Zee जानकारी : क्यूबा के क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो, पूरी जिंदगी अमेरिका का किया विरोध

पिछले दो दिनों से आपने क्यूबा के सबसे बड़े नेता फिदेल कास्त्रो और उनसे जुड़ी कहानियों के बारे में ज़रूर सुना होगा। लेकिन आपको अभी तक ये समझ नहीं आया होगा कि फिदेल कास्त्रो को दुनिया के महान नेताओं में शामिल क्यों किया जाता है? आखिर वो एक ऐसे नेता क्यों बन गए जिन्हें अमेरिका अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगा? अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को 638 तरीकों से मारने की कोशिश क्यों की? फिदेल कास्त्रो भारत से प्रभावित क्यों थे? फिदेल कास्त्रो ने अपने देश के लिए आखिर ऐसा क्या किया कि उनके निधन के बाद पूरा क्यूबा शोक में डूबा हुआ है? और जब क्यूबा में 9 दिनों का शोक मनाया जा रहा है ठीक उसी वक्त अमेरिका की सड़कों पर कुछ लोग जश्न क्यों मना रहे हैं? 

Zee जानकारी : क्यूबा के क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो, पूरी जिंदगी अमेरिका का किया विरोध

नई दिल्ली : पिछले दो दिनों से आपने क्यूबा के सबसे बड़े नेता फिदेल कास्त्रो और उनसे जुड़ी कहानियों के बारे में ज़रूर सुना होगा। लेकिन आपको अभी तक ये समझ नहीं आया होगा कि फिदेल कास्त्रो को दुनिया के महान नेताओं में शामिल क्यों किया जाता है? आखिर वो एक ऐसे नेता क्यों बन गए जिन्हें अमेरिका अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगा? अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को 638 तरीकों से मारने की कोशिश क्यों की? फिदेल कास्त्रो भारत से प्रभावित क्यों थे? फिदेल कास्त्रो ने अपने देश के लिए आखिर ऐसा क्या किया कि उनके निधन के बाद पूरा क्यूबा शोक में डूबा हुआ है? और जब क्यूबा में 9 दिनों का शोक मनाया जा रहा है ठीक उसी वक्त अमेरिका की सड़कों पर कुछ लोग जश्न क्यों मना रहे हैं? 

आज हम आपको इन सभी सवालों का जवाब देंगे और फिदेल कास्त्रो पर हमारा ये विश्लेषण देखने के बाद आप उन्हें करीब से समझ पाएंगे। ये DNA Test आपकी अंतर्राष्ट्रीय समझ में बहुत इज़ाफा करेगा और आप एक एक्सपर्ट बन जाएंगे। समुद्र के रास्ते क्यूबा से अमेरिका की दूरी सिर्फ 150 किलोमीटर है। लेकिन इतने पास होने के बावजूद ये दोनों देश करीब 57 वर्षों तक एक दूसरे के सबसे बड़े दुश्मन बने रहे। कूटनीति की दुनिया में कहा जाता है कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के साथ दुश्मनी करके आप सरवाइव नहीं कर सकते, आपका गुज़ारा नहीं चल सकता। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिस्ट नेताओं में से एक फिदेल कास्त्रो ने कई बार अमेरिका को खुलेआम चुनौती दी। कास्त्रो ने तो यहां तक कहा था कि वो तब तक नहीं मरेंगे जब तक वो अमेरिका की तबाही नहीं देख लेंगे। 25 नवंबर 2016 को 90 वर्ष की उम्र में फिदेल कास्त्रो का निधन हो गया। और अब लोग सोशल मीडिया पर यहां तक कहने लगे हैं कि अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप का जीत जाना अमेरिका की तबाही है। इसलिए एक तरह से कास्त्रो अपना वादा पूरा करके ही मरे हैं। ये सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने वाला एक मज़ाक है। 

लेकिन सच ये है कि 2016 आते आते अमेरिका और क्यूबा के संबंध पहले के मुकाबले बेहतर हो चुके हैं। मार्च 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने क्यूबा की यात्रा की थी। वो 88 वर्षों में क्यूबा पहुंचने वाले अमेरिका के पहले राष्ट्रपति थे।

-1940 के दशक में फिदेल कास्त्रो राजनीति में सक्रिय हो गए थे। 
-1952 में क्यूबा की तत्कालीन सरकार के अमेरिका से घनिष्ठ संबंध फिदेल कास्त्रो को पसंद नहीं थे।
-तभी से कास्त्रो तत्कालीन सरकार को सत्ता से हटाने की कोशिशों में जुट गए। 
-1953 में कास्त्रो को गोरिल्ला युद्ध के आरोप में 15 वर्ष की जेल की सज़ा सुनाई गई।
-इसके बाद 1955 में आम माफी के तहत उन्हें रिहा कर दिया गया। लेकिन जेल में बिताए गए 19 महीनों ने फिदेल कास्त्रो को हमेशा के लिए बदल दिया।
-उनका झुकाव मार्क्सवाद की तरफ हो गया और वो अपनी पत्नी को तलाक देकर पूरी तरह से राजनीति में सक्रिय हो गए।
-जेल से रिहा होने के बाद दोबारा गिरफ्तारी से बचने के लिए वो मेक्सिको चले गए और फिर 1956 में 81 हथियारबंद साथियों के साथ वापस क्यूबा लौटे। 
-क्यूबा वापस आकर उन्होंने अपनी सेना बनाई और 2 जनवरी 1959 को तानाशाह बतिस्ता को सत्ता से बाहर कर दिया।
-कास्त्रो ने क्यूबा के लोगों से वादा किया था कि वो गरीबों को न्याय दिलाएंगे और अमीरों द्वारा छीनी गई ज़मीनें भी गरीबों को वापस दिलाएंगे।
-लेकिन सत्ता में आते ही फिदेल कास्त्रो ने वन पार्टी सिस्टम लागू कर दिया और हज़ारों लोगों को राजनीतिक बंदी बना लिया गया।
-कास्त्रो ने सत्ता में आते ही क्यूबा के लोगों के बीच राष्ट्रवाद की भावना जगाने की कोशिश की।
-1960 में कास्त्रो ने क्यूबा में अमेरिका द्वारा स्थापित किए गए सभी उद्योग धंधों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। और तभी से अमेरिका और क्यूबा के बीच दुश्मनी की शरुआत हो गई।
-अमेरिका ने क्यूबा पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। प्रतिबंधों का ये सिलसिला 2014 तक चलता रहा।
-अमेरिका और क्यूबा की दुश्मनी की दूसरी बड़ी वजह थी कास्त्रो का कम्युनिस्ट होना। 

कास्त्रो 1959 से लेकर 1976 तक क्यूबा के प्रधानमंत्री रहे और 1976 से 2008 तक उन्होंने क्यूबा के राष्ट्रपति की भूमिका निभाई। 2008 में उन्होंने अपने भाई राउल कास्त्रो को सत्ता सौंप दी। ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ और थाइलैंड के राजा भूमिबोल अद्यूलादेज के बाद फिदेल कास्त्रो तीसरे ऐसे शासक थे जिन्होंने इतने लंबे समय तक राज किया। कास्त्रो ने 2008 में 49 वर्षों के शासन के बाद क्यूबा की सत्ता अपने भाई को सौंपी थी।

1962 में कास्त्रो ने रूस को अपने देश में मिसाइलें तैनात करने की इजाजत दे दी थी। अमेरिका से इन मिसाइलों की दूरी सिर्फ 144 किलोमीटर थी और इन मिसाइलों का निशाना अमेरिका पर ही था। तब अमेरिका और रूस के बीच शीत युद्ध चल रहा था और क्यूबा में रूस की मिसाइलों का पता लगने के बाद परमाणु युद्ध की आशंकाएं तेज़ हो गई थीं।

कास्त्रो 57 वर्षों तक दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका की आंखों में आंखे डालकर खड़े रहे और उसे लगातार चुनौती देते रहे। कास्त्रो के प्रशंसक मानते हैं कि कास्त्रो दुनिया के सबसे बड़े क्रांतिकारी नेताओं में से एक थे। जबकि उनके विरोधियों का मानना है कि वो एक तानाशाह थे। जिन्हें सत्ता की भूख थी और सत्ता पाने के लिए उन्होंने अपने ही लोगों पर अत्याचार किया।

कास्त्रो के विरोधी ये भी कहते हैं कि उन्होंने वामपंथ का इस्तेमाल अपनी सुविधा के मुताबिक किया। क्योंकि ज़रूरत पड़ने पर वो कभी रूस के साथ दिखाई देते थे तो कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत जैसे देशों के साथ खड़े हो जाते थे। सबके अपने अपने तर्क हैं। लेकिन सच ये है कि आप कास्त्रो के प्रशंसक हो सकते हैं या उनकी आलोचना भी कर सकते हैं लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। क्योंकि वियतनाम के बाद शायद क्यूबा ही अकेला ऐसा देश है जिसने छोटा और कम ताकतवर होने के बावजूद अमेरिका को चुनौती दी और कई मौकों पर जीत भी हासिल की। आप कह सकते हैं कि कास्त्रो ने राष्ट्रवाद के दम पर क्यूबा को एक ऐसे देश में बदल दिया जो अमेरिका के सामने कद में छोटा ज़रूर है। लेकिन उसके हौसले अमेरिका कभी नहीं तोड़ पाया। ये विरोधाभास है कि भारत में कुछ विपक्षी दल इस तरह के राष्ट्रवाद का विरोध करते हैं जबकि 57 वर्षों से क्यूबा में राष्ट्रवाद के दम पर काम करने वाली एक वामपंथी सरकार है। फिर भी किसी ने कभी क्यूबा के राष्ट्रवाद का विरोध नहीं किया।

वैसे आपको ये बता दें कि लंबे समय तक क्यूबा को दुनिया में शक्कर का कटोरा कहा जाता था क्योंकि क्यूबा में चीनी का उत्पादन सबसे ज्यादा होता था। लेकिन अब क्यूबा से ये उपाधि ब्राज़ील और भारत ने छीन ली है। हालांकि इसके बावजूद भारत और क्यूबा के संबंध चीनी जैसे मीठे रहे हैं। 1992 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जब क्यूबा के लोग परेशानी के दौर से गुजर रहे थे। तब भारत ने 10 हज़ार टन चावल और 10 हज़ार टन गेहूं देकर क्यूबा की मदद की थी तब कास्त्रो ने इसे ब्रेड ऑफ इंडिया का नाम दिया था। 

फिदेल कास्त्रो को अपने सिगार के शौक के लिए जाना जाता था। पूरी दुनिया में क्यूबा का सिगार काफी पसंद किया जाता है। ध्यान रहें हम आपको सिर्फ ये बता रहे हैं कि क्यूबा का सिगार पूरी दुनिया में बहुत मशहूर है। लेकिन आपको ये नहीं भूलना चाहिए कि सिगार और सिगरेट पीने से कर्क रोग होता है यानी कैंसर होता है और ये जानलेवा है। 

यही बात 1985 में फिदेल कास्त्रो को भी समझ में आ गई थी और तब उन्होंने सिगार पीना बंद कर दिया था। क्योंकि इससे उनकी सेहत खराब रहने लगी थी। जब कास्त्रो ने सिगार पीना छोड़ा तो उन्होंने कहा कि सिगार के डिब्बों के साथ सबसे अच्छी बात ये है कि इसे आप अपने दुश्मनों को भी दे सकते हैं। यानी कास्त्रो, सिगार और तंबाकू के खतरों को अच्छी तरह पहचानते थे और उन्होंने क्यूबा और दुनिया के लोगों को ये संदेश देने की कोशिश की कि ये सेहत के लिए खतरनाक है। ये कास्त्रो के जीवन का एक अच्छा पहलू था।

भारत में आपने किसी राजनेता को अपनी और आम लोगों की सेहत के लिए सिगार या ऐसी कोई दूसरी बुरी आदत को छोड़ते हुए नहीं देखा होगा। अगर कोई नेता ऐसा करता भी है तो उसे कभी सार्वजनिक नहीं करता। इसलिए भारत के नेता फिदेल कास्त्रो से सबक ले सकते हैं। कास्त्रो को अपनी दाढ़ी से बहुत प्यार था और उनकी दाढ़ी उनकी पहचान थी। कास्त्रो ने कभी शेव नहीं कराई इसकी 3 वजहें थी। पहली ये कि वो अपनी दाढ़ी को अपनी पहचान मानते थे और क्यूबा के लोग भी कास्त्रो के दाढ़ी वाले लुक को काफी पसंद करते थे। 

दूसरी वजह ये थी कि कास्त्रो शेव करने को वक्त की बर्बादी मानते थे। उनका कहना था कि एक बार शेव करने में 15 मिनट का वक्त लगता है। इस हिसाब से रोज़ाना शेव करने पर एक वर्ष में उनके 5 हज़ार मिनट खराब हो जाएंगे और वो इस वक्त का इस्तेमाल दूसरे ज़रूरी कामों में कर सकते हैं। कास्त्रो का तीसरा तर्क ये था कि जब क्यूबा ब्लेड बनाना शुरू कर देगा तब वो शेविंग कर लेंगे। यानी कास्त्रो के लिए अपने देश को आत्म निर्भर बनाना पहली प्राथमिकता थी।  

