ZEE जानकारीः ऐसे पुल के निर्माण की कहानी जिसमें इंसान की जिद ने प्रकृति को हरा दिया

असम के डिब्रूगढ़ इलाके में जहां इस पुल का निर्माण किया गया है वहां नदी की चौड़ाई 10 किलोमीटर थी 

ZEE जानकारीः ऐसे पुल के निर्माण की कहानी जिसमें इंसान की जिद ने प्रकृति को हरा दिया

अक्सर ये बात कही जाती है कि प्रकृति से कोई नहीं लड़ सकता. लेकिन अगर प्रकृति, देश के विकास के रास्ते में आ जाए तो फिर इंसान को ये युद्ध लड़ना पड़ता है. आज हम आपको एक ऐसे पुल के निर्माण की कहानी दिखाएंगे जिसमें इंसान की ज़िद ने प्रकृति को हरा दिया. इस पुल को असम के डिब्रूगढ़ में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाया गया है. इस पुल के निर्माण को हम एक युद्ध क्यों कह रहे हैं.. ये समझने के लिए आपको... ब्रह्मपुत्र नदी की ताक़त को जानना होगा.

ब्रह्मपुत्र नदी एशिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है, और ये चीन, भारत और बांग्लादेश से होकर गुज़रती है . भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में ब्रह्मपुत्र नदी की वजह से हर साल बाढ़ आती है जिससे लाखों लोगों की ज़िंदगी बर्बाद हो जाती है . पौराणिक कथाओं में भी ब्रह्मपुत्र नदी की विशालता और इसके बहने की आक्रामक क्षमता का वर्णन किया गया है . आमतौर पर नदी को मां का दर्जा दिया जाता है इसलिए नदी को स्त्रीलिंग की श्रेणी में रखा जाता है . लेकिन ब्रह्मपुत्र ऐसी नदी है जिसे नदी के बजाए कई बार नद कहा जाता है. यानी नदी का पुरुष रूप. ब्रह्मपुत्र नदी अपनी विशाल चौड़ाई की वजह से भी पूरी दुनिया में जानी जाती है . कई इलाकों में इसकी चौड़ाई 10 से 18 किलोमीटर तक है . 

असम के डिब्रूगढ़ इलाके में जहां इस पुल का निर्माण किया गया है वहां नदी की चौड़ाई 10 किलोमीटर थी . इस पुल का नाम है बोगीबील ब्रिज. इस पुल पर सड़क और रेल यातायात दोनों की सुविधा है. पुल के ऊपरी हिस्से पर सड़क बनाई गई है जबकि निचले हिस्से में रेलवे लाइन हैं . इस पुल की वजह से अब दिल्ली से डिब्रूगढ़ की रेल यात्रा में कम से कम 3 घंटे बचेंगे. इसके अलावा असम के ऊपरी इलाकों में रहने वाले लोगों को अरुणाचल प्रदेश जाने के लिए अब गुवाहाटी नहीं जाना पड़ेगा. इस पुल की वजह से असम से अरुणाचल प्रदेश की दूरी 500 किलोमीटर से घटकर करीब 200 किलोमीटर रह गई है . 

अरुणाचल प्रदेश एक ऐसा इलाका है, जहां भारत और चीन की सीमाएं मिलती हैं. लेकिन हमारे सैनिकों को इन सीमाओं तक पहुंचने में बहुत समय लगता है. इस पुल के निर्माण के बाद ये दूरी कम हो गई है .जानकार मानते हैं कि ये पुल चीन से रणनीतिक मुकाबला करने के लिए भी महत्वपूर्ण है.इस पुल को बनाने के लिए 3 हजार 230 करोड़ रुपये का बजट तैयार किया गया था लेकिन निर्माण में देरी की वजह से इसकी लागत 4 हज़ार 857 करोड़ रूपये पहुंच गई . यानी देरी की वजह से पुल की लागत एक हज़ार 627 करोड़ रूपये बढ़ गई .

इस पुल को बनाने के लिए पहली बार वर्ष 1997 में मंजूरी मिली थी लेकिन इसका निर्माण 5 साल बाद वर्ष 2002 में शुरू हुआ . हमारे सरकारी सिस्टम की धीमी रफ़्तार के कारण इस पुल को बनाने में 16 साल लग गये . अब ये पुल, निर्माण के अंतिम पड़ाव पर है.आज हमने सड़क और रेल यातायात वाले देश के इस सबसे बड़े पुल का एक वीडियो विश्लेषण तैयार किया है. इस रिपोर्ट को देखकर आपको ये अहसास होगा कि इंसान अगर चाहे तो अपनी ज़िद और हौसले से प्रकृति की ताक़त को भी हरा सकता है .

ब्रह्मपुत्र नदी का उदगम, हिमालय में कैलाश पर्वत के पास एक इलाक़े से होता है. और फिर असम आते आते ये नदी कुछ इलाक़ों में दस किलोमीटर चौड़ी हो जाती है. और इसी वजह से इस पर पुल बनाना मुश्किल हो जाता है. लेकिन हमारे देश के इंजीनियर्स ने इस चुनौती को स्वीकार किया और इस पर विजय प्राप्त की. इस काम के लिए हमारे इंजीनियर्स बधाई के पात्र हैं. हमारे देश में पूर्वोत्तर राज्यों की ख़बरों को महत्व नहीं दिया जाता, लेकिन हम इस परंपरा को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं