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ZEE जानकारीः कारगिल के योद्धा को बर्तन क्यों धोने पड़ रहे हैं?

दिल्ली में रहने वाले सतवीर सिंह... कारगिल युद्ध के वक्त Rajputana Rifles में लांसनायक के पद पर तैनात थे . तोलोलिंग की लड़ाई में सतवीर सिंह ने अपना शौर्य और पराक्रम दिखाया था और वो बहुत बुरी तरह घायल हो गए थे .

ZEE जानकारीः कारगिल के योद्धा को बर्तन क्यों धोने पड़ रहे हैं?

पाकिस्तान में समय का चक्र कैसे घूमा, और उसका क्या असर हुआ ये तो आपने देख लिया. अब आप समय की ताकत का एक और उदाहरण देखिए. आज हम आपको कारगिल युद्ध के दौरान तोलोलिंग की लड़ाई लड़ने वाले भारत के लांसनायक सतवीर सिंह से मिलवाएंगे . सतवीर सिंह के पैर में आज भी एक पाकिस्तानी गोली मौजूद है . वो बैसाखी के सहारे चलते हैं . और आज एक एक कदम बढ़ाते हुए उन्हें उस गोली की टीस महसूस होती है . पैर में फंसी हुई गोली उन्हें हमेशा ये याद दिलाती है कि उन्होंने कारगिल में देश के लिए जंग लड़ी थी. इसके बाद वो खुद को समझाते हैं, अपने अंदर के बहादुर सैनिक का मन मारते हैं और दिल्ली में मौजूद अपनी जूस की दुकान पर बैठ जाते हैं. कल 26 जुलाई है . कल कारगिल युद्ध की विजय को 19 वर्ष पूरे हो रहे हैं. शौर्य की कई कहानियां एक बार फिर याद की जाएंगी. और इन सभी कहानियों में एक छोटी सी कहानी भारतीय सेना के इस सैनिक भी है.

दिल्ली में रहने वाले सतवीर सिंह... कारगिल युद्ध के वक्त Rajputana Rifles में लांसनायक के पद पर तैनात थे . तोलोलिंग की लड़ाई में सतवीर सिंह ने अपना शौर्य और पराक्रम दिखाया था और वो बहुत बुरी तरह घायल हो गए थे . तोलोलिंग की पहाड़ी, श्रीनगर से लेह को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग के ठीक बगल में है . पाकिस्तान के घुसपैठियों ने इस पहाड़ी पर अपने मोर्चे बना लिए थे . यहीं से वो राष्ट्रीय राजमार्ग पर हर समय गोलाबारी कर रहे थे. ऐसे हालात में भारत के लिए तोलोलिंग को वापस अपने कब्ज़े में लेना सबसे बड़ी चुनौती थी. भारतीय सेना को इस काम में लंबा समय भी लगा और भारी नुकसान भी उठाना पड़ा . अंतिम प्रहार के लिए 1999 में 12 और 13 जून के बीच की रात को चुना गया था. Second Rajputana Rifles को इसका ज़िम्मा दिया गया था. इस Battalion ने भारी नुकसान उठाकर तोलोलिंग पर कब्ज़ा किया था. इसी जीत के बाद कारगिल में भारत की जीत सुनिश्चित हो गई थी. 

तोलोलिंग में मिली जीत, हमारे देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी लेकिन तोलोलिंग का युद्ध लड़ने वाले जवान का महत्व शायद अब कुछ भी नहीं है . लांसनायक सतवीर सिंह को हर महीने 22 हज़ार रुपए की पेंशन मिलती है. बहुत से लोगों को ये लगेगा कि ये रकम उनके लिए काफ़ी है. लेकिन सच ये है कि दिल्ली जैसे महंगे शहर में इस रकम से अपने परिवार, अपनी बीमारी और अपनी मजबूरियों पर विजय प्राप्त करना बहुत मुश्किल है. अपने बेटे को पढ़ाने के लिए सतवीर सिंह को अपने घर में ही जूस की दुकान खोलनी पड़ी. वो हर वक़्त दबाव में रहते हैं. उन्हें HyperTension की बीमारी है और इसके इलाज में भी उनका पैसा खर्च होता है. 1999 के बाद से भारत में हर वर्ष विजय दिवस मनाया गया है लेकिन सतवीर सिंह के जीवन में सही मायने में एक नये विजय दिवस की ज़रूरत है. 

Border पर देश की सुरक्षा कर रहे जवान... कभी ये नहीं सोचते कि देश हमारे लिए क्या कर रहा है ? उनके दिमाग में एक ही बात होती है, अगर देश के लिए जान भी देनी पड़ी तो ज़रूर देंगे . लेकिन ऐसी संकल्प शक्ति हमारे समाज और सिस्टम की रगों में दिखाई नहीं देती. सच ये है कि जवानों के साथ देश के समाज का रिश्ता एकतरफा नहीं हो सकता. ऐसा नहीं हो सकता कि सैनिक कुर्बानी देते रहें. और समाज और सिस्टम चुपचाप तमाशा देखता रहे. भारत में 135 करोड़ लोग रहते हैं. अगर ये लोग एक-एक रुपया भी दे दें तो एक ही पल में 135 करोड़ रुपये इकठ्ठे हो जाएंगे.. भारत के ये करोड़ों लोग अगर चाहें तो सभी वीरों का ख्याल रख सकते हैं.