फिदेल कास्त्रो 49 वर्षों तक क्यूबा की सत्ता में रहे और इस दौरान अमेरिका में 10 राष्ट्रपति आए और गए लेकिन फिदेल कास्त्रो किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने नहीं झुके। यहां तक कि जब मार्च 2016 में बराक ओबामा क्यूबा गए तब भी कास्त्रो ने उनसे मुलाकात नहीं की और कहा कि क्यूबा को अमेरिका से कुछ नहीं चाहिए।

कास्त्रो के बारे में कई कहानियां और किस्से मशहूर हैं। ऐसा ही एक किस्सा सफेद कबूतरों से जुड़ा है। सत्ता में आने के बाद 8 जनवरी 1959 को जब फिदेल कास्त्रो भाषण दे रहे थे। तब एक सफेद कबूतर उनके कंधे पर आकर बैठ गया था। क्यूबा के लोगों का मानना था कि ये एक तरह का डिवाइन अप्रूवल था। यानी भगवान भी क्यूबा की सत्ता को कास्त्रों के हाथ में देना चाहता था।

हालांकि बाद में ये भी कहा जाने लगा कि शायद इन कबूतरों को एक दिन पहले इसकी ट्रेनिंग दी गई थी। 

यहां आपको एक दिलचस्प तथ्य और बता दें कि कास्त्रो के नाम संयुक्त राष्ट्र में सबसे लंबा भाषण देने का वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज है। कास्त्रो ने 29 सितंबर 1960 को संयुक्त राष्ट्र में 4 घंटे 29 मिनट का भाषण दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने क्यूबा में 1986 में 7 घंटे 10 मिनट का भाषण दिया था।

कहा जाता है कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA ने कास्त्रो को मारने और उन्हें बदनाम करने के लिए 638 बार कोशिशें की थी। एक बार CIA ने अपनी योजना के तहत कास्त्रो के सिगार में विस्फोटक औऱ जहर भरने की कोशिश की थी।

कास्त्रो को CIA द्वारा एलएसडी ड्रग देने की भी कोशिश हुई थी। ये कोशिश कास्त्रो के एक टीवी कार्यक्रम से पहले की गई थी ताकि कास्त्रो पर नशा हावी हो जाए और वो ऑन एयर ही गिर पड़े। एक तरह से CIA कास्त्रो की लोकप्रियता में कमी लाने में जुटी हुई थी। लेकिन ये कोशिश भी नाकाम रही। इसी तरह एक बार कास्त्रो के जूतों में एक खास तरह का केमिकल डालने की योजना बनाई गई। इस केमिकल के प्रभाव से कास्त्रो की दाढ़ी के बाल झड़ जाने की उम्मीद CIA को थी। CIA जानती थी कि कास्त्रो और क्यूबा के लोगों को उनकी दाढ़ी से बहुत प्यार है। इसलिए कास्त्रो से दाढ़ी छीनकर उन्हे कमज़ोर किया जा सकता है।

कास्त्रो की आइस क्रीम के ज़हर मिलाकर उन्हें मारने की योजना बनाई गई थी। लेकिन वक्त रहते इसे भी नाकाम कर दिया गया।

कास्त्रों को सी डाइविंग का बहुत शौक था। CIA ने कोशिश की थी कि कास्त्रो को ज़हर भरा डाइविंग सूट पहनने के लिए दिया जाए। लेकिन ये सूट कभी प्रयोगशाला से बाहर नहीं आ पाया। जहां कास्त्रो सी डाइविंग किया करते थे वहां एक समुद्री सीप में बम रखने की योजना भी बनाई गई थी। लेकिन CIA को इतनी बड़ी सीप नहीं मिल पाई जिसमें कास्त्रों की जान लेने लायक विस्फोटक रखा जा सके। यानी कास्त्रो अमेरिका के लिए एक ऐसे नेता बन चुके थे जिससे अमेरिका किसी भी हालत में पीछा छुड़ाना चाहता था। लेकिन अमेरिका चाहकर भी ऐसा नहीं कर पाया।