ZEE जानकारी : देश के भविष्य का निर्माण करने वाले शिक्षकों का वर्तमान कैसा है?

हमारे देश के शिक्षकों पर उम्मीदों का ज़बरदस्त बोझ है, और उन्हें दुनिया के पैमानों पर अच्छा वेतन भी नहीं मिलता. इस बात ने गुरु-शिष्य परंपरा को बहुत नुकसान पहुंचाया है.

ZEE जानकारी : देश के भविष्य का निर्माण करने वाले शिक्षकों का वर्तमान कैसा है?

जिस तरह हम खबरों का बारीकी से DNA टेस्ट करते हैं. आप को खबर से जुड़ी एक एक जानकारी देते हैं और आपके सभी सवालों का जवाब देने की कोशिश करते हैं. कुछ ऐसा ही देश के शिक्षक अपने छात्रों के साथ करते हैं. फर्क सिर्फ ये होता है शिक्षकों को सभी सवालों का जवाब Black Board पर देना होता है. और हम ये काम टीवी स्क्रीन पर करते हैं. जिज्ञासाओं को शांत करने, जानकारियों और सवालों का जवाब देने की प्रेरणा हमें शिक्षकों से मिलती है. इसलिए शिक्षक दिवस के मौके पर हम देश भर के शिक्षकों को नमन करते हुए इस विश्लेषण की शुरूआत करेंगे. अंग्रेज़ी की एक मशहूर कहावत है Teaching is the one profession that creates all other professions.

यानी शिक्षा देना ही इकलौता ऐसा काम है. जो बाकी सभी तरह के पेशों को जन्म देता है. यानी शिक्षकों के बिना किसी भी सभ्य और समृद्ध समाज की कल्पना नहीं की जा सकती. ये सब बहुत अच्छी और सपनीली बातें हैं, लेकिन यथार्थ की बात करें तो आज हम कुछ सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं. हम ये समझना चाहते हैं कि देश के भविष्य का निर्माण करने वाले शिक्षकों का वर्तमान कैसा है? वो कैसे हालात में इतना बड़ा और महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं? और उन्हें इस काम के बदले में मिलता क्या है? आज हम पूरी शिक्षा व्यवस्था को शिक्षकों की नज़र से देखेंगे. 

एक ज़माने में भारत विश्व गुरु था, भारत को गुरुओं की भूमि कहा जाता था. भारत की गुरु-शिष्य परंपरा दुनिया भर में प्रसिद्ध थी. लेकिन धीरे धीरे ये परंपरा कहीं खो गई. आज भारत को दोबारा विश्वगुरू बनाने के लिए एक बार फिर उस परंपरा को जीवित करने की ज़रूरत है. यहां आपको ये भी पता होना चाहिए कि शिक्षक और गुरु के बीच क्या फर्क होता है.

आध्यात्मिक गुरु ओशो ने अपने एक आख्यान में गुरु की महत्ता बताई थी. ओशो ने कहा था कि गुरु जैसा शब्द दुनिया की किसी और भाषा में नहीं है. गुरु पूरी तरह से भारतीय शब्द है. शिक्षक से किसी भी छात्र का संबंध व्यावसायिक होता है. आप किसी के पास कुछ सीखने जाते हैं, और बदले में कुछ देते हैं, लेकिन जब आप गुरु से कुछ सीखते हैं, तो बदले में गुरु को कुछ दिया नहीं जा सकता. क्योंकि गुरु आपको जो देता है, उसका कोई मूल्य नहीं है. वो अनमोल है. शिक्षक आपको सूचनाएं और जानकारियां देता है, लेकिन गुरु आपको अनुभव देता है. एक शिक्षक के पास से आप ज्ञानी होकर लौटते हैं, लेकिन गुरु के पास से आप पूरी तरह रूपांतरित होकर लौटते हैं. गुरु पहले हमें मिटाता है और फिर नये का निर्माण करता है. इसलिए सही मायने में गुरु ही समाज के व्यक्तित्व का निर्माण करता है. 

एक दौर ऐसा भी था जिसमें शिक्षा की जो किरण भारत से निकलती थी, वो पूरी दुनिया को रोशन करती थीं. आज से करीब ढाई हज़ार वर्ष पहले पैदा हुए सिद्धार्थ, जिन्होंने अपना राजसी वैभव छोड़कर ज्ञान की तलाश शुरू की और बाद में भगवान बुद्ध कहलाए. उन्होंने कहा था कि सत्य की खोज करने के लिए प्रश्न पूछने चाहिए और सही उत्तर की तलाश में अगर भटकना भी पड़े तो संकोच नहीं करना चाहिए.

चाणक्य एक ऐसे ही शिक्षक थे, जिन्होंने राजनीति और अर्थशास्त्र के मायने बदल दिए. उन्होंने एक साधारण बालक को सम्राट बना दिया था और विचार को व्यवहार में बदलने की शिक्षा दी थी. करीब 2300 वर्ष पहले विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की रचना की और शिक्षा देने के लिए कहानियों का उपयोग किया. विष्णु शर्मा ने शिक्षा के ज़रिए तीन राजकुमारों को योग्य प्रशासक के रूप में तब्दील कर दिया था.

पांचवी सदी में आर्यभट्ट ने गणित और खगोलशास्त्र के क्षेत्र में ऐतिहासिक खोजें कीं. आर्यभट्ट ने ही दुनिया को शून्य का ज्ञान दिया. भारत को विश्वगुरु बनाने में आर्यभट्ट की बहुत बड़ी भूमिका थी. आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने देश में शास्त्रार्थ की परंपरा शुरू की. उन्होंने जीवन में तर्क को सबसे ऊंचा दर्जा दिया और सत्य की खोज करने वालों के लिए 4 पीठों की स्थापना की. 15वीं सदी में पैदा हुए कबीर भी एक ऐसे ही शिक्षक थे, जिन्होंने सरल दोहों के माध्यम से समाज की बुराइयों पर कटाक्ष किया और लोगों को सही तरीके से जीवन जीने की शिक्षा दी. 

ये वो गुरु हैं, जिन्होंने भारतवर्ष का निर्माण किया, भारत को नई दिशा दी. इन सभी महापुरुषों का जीवन आधुनिक शिक्षकों के लिए एक संदेश है, क्योंकि शिक्षा के माध्यम चाहे जितने भी आधुनिक हो जाएं, शिक्षा की मूल भावना हमेशा एक ही रहती है.

भारत वह देश है जहां गुरुओं को हमेशा सम्मान दिया जाता है. भारत में शिष्यों ने हमेशा गुरुओं को सम्मान दिया है. भारत वह देश है जहां एकलव्य जैसे छात्र ने गुरु दक्षिणा के तौर पर अपना अंगूठा काटकर अपने गुरु को दे दिया था. लेकिन अब ज़माना बदल गया है, गुरुदक्षिणा जैसे शब्द को रिश्वत से जोड़ दिया गया है. आज के दौर में जब भ्रष्ट लोग रिश्वत मांगते हैं तो इशारों में ये कहते हैं कि दक्षिणा कितनी दोगे. अब छात्र शिक्षकों को अंगूठा काटकर देने के बजाय अंगूठा दिखा देते हैं. और सिर्फ छात्र ही नहीं कई बार सिस्टम भी शिक्षकों को अंगूठा दिखाता है. 

अब सवाल ये है कि भारत में कोई व्यक्ति शिक्षक क्यों नहीं बनना चाहता है? इसका जवाब ये है कि हमारे देश में शिक्षकों को अच्छा वेतन नहीं मिलता. सरकारी प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों को 20 हज़ार से लेकर 40 हज़ार रुपये प्रति महीने तक का वेतन मिलता है. जबकि देश में Secondary और Higher Secondary स्कूल के शिक्षकों को इनसे थोड़ा ज्यादा पैसा मिलता है. अब ज़रा ये भी जान लीजिए कि विदेशों में शिक्षकों को कितना वेतन मिलता है. 

सिंगापुर में स्कूलों में एक शिक्षक को 45 हज़ार 755 अमेरिकी डॉलर यानी करीब 33 लाख रुपये प्रति वर्ष का वेतन मिलता है. जबकि दक्षिण कोरिया, अमेरिका, जर्मनी और जापान में स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों को औसतन 40 हज़ार अमेरिकी डॉलर्स यानी करीब 29 लाख रुपये प्रतिवर्ष का वेतन मिलता है. United Kingdom में स्कूल के शिक्षकों को 33 हज़ार, 377 अमेरिकी डॉलर्स यानी करीब 24 लाख रुपये प्रतिवर्ष का वेतन मिलता है. 

यानी हमारे देश के शिक्षकों पर उम्मीदों का ज़बरदस्त बोझ है, और उन्हें दुनिया के पैमानों पर अच्छा वेतन भी नहीं मिलता. इस बात ने गुरु-शिष्य परंपरा को बहुत नुकसान पहुंचाया है.

हमारे देश की विडंबना ये भी है कि शिक्षकों से उनके अपने काम के साथ-साथ और भी बहुत तरह के काम करवाए जाते हैं. चुनाव कोई भी हो ड्यूटी हमेशा शिक्षकों की ही लगती है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. लोकतंत्र में चुनावों को बहुत महत्व दिया जाता है. और देश के हर राज्य में चुनावों को निपटाने का काम शिक्षक ही करते हैं. हर 10 वर्षों में सरकार जनगणना भी करवाती है. देश के हर व्यक्ति के बारे में तरह-तरह के आंकड़े लिए जाते हैं. गांव-गांव जाकर इस काम को करने की ज़िम्मेदारी भी हमारे देश के शिक्षकों को ही दी जाती है. इसके अलावा सरकार की बहुत सी सरकारी योजनाओं को ज़मीनी स्तर पर लागू करवाने का काम भी शिक्षकों को ही दिया जाता है. 

पोलियो उन्मूलन अभियान के तहत भारत के हर घर में जाकर छोटे बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने की ज़िम्मेदारी भी शिक्षकों को जाती है. ये एक तरह का ओवरटाइम है. और इस ओवरटाइम से पूरी शिक्षा व्यवस्था का बहुत नुकसान होता है.

आपके मन में ये सवाल भी ज़रूर होगा कि क्या दुनिया में कहीं कोई ऐसा देश है, जहां शिक्षा का एक आदर्श सिस्टम हो. और उसके शिक्षकों को पूरा सम्मान भी मिलता हो. हमने आज इस विषय पर बहुत रिसर्च किया है. और अपने रिसर्च में हमें पता चला कि फिनलैंड एक ऐसा देश है, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ी शिक्षा ली जा सकती है.

फिनलैंड में बच्चे पढ़ाई से पहले ये सीखते हैं कि बचपन क्या होता है और बच्चा कैसे बना जाता है? यानी वहां बच्चों पर पढ़ाई का बोझ नहीं डाला जाता. स्कूल में उन्हें एक दूसरे के साथ खेलना-सिखाया जाता है. उन्हें ये भी सिखाया जाता है कि कैसे खुद को भावनात्मक रूप से मज़बूत बनाना है. 

हमारे देश में स्कूलों में बहुत Competition होता है. हर एक स्कूल अपने आपको दूसरे से बेहतर बताता है. लेकिन फिनलैंड में ऐसा नहीं है. वहां स्कूल Competition में नहीं बल्कि Co-operation और Co-existence में यकीन रखते हैं. और इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि फिनलैंड में कोई भी Private School नहीं है. देश में चलने वाला हर एक शिक्षण संस्थान.. सरकार के पैसों से चलता है. भारत की तरह फिनलैंड के शिक्षक Underpaid नहीं हैं. वहां शिक्षक का पेशा एक सम्मानित पेशा है. 

फिनलैंड में छात्रों और शिक्षकों पर लगातार Research भी होता है, और अगर सरकार की कोई योजना शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा परिणाम देती है, तो फिर उस पर और ज़्यादा काम किया जाता है. फिनलैंड के शिक्षक, बच्चों के पढ़ाने के लिए अपनी Mini-Laboratories बनाते हैं. ये शिक्षक ही तय करते हैं कि बच्चों के लिए क्या किया जाना चाहिए ? फिनलैंड में ये कानून है कि हर 45 मिनट की क्लास के बाद 15 मिनट का Play Time होता है. यानी बच्चों पर पढ़ाई का बोझ नहीं है. 

भारत में अक्सर बच्चों को Home work के बोझ के नीचे दबा दिया जाता है. लेकिन फिनलैंड में ऐसा नहीं है. वहां बच्चों को बहुत कम Home Work दिया जाता है. बच्चों को ज़्यादातर काम स्कूल में करवा दिए जाते हैं. जबकि उनका घर का समय परिवार के साथ बिताने के लिए सुरक्षित रखा जाता है. ताकि बच्चे जीवन के बारे में भी कुछ सीख पाएं.