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Zee जानकारी : भारत में वित्तीय वर्ष बदलने के हैं कई फायदे

भारत में फिलहाल वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च के बीच होता है, इसकी शुरुआत वर्ष 1867 में हुई थी। 1867 से पहले भारत का वित्तीय वर्ष 1 मई से 30 अप्रैल के बीच का होता था। केंद्र सरकार वित्तीय वर्ष की तरीख बदलकर अब इसे हर वर्ष 1 जनवरी से 31 दिसंबर तक करना चाहती है।

Zee जानकारी : भारत में वित्तीय वर्ष बदलने के हैं कई फायदे

नई दिल्ली : भारत में फिलहाल वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च के बीच होता है, इसकी शुरुआत वर्ष 1867 में हुई थी। 1867 से पहले भारत का वित्तीय वर्ष 1 मई से 30 अप्रैल के बीच का होता था। केंद्र सरकार वित्तीय वर्ष की तरीख बदलकर अब इसे हर वर्ष 1 जनवरी से 31 दिसंबर तक करना चाहती है।

ऐसा नहीं है कि वित्तीय वर्ष की तारीख को बदलने का फैसला सिर्फ अंग्रेजों के ज़माने से चली आ रही परंपरा को तोड़ने के लिए किया जा रहा है। इसके कई फायदे भी हैं। नया वित्तीय वर्ष किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है। क्योंकि मौजूदा वित्तीय वर्ष की टाइमिंग, मॉनसून की टाइमिंग से मैच नहीं करती है जिसकी वजह से किसान मॉनसून का फायदा नहीं उठा पाते हैं।

कुछ एक्सपर्ट ऐसा भी मानते हैं कि वित्तीय वर्ष की नई तारीख मौसम की वजह से होने वाले बदलावों की गणना भी कर लेगी। विशेषज्ञों की राय है कि अक्टूबर में दक्षिण पश्चिम मानसून के खत्म होने के बाद बजट को अंतिम रूप दिया जाए। क्योंकि ये वो वक्त होता है जब खरीफ की फसल तैयार होती है और रबी की फसल का अनुमान लगाया जा सकता है। इस हिसाब से नवंबर में देश का बजट पेश किया जा सकता है। 

मॉनसून के खराब रहने से भारत में अक्सर कुछ इलाक़ों में जून और सितंबर के बीच में सूखा पड़ता है, अगर वित्तीय वर्ष की तारीख बदलती है तो नवंबर में पेश होने वाले बजट में, कृषि से जुड़ी ऐसी समस्याओं का ध्यान रखा जा सकता है। यहां आपको याद दिला दें कि भारत के GDP में कृषि का योगदान 15 प्रतिशत से ज्यादा है, और 58 प्रतिशत से ज्यादा ग्रामीण परिवार खेती की पैदावार पर ही निर्भर है।

भारत के वित्तीय वर्ष में अगर बदलाव हुआ तो ये कोई अनोखी घटना नहीं होगी, क्योंकि दुनिया के 156 देशों का वित्तीय वर्ष कैलेंडर ईयर यानी 1 जनवरी से 31 दिसंबर के बीच होता है। वर्ल्ड बैंक और इंटरनेशनल मोनेट्री फंड जैसी दुनिया बड़ी एजेंसियां भी डाटा इकट्ठा करने के लिए कैलेंडर ईयर को ही फॉलो करती है।

वर्ष 1865 में ब्रिटिश सरकार में एक कमीशन गठित किया गया था जिसमें भारत के वित्तीय वर्ष की शुरुआत 1 जनवरी से करने की सलाह दी गई थी। भारत में ब्रिटिश राज होने की वजह से वर्ष 1867 में भारत के वित्तीय वर्ष की तारीख भी ब्रिटिश वित्तीय वर्ष के हिसाब से 1 अप्रैल से 31 मार्च कर दी गई। ये तारीखें अंग्रेