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ZEE Jankari: अगले 100 दिन में मोदी सरकार कर सकती है ये अहम फैसले

इस वक़्त अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार और कृषि क्षेत्र की चुनौती से लेकर कई ऐसे मुद्दे हैं जिनपर सरकार को ज़मीन पर काम करने की ज़रूरत है. सरकार नई औद्योगिक नीति पर काम कर रही है. इसमें देश को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने पर ज़ोर दिया गया है.

ZEE Jankari: अगले 100 दिन में मोदी सरकार कर सकती है ये अहम फैसले

इस वक़्त देश ही नहीं पूरी दुनिया ये जानना चाहती है कि मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में क्या बड़े फ़ैसले लेगी. चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने बताया था कि उन्होंने नई सरकार के अगले 100 दिनों का एजेंडा तय कर लिया है. आर्थिक, अंतरराष्ट्रीय और सामाजिक पहलुओं को लेकर मोदी सरकार कई नये उपायों की शुरुआत कर सकती है. इस वक़्त अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार और कृषि क्षेत्र की चुनौती से लेकर कई ऐसे मुद्दे हैं जिनपर सरकार को ज़मीन पर काम करने की ज़रूरत है. सरकार नई औद्योगिक नीति पर काम कर रही है. इसमें देश को वैश्विक सप्लाई चेन से जोड़ने पर ज़ोर दिया गया है. इसके तहत रोज़गार के मौक़े बढ़ाने के लिये सरकार नई योजनाएं ला सकती है.

सरकार infrastructure को मज़बूत करने, नये राजमार्ग जैसी योजनाओं की शुरुआत कर सकती है. FDI यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर सरकार नया लक्ष्य तय कर सकती है. पिछले वित्तीय वर्ष में भारत में 4.16 लाख करोड़ का विदेशी निवेश हुआ था. सरकार अब 7 लाख करोड़ रुपये के FDI का लक्ष्य तय कर सकती है. GST की दरों में बदलाव किया सकता है.

अभी लागू चार दरों की जगह सिर्फ़ दो दर की जा सकती हैं. बैंकों को मज़बूत करने के लिये क़दम उठाये जा सकते हैं. कृषि उत्पादों के निर्यात पर incentive बढ़ाया जा सकता है. इससे किसानों की आय बढ़ेगी. सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का वादा किया था. E-commerce policy में भी सरकार बदलाव कर सकती है, ताकि बड़ी विदेशी कंपनियों से छोटे मझोले व्यापारियों को नुक़सान ना हो, वो प्रतिस्पर्धा में बने रहें.

सरकारी संस्थानों के निजीकरण में भी अब तेज़ी लाई जा सकती है
प्रधानमंत्री मोदी अपने कई विदेशी दौरों पर ये बात कह चुके हैं कि वो भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर यानी क़रीब 350 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था बनाने का इरादा रखते हैं. अभी भारत 200 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था बनने की कगार पर खड़ा हुआ है. प्रधानमंत्री मोदी को दोबारा मिला जनादेश ऐतिहासिक है. वैसे तो ये कई वजह से historical mandate है. पर, हम ख़ास तौर से वोट प्रतिशत के बारे में ये बात कह रहे हैं. नरेंद्र मोदी की सरकार 2014 के मुक़ाबले 6 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़े हुए वोट के साथ सत्ता में लौटी है. जबकि वर्ष 1957 में जब पंडित नेहरू, दोबारा प्रधानमंत्री बने तब उनके वोट शेयर में 2.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी.

इंदिरा गांधी वर्ष 1971 में जब दोबारा प्रधानमंत्री बनीं तो उनका वोट शेयर में 2.29 प्रतिशत बढ़ा था. वर्ष 2009 में जब मनमोहन सिंह दोबारा प्रधानमंत्री बने तब कांग्रेस के वोट शेयर में 2.8 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ था. और अब नरेंद्र मोदी दोबारा प्रधानमंत्री चुने गये हैं. इस बार 2014 के मुक़ाबले बीजेपी का वोट 6 प्रतिशत बढ़ा है. यानी वोट प्रतिशत के मामले में प्रधानंमत्री मोदी उन सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों को पीछे छोड़ दिया है जो दोबारा चुने गये थे.
 
एक मज़बूत सरकार संसद में अपनी ताक़त से मज़बूत प्रशासन देती है. संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत होने पर कोई भी सरकार जनहित में बड़े फ़ैसले ले सकती है. दो तिहाई बहुमत के लिए लोकसभा की कुल 543 सीटों में से 362 सांसद होने चाहिये. अभी NDA के पास 353 सांसद हैं. वहीं, राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत 163 सांसद होने पर होगा जबकि, NDA के पास 102 सांसद हैं.

NDA के लिये लोकसभा में ये राह आसान है क्योंकि, उसे कई ग़ैर UPA दल जैसे TRS और BJD का समर्थन मिल सकता है, लेकिन राज्यसभा में ये इंतज़ार लंबा है. अभी NDA के लिये राज्यसभा में सामान्य बहुमत यानी 123 की संख्या तक पहुंचना ही बड़ी चुनौती है.
16वीं लोकसभा में 22 बिल रुके हुए थे, यानी ये बिल नई यानी 17वीं लोकसभा में दोबारा से पेश करने होंगे. जबकि राज्यसभा में 39 बिल पारित होने बाक़ी हैं.

संसद के दोनों सदनों में बहुमत आने पर बीजेपी के लिये इन्हें पास कराना आसान हो जाएगा क्योंकि अभी तक राज्यसभा में NDA कमज़ोर है. इसलिये कई ऐसे बिल हैं जो NDA के बहुमत आने पर ही आराम से पास कराये जा सकते हैं. अभी तक बहुमत ना होने से ट्रिपल तलाक़ के अलावा National Register of Citizens Bill और नागरिकता संशोधन बिल लोकसभा में ही पास हो पाये थे. अब उन्हें दोबारा लोकसभा में पेश करना होगा. संविधान संशोधन समेत बीजेपी के कई ऐसे मुद्दे हैं, जिसे वो संसद में दो तिहाई बहुमत के बग़ैर आगे नहीं बढ़ा सकती है.

दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत लाने पर ही संविधान में संशोधन किया जा सकता है. इसके ज़रिये जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 और अनुच्छेद 35A को हटाया जा सकता है. इससे ट्रिपल तलाक़ पर नया क़ानून भी बन पाएगा, राज्यसभा में विपक्ष इस बिल में रुकावट बना हुआ है. अगर अयोध्या में मंदिर के लिये मोदी सरकार को अलग से क़ानून बनाना पड़ा...तब भी उसे संसद में दो तिहाई बहुमत चाहिये होगा. नागरिकता संशोधन बिल और Land Reform बिल पास कराने के लिये भी सरकार को दो तिहाई बहुमत की ज़रूरत होगी. दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत होने पर मोदी सरकार देश में समान नागरिक संहिता यानी Uniform Civil Code भी लागू कर सकती है.

2019 लोकसभा चुनाव के फैसले में देश की जनता का एक ऐसा संदेश भी छिपा है...जिस पर आपका ध्यान शायद अब तक नहीं गया हो...इस बार देश के 60 करोड़ मतदाताओं ने नेताओं के झूठ पर वोट वाली सर्जिकल स्ट्राइक कर दी...जनता ने इस चुनाव में झूठ की राजनीति करने वाले नेताओं को नकार दिया, जिन नेताओं ने ये गलतफहमी पाल रखी थी कि झूठ बोलकर वो जनता का भरोसा जीत सकते हैं...उनका वोट हासिल कर सकते हैं...ऐसी गलतफहमी के शिकार नेताओं को जनता ने चुनाव में चुन-चुनकर सबक सिखाया.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पूरे चुनाव के दौरान रैलियों से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक दावा करते रहे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव हार रहे हैं. इस बार लोकसभा चुनाव सात चरण में हुए और राहुल गांधी ने चार चरण के चुनाव खत्म होने के बाद ही दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. राहुल ने दावा किया कि बीजेपी स्पष्ट तौर पर चुनाव हार रही है...पहले आप राहुल गांधी का वो बयान सुन लीजिए.

यहां आपके लिए ध्यान देने वाली बात ये है कि राहुल गांधी पीएम मोदी की हार का झूठा दावा कर रहे थे, जबकि ज़मीनी हकीकत कुछ और थी. राहुल गांधी ने चुनाव नतीजे के बाद अपनी हार तो मानी लेकिन क्या राहुल गांधी से ये नहीं पूछा नहीं जाना चाहिए कि आपने मोदी की हार के झूठा दावा किस आधार पर किया था. पंजाब की कांग्रेस सरकार में पर्यटन मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने 29 अप्रैल 2019 को रायबरेली की चुनावी सभा में कहा था कि अगर राहुल गांधी अमेठी से चुनाव हार जाते हैं तो वो राजनीति छोड़ देंगे. सिद्धू का ये झूठ, बयान के रूप में हमारे पास मौजूद है...सुनिए सिद्धू ने क्या कहा था.

23 मई को चुनाव परिणाम आया और अमेठी में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को 55 हज़ार 120 वोट से हरा दिया. इस ऐतिहासिक घटना के 4 दिन हो चुके हैं. 100 घंटे से ज्यादा समय बीत चुका है लेकिन सिद्धू ने राजनीति तो दूर की बात है, पंजाब सरकार में मंत्री की कुर्सी भी अब तक नहीं छोड़ी है.

तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी को एक्सपायरी पीएम कहती थीं. लेकिन पश्चिम बंगाल की जनता ने 42 सीट में से 18 सीट बीजेपी को देकर ये संकेत दिए कि आने वाले विधानसभा चुनाव में कहीं ममता बनर्जी एक्सपायरी सीएम ना बन जाएं. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी-बीएसपी और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन था. अखिलेश यादव ने भी अपनी अधिकतर चुनावी सभाओं में जोर-शोर से दावे किए कि देश को अगला प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही मिलेगा, लेकिन उस प्रधानमंत्री का नाम नरेंद्र मोदी नहीं होगा.

ये तो सच है कि देश का अगला प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से ही होगा लेकिन अखिलेश यादव की दूसरी बात 100 प्रतिशत झूठ साबित हुई...क्योंकि देश के अगले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही होंगे. बीएसपी अध्यक्ष मायावती.. समाजवादी पार्टी से गठबंधन के बाद प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने लगी थीं. जाति की राजनीति करने के लिए प्रसिद्ध मायावती ने पीएम मोदी की जाति पर जनता से झूठ बोला...लेकिन जनता ने मोदी पर मायावती के झूठ का जवाब लोकतंत्रात्मक तरीके से दिया...80 लोकसभा सीट वाले उत्तर प्रदेश में गठबंधन को सिर्फ 15 सीट मिल सकीं.
 
Telugu Desam Party यानी टीडीपी के अध्यक्ष एन. चंद्रबाबू नायडू 23 मई से पहले तक आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे...लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हार को लेकर अति आत्मविश्वास से भरे चंद्रबाबू नायडू ने अपना प्रदेश छोड़कर ज्यादातर समय मोदी विरोधी पार्टियों को एकजुट करने में लगाया...झूठ का सहारा लिया. लेकिन, वो नाकाम रहे...आंध्र प्रदेश की जनता ने लोकसभा चुनाव में 25 सीट में से सिर्फ 3 सीट टीडीपी को दी. लोकसभा के साथ हुए विधानसभा चुनाव में भी टीडीपी की बुरी हार हुई.

झूठ के सहारे सत्ता पाने का सपना देखने वाले नेताओं को जनता ने जिस तरह सबक़ सिखाया है...उस पर हमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कही एक बात याद आ रही है. और हम इसे आपसे साझा करना चाहते हैं गांधी जी ने कहा था "सबसे अच्छा तो यही है कि झूठ का कोई जवाब ही न दिया जाए, झूठ अपनी मौत मर जाता है. उसकी अपनी कोई शक्ति नहीं होती, विरोध पर वह फलता-फूलता है."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी शक्ति उनकी साख है. 5 वर्ष के पहले कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि बेदाग़ रही. पीएम मोदी और मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं लगा. लेकिन विपक्ष को लगा कि पीएम मोदी की साख पर भ्रष्टाचार के दाग़ लगा कर वो 2019 की बाजी जीत जाएगा...राहुल गांधी ने इस कोशिश में रफाल का सहारा लिया और 'चौकीदार चोर है' का शोर मचाया..लेकिन देश की समझदार जनता के सामने राहुल की ये कोशिश उल्टी पड़ गई.

संसद में भी राहुल गांधी का अमर्यादित व्यवहार लोगों को पसंद नहीं आया 20 जुलाई 2018 को राहुल गांधी लोकसभा में आंख मार रहे थे. उस दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर अपना भाषण खत्म करने के तुरंत बाद नरेंद्र मोदी की सीट पर गए थे, और पीएम की इजाजत के बगैर उन्हें गले लगा लिया. राहुल का ये व्यवहार देखकर पीएम खुद हैरान थे. उसके बाद राहुल गांधी अपनी सीट पर बैठे और किसी नेता की तरफ देखते हुए आंख मारी...उस वक्त संसद में राहुल गांधी के इस बर्ताव की कड़ी आलोचना हुई थी...और चुनाव में खासकर अमेठी की जनता ने ये जता दिया कि संसद में ऐसा व्यवहार देश को बर्दाश्त नहीं है.

सीमा पर पाकिस्तान की सेना हमारे जवानों पर...निर्दोष नागरिकों पर गोलियां बरसा रही थीं. ऐसे माहौल में कांग्रेस के नेता और पंजाब सरकार में मंत्री, नवजोत सिंह सिद्धू पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल क़मर जावेद बाजवा से गले मिल रहे थे...सिद्धू 18 अगस्त 2018 को इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने पाकिस्तान गए थे. उसी दौरान सिद्धू, जनरल बाजवा से गले मिले...सिद्धू ने जनरल बाजवा की तारीफ की थी और इमरान ख़ान को तो फरिश्ता तक बता दिया...ये बात देश को बहुत बुरी लगी थी...देश की जनता ने इस मिलन को अपनाने से इंकार कर दिया. जनता का स्पष्ट संदेश है कि गले मिलना हो तो अपनों से मिलिए देश के दुश्मनों से नहीं.

मायावती और अखिलेश का गठबंधन भी लोगों को पसंद नहीं आया...लोकसभा चुनाव से पहले मायावती और अखिलेश यादव ने 25 साल पुरानी राजनीतिक रंजिश भुलाकर एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था..जातीय समीकरण पर बने गठबंधन का एजेंडा सिर्फ और सिर्फ मोदी को चुनाव में हराना था...जिसे जनता ने अस्वीकार कर दिया.