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Zee जानकारी: भूख और प्यास से मर रहा है 21वीं सदी का भारत

बुंदेलखंड के बांदा में भूख से हुई मौत की स्थिति को समझने के लिए, आज आपको एक सर्वे में कही गई बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। ये ऐसे आंकड़े हैं, जिन्होंने हमारे सिस्टम पर गहरी चोट की है। पिछले वर्ष बुंदेलखंड में सूखे के बाद की स्थिति को लेकर एक सर्वे किया गया था। जिसका नाम था, Bundelkhand Drought Impact Assessment Survey 2015, जिसमें हैरान और परेशान कर देने वाले तथ्य सामने आए थे।

Zee जानकारी: भूख और प्यास से मर रहा है 21वीं सदी का भारत
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नई दिल्ली: बुंदेलखंड के बांदा में भूख से हुई मौत की स्थिति को समझने के लिए, आज आपको एक सर्वे में कही गई बातों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। ये ऐसे आंकड़े हैं, जिन्होंने हमारे सिस्टम पर गहरी चोट की है। पिछले वर्ष बुंदेलखंड में सूखे के बाद की स्थिति को लेकर एक सर्वे किया गया था। जिसका नाम था, Bundelkhand Drought Impact Assessment Survey 2015, जिसमें हैरान और परेशान कर देने वाले तथ्य सामने आए थे।

सर्वे में दावा किया गया था, कि 108 गांवों के 53 फीसदी गरीब परिवारों को 8 महीने तक दाल नसीब नहीं हुई थी। 69 फीसदी ग़रीब लोगों ने दूध नहीं पिया था। सर्वे में कहा गया था, कि बुंदेलखंड में हर 5वां परिवार हफ्ते में कम से कम एक दिन भूखा सोता है। सर्वे के मुताबिक पिछले वर्ष बुंदेलखंड के 38 फीसदी गांवों में भूख से मौतें हुई थीं।

United Nations की 2015 की रिपोर्ट कहती है, कि भारत में Extreme Poverty यानी भयानक गरीबी के हालात में रहने वाले लोगों की संख्या क़रीब 30 करोड़ है। आपको ये जानकर हैरानी होगी, कि दुनियाभर में भुखमरी का शिकार होने वाले कुल लोगों का एक चौथाई हिस्सा भारत में ही रहता है। 2015 के Global Hunger Index के मुताबिक, भुखमरी का सामना करने वाले लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा भारत में है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साढ़े 19 करोड़ लोगों को ज़रूरत के मुताबिक भोजन नहीं मिलता है। यानी 30 करोड़ लोग भयानक रूप से गरीब हैं और 19 करोड़ लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। भारत में 5 साल से कम उम्र के 40 फीसदी से ज़्यादा बच्चों का वजन, तय मानकों से बेहद कम है।

एक आंकड़े के मुताबिक देश में हर रोज़ 18 करोड़ लोग भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं। Forum for Learning and Action with Innovation and Rigour की रिपोर्ट कहती है, कि भारत में 5 साल के कम उम्र के 50 फीसदी बच्चों की मौत कुपोषण की वजह से होती है। और Helpage India की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 5 करोड़ लोग भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं। यानी भूख उम्र में फर्क नहीं करती, चाहे बच्चे हों या बुज़ुर्ग भूख की मार सब पर पड़ती है।

केंद्र और राज्य दोनों के स्तर पर भूख से होने वाली मौत को रोकने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। जिनमें BPL योजना, अंत्योदय अन्न योजना और अन्नपूर्णा योजनाएं शामिल हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, देश की दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज देने की गारंटी भी देता है लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या है। ये भी देख लीजिए...

हमारे देश में हर साल, 2 करोड़ 10 लाख टन गेंहू बर्बाद होता है, जो ऑस्ट्रेलिया में गेहूं के कुल उत्पादन के बराबर है।
वर्ष 2010 से 2015 के बीच 26 हज़ार टन से ज़्यादा गेंहू Food Corporation of India के Godowns में पड़े-पड़े बर्बाद हो गया। सही रख-रखाव, ट्रांसपोर्ट और दूसरे कारणों से हमारे देश में 40 फीसदी से ज़्यादा फल और सब्ज़ियां बर्बाद हो जाती हैं, लेकिन ग़रीबों की थाली तक नहीं पहुंचती। वर्ष 2028 तक भारत की आबादी 145 करोड़ होने का अनुमान है, ऐसे में अगर जल्द ही उचित कदम नहीं उठाए गए तो हालात बहुत ख़राब हो जाएंगे।

हमारे देश में विडंबना इस बात की है कि लोग भूख और प्यास से मर रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर देश की संसद मौन है। संसद में बहस तो हो रही है, लेकिन भूख और प्यास से मरते लोगों पर नहीं बल्कि घोटालों पर। आपने हमारे देश के नेताओं को उत्तेजक स्वरों में अपनी पार्टी और दूसरे नेताओं का बचाव करते हुए तो देखा होगा लेकिन नेताओं के ये तेवर आम जनता और ख़ासतौर पर गरीबों का मुद्दा सामने आने पर ठंडे पड़ जाते हैं। संसद में आपने गरीबों और किसानों से जुड़े मुद्दों पर बहस के दौरान खाली बेंच देखे होंगे। इससे पता चलता है कि नेता गरीबों को लेकर कितने Serious हैं।

देश के सांसदों पर ये ज़िम्मेदारी होती है कि वो आम आदमी की आवाज़ को संसद में उठाएं। लेकिन आजकल हमारे सांसद Agusta-Westland घूसकांड पर बहस कर रहे हैं। संसद में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं, और कागज़ लहराकर एक दूसरे की राजनीतिक साख पर Dent मारने की कोशिश की जा रही है, लेकिन आम आदमी की आवाज़ कोई नहीं उठा रहा। 

इसीलिए आज हम ये सवाल उठा रहे हैं कि हमारे देश की संसद में लातूर और बुंदेलखंड में भूख और प्यास के शिकार आम लोगों पर बहस क्यों नहीं होती ? क्या देश में आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली तमाम एजेंसियां होने के बाद संसद में Agusta Westland जैसे घोटालों पर बहस करना, देश के कीमती समय और देश के पैसे की बर्बादी नहीं है? देश में CBI और ED जैसी तमाम जांच एजेंसियां हैं। ऐसे में जांच से पहले इस मुद्दे पर बहस करके समय क्यों बर्बाद किया जाता है। 

एक घंटे तक संसद के दोनों सदनों को चलाने का खर्च 2 करोड़ 60 लाख रुपये है। यानी संसद की कार्यवाही को एक मिनट तक चलाने का खर्च करीब 4 लाख 33 हज़ार रुपये है। और अगर औसतन दोनों सदनों में एक दिन में 6 घंटे तक काम होता है तो उसमें 14 करोड़ 50 लाख रुपये खर्च होते हैं। 

आज राज्यसभा में दोपहर 2 बजे से शाम 7:30 बजे तक यानी साढ़े 5 घंटे तक Agusta-Westland घोटाले पर बहस हुई । राज्यसभा में एक घंटे की कार्यवाही चलाने में 1 करोड़ 10 लाख रुपये खर्च होते हैं। इस हिसाब से आज हुई बहस पर राज्यसभा ने 6 करोड़ 5 लाख रुपये बर्बाद कर दिए। बहस में बर्बाद होने वाला पैसा आपका है यानी इस देश के आम आदमी का है।
 
और इसीलिए हम ये सवाल उठा रहे हैं कि क्या घोटालों पर बहस करना समय और पैसे दोनों की बर्बादी नहीं है? क्योंकि संसद में घोटालों पर बहस करने से आज तक ना तो घोटाले का पैसा वसूल हुआ है और ना ही घोटाले के आरोप साबित हुए हैं। ऐसी बहसों से सिर्फ उन लोगों को फायदा होता है जो अपना राजनीतिक एजेंडा चला रहे हैं। जनता के हित का इससे कुछ लेना देना नहीं है।

आपको याद होगा कि 1987 में बोफोर्स तोप सौदे को लेकर घोटाले की बात सामने आई थी। इसके बाद वर्षों तक जांच हुई और इस दौरान बहस की वजह से संसद की कार्यवाही के सैकड़ों घंटे बर्बाद हुए होंगे लेकिन इसका कोई ऐसा नतीजा नहीं निकला, जिससे देश को कोई फायदा हो। कुल मिलाकर संकेत यही है कि संसद में घोटालों पर बहस करने से सिर्फ देश का पैसा और समय ही बर्बाद होता है।