिशा में भी समझा जाता है. उदाहरण के लिए अगर कोई गुजराती व्यक्ति असम या ओडिशा जाए और गुजराती भाषा में बात करे तो उसकी बात शायद कोई नहीं समझ सकेगा. लेकिन अगर वो हिंदी बोले तो उसकी बात समझी जाएगी.

हिंदी का विरोध करने वाले लोग उन देशों से भी सबक ले सकते हैं जिनकी एक राष्ट्रभाषा है. ऐसे देश अपनी राष्ट्रभाषा के माध्यम से पूरी दुनिया में अपनी संस्कृति का प्रचार कर रहे हैं. चीन ने वर्ष 2000 में एक कानून बना कर Mandarin को आधिकारिक भाषा के रूप में सभी समाचार माध्यमों और सरकारी संस्थाओं में लागू कर दिया.

इसका असर भी देखने को मिला. साल 2000 में चीन के 50 प्रतिशत लोग Mandarin बोलते थे. लेकिन वर्ष 2017 में Mandarin बोलने वालों की संख्या बढ़कर 73 प्रतिशत हो गई. चीन में Mandarin को इंटरनेट पर प्रोत्साहित करने के लिए Mandarin भाषा के साहित्य को प्रकाशित किया जा रहा है. इसके लिए 1 हजार 500 Websites की मदद ली जा रही है. आज चीन के Social Media पर भी Mandarin छाई हुई है.

चीन ने Mandarin को बढ़ावा देने के लिए 140 देशों में 500 सरकारी संस्थाएं बनाई हैं जो पूरी दुनिया में लोगों को Mandarin सिखाती हैं. Mandarin सिखाने के लिए चीन ने दुनिया भऱ में 1 हज़ार से ज़्यादा Class Room बनाए हैं, जिनके लिए सारी सुविधाएं चीन मुहैया कराता है.

इसी तरह France और Germany जैसे बहुत सारे यूरोपीय देश भी अपनी भाषा का दुनिया भर में प्रचार करने के लिए अरबों रुपए खर्च करते हैं. इन देशों को भाषा का महत्व पता है. जब कोई व्यक्ति किसी देश की भाषा को सीखता है, तो वहां की संस्कृति से ज़रूर प्रभावित होता है लेकिन हमारे देश में अब तक लोग राष्ट्र भाषा की ताकत को नहीं समझ पाए हैं. अगर देश को Global Power बनना है, तो उसे भी अपनी राष्ट्रभाषा का प्रचार करना होगा.

लेकिन हमारे देश में राष्ट्रभाषा के प्रचार के लिए योजना नहीं बनाई जाती है. हमारे देश में राष्ट्रभाषा पर राजनीति होती है. जो वायको के बयान के बाद भी जारी है.