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Zee जानकारी: बर्दाश्त की सीमाएं लांघ चुके हैं पत्थरबाज

Zee जानकारी: बर्दाश्त की सीमाएं लांघ चुके हैं पत्थरबाज

विनाशकाले विपरीत बुद्धि. यानी जब विनाश की घड़ी नज़दीक आती है, तो अच्छे-अच्छे अक्लमंदों की बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है। लेकिन आज हमने उन भ्रष्ट लोगों का DNA टेस्ट किया, जिन्होंने बर्दाश्त करने की सारी सीमाएं लांघ दी हैं. ये वो लोग हैं जो पाकिस्तान और अलगाववादियों के इशारे पर सुरक्षाबलों पर पत्थर फेंकते हैं. ज़रा सोचिए कि अगर किसी आतंकवादी के खिलाफ ऑपरेशन के दौरान स्थानीय लोग अचानक सुरक्षा बलों पर ही पत्थर फेंकने लगें. तो उन पर क्या बीतेगी? अब वक्त आ गया है, जब देश को बिना देर लगाए. ऐसे लोगों का Permanent इलाज़ ढूंढना होगा. 

मैं जम्मू-कश्मीर की बात कर रहा हूं, जहां से एक बार फिर देश को गुस्सा दिलाने वाली तस्वीरें आई हैं. हमेशा की तरह इस बार भी पत्थरबाज़ों की फौज ने सेना और सुरक्षाबलों को चुनौती दी है और उनके काम में बाधा डालने की कोशिश की है. ये अपने आप में एक बहुत बड़ी चेतावनी है. दरअसल, जम्मू-कश्मीर के बड़गाम ज़िले के चदूरा इलाके में सुरक्षाबलों को एक आतंकवादी के छिपे होने की सूचना मिली थी. सुरक्षाबलों ने जैसे ही उस इलाके में Search Operation शुरू किया, आतंकवादी ने अंधाधुंध फायरिंग शुरु कर दी. लेकिन जैसे ही आतंकवादी को मार गिराने के लिए Security Forces ने जवाबी कार्रवाई शुरू की, सैकड़ों की संख्या में पत्थरबाज़ों की फौज वहां पर इकट्ठा हो गई. इन सभी लोगों का मकसद था एक Building में छिपे आतंकवादी का कवच बनना. ताकि पत्थरबाज़ों की मदद से वो आतंकवादी वहां से बच निकलने में क़ामयाब हो जाए. इसके लिए पत्थरबाज़ों ने सुरक्षाबलों पर बड़े-बड़े पत्थरों से हमला कर दिया.

ज़रा सोचिए. ऐसे हालात में भी सुरक्षाबलों को मानव अधिकारों का ख्याल रखना पड़ता है. सुरक्षाबलों ने हर संभव कोशिश की, कि वो निर्दोष लोगों पर जानलेवा हमला ना करें. लेकिन, आतंकवादी को किसी भी क़ीमत पर भागने का मौका नहीं दिया जा सकता था. इसलिए सुरक्षाबलों को मजबूरी में कार्रवाई करनी पड़ी. आतंकवादी और सुरक्षाबलों के बीच हो रही फायरिंग में तीन पत्थरबाज़ मारे गये हैं. ये तीनों, पत्थरबाज़ों की उसी भीड़ का हिस्सा थे, जो आतंकवादी की मदद कर रही थी. हो सकता है, कि इन तीनों की मौत के बाद कई लोग ये सवाल खड़े कर दें, कि सुरक्षाबलों ने इनपर गोलियां क्यों चलाई? तो ऐसे लोगों के लिए हम यहां स्पष्ट कर देना चाहते हैं, कि गोलियां दोनों तरफ से चल रही थीं, और तीनों पत्थरबाज़ों को किसकी गोली लगी, ये कहना मुश्किल है. हालांकि, आपको ये भी पता होना चाहिए कि पत्थरबाज़ों के पीठ पीछे छिपकर आतंकवादी सिर्फ सुरक्षाबलों पर हमला नहीं करते, वो उस भीड़ को भी निशाना बनाते हैं, जो उनका ही बचाव कर रही होती है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि भीड़ और भी ज़्यादा उग्र हो जाए.

वैसे अच्छी बात ये है, कि उस Building में छिपे आतंकवादी को मार गिराया गया और सुरक्षाबलों को भी ज़्यादा नुकसान नहीं हुआ. लेकिन, ये ख़बर इसलिए चिंताजनक है, क्योंकि पत्थरबाज़ों की फौज ने पिछले तीन हफ्तों में दूसरी बार सुरक्षाबलों की कार्रवाई में इस तरह की अड़चन पैदा की है. ऐसी घटनाएं वहां बार बार हो रही हैं. और इन्हें रोकना आवश्यक है. इस विश्लेषण को आगे बढ़ाने से पहले मैं आपको CRPF के DIG संजय कुमार की कही बातें सुनाना चाहता हूं. उनकी बातें सुनकर आपको तकलीफ भी होगी और आपका मन भी आक्रोशित हो जाएगा. क्योंकि आज जब सुरक्षाबल बड़गाम में ऑपरेशन कर रहे थे, उस वक्त उन्हें ना सिर्फ पत्थरबाज़ी का सामना करना पड़ा बल्कि उन्हें अपशब्द भी कहे गये.

कश्मीर में काम कर रहीं Agencies से हमें कुछ आंकड़े मिले हैं. और ये आंकड़े बहुत चिंताजनक हैं. वर्ष 2016 में 88 कश्मीरी युवाओं ने आतंकवाद का रास्ता चुना है. और ये संख्या पिछले 6 वर्षों में सबसे ज़्यादा है. वर्ष 2015 के मुक़ाबले 2016 में घुसपैठ की वारदात तीन गुना बढ़ी हैं. वर्ष 2012 में भारत की सीमा में पाकिस्तान की तरफ से 121 आतंकवादियों ने घुसपैठ की थी, जबकि वर्ष 2016 में ये आंकड़ा 119 आतंकवादियों का था. नोट करने वाली बात ये है, कि बुरहान वानी की मौत के बाद पिछले वर्ष जुलाई के महीने में. कश्मीर घाटी में 820 हिंसक वारदातें हुई थीं.

जबकि जनवरी 2017 में हिंसक वारदातों में काफी कमी आई. और सिर्फ 5 ऐसी घटनाएं देखने को मिलीं. ये वो दौर था जब Demonetization की वजह से आतंकवादियों की तिजोरियां खाली हो गई थीं. फरवरी 2017 में ये संख्या 49 तक पहुंची, जबकि इस महीने अभी तक कश्मीर घाटी में 27 हिंसक वारदातें हो चुकी हैं. इस हिंसक माहौल के पीछे एक और वजह है, जिसकी तरफ मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं. जम्मू-कश्मीर की दो लोकसभा सीटों- श्रीनगर और अनंतनाग में 9 और 12 अप्रैल को उप चुनाव होने हैं. जम्मू-कश्मीर की मौजूदा मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने वर्ष 2014 में अनंतनाग सीट से लोकसभा चुनाव जीता था. हालांकि, राज्य की मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने ये सीट छोड़ दी थी. ठीक इसी तरह श्रीनगर लोकसभा सीट से PDP के तारिक अहमद कर्रा ने चुनाव जीता था. हालांकि, उन्होंने सितम्बर 2016 में पार्टी की नीतियों से नाराज़ होकर इस्तीफा दे दिया था. और अब वो कांग्रेस में शामिल हो गए हैं.

कश्मीर घाटी में पिछले साल अशांति के माहौल की वजह से लोकसभा के इन उप-चुनावों की अहमियत और बढ़ गई है. अलगाववादियों और आतंकवादियों को जम्मू कश्मीर में वोटिंग और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं अच्छी नहीं लगतीं. इसीलिए जब भी वोटिंग होने वाली होती है. तो वहां पर आतंकवादी घटनाएं बढ़ जाती हैं. पाकिस्तान को भी यही सूट करता है कि जम्मू-कश्मीर में चुनावी प्रक्रिया हमेशा बाधित रहे. ऐसे में पाकिस्तान और अलगाववादियों का गठबंधन हो जाता है और कश्मीर में तनाव बढ़ जाता है. पिछले 2 दिनों में कश्मीर घाटी में 4 से ज़्यादा आतंकवादी घटनाएं हुई हैं और आगे आने वाले दिनों में ये घटनाएं और बढ़ सकती हैं. क्योंकि उपचुनाव होने वाले हैं.

अलगाववादी अक्सर घाटी में ऐसी किसी भी घटना के बाद बंद का ऐलान कर देते हैं. और इस बार भी वैसा ही हुआ है, क्योंकि अलगाववादियों की तरफ से कल कश्मीर बंद की घोषणा की गई है. इन लोगों का मकसद और इरादा बिल्कुल साफ है, और वो है लोगों को गुमराह करना. लेकिन उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए, कि घाटी में तनाव और अशांति के बावजूद जनता ने मतदान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया है. जम्मू-कश्मीर में ज़्यादातर लोग भारतीय लोकतंत्र में यकीन रखते हैं. लेकिन वहां कुछ लोग ऐसे हैं जो अशांति फैलाना चाहते हैं. और इन्हीं लोगों को हमें रोकना है. सुरक्षा बलों पर पत्थरबाज़ी अपने आप नहीं होती. इसके पीछे अलगाववादियों की पूरी प्लानिंग होती है. और लोगों का Brain wash किया जाता है. कई बार उन्हें धमकाया भी जाता है. यानी एक तरफ जेहादियों का Recruitment हो रहा है और उन्हें आतंक फैलाने की नौकरी पर रखा जा रहा है. और दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर के कुछ लोगों का Brain wash करके उनसे सुरक्षाबलों पर पत्थर फिकवाए जा रहे हैं. ये तस्वीरें बहुत कुछ कहती हैं. इसलिए इन्हें हल्के में लेने की भूल मत कीजिएगा.

यहां मैं ऐसे लोगों को एक ज़रुरी Reminder भी देना चाहता हूं, जो जम्मू-कश्मीर में सेना के किसी Operation के दौरान, सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकते हैं. और सेना के काम में बाधा डालते हैं. ऐसे सभी पत्थरबाज़ों को आज एक बार फिर से सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत की चेतावनी याद दिलानी ज़रूरी है. क्योंकि, जनरल बिपिन रावत ने 15 फरवरी को ही ये कह दिया था, कि जो लोग सेना की कार्रवाई में बाधा पहुंचाने की कोशिश करेंगे, उन्हें आतंकवादियों के लिए काम करने वाला ही माना जाएगा. और उनके साथ वैसा ही सलूक किया जाएगा, जैसा आतंकवादियों के साथ किया जाता है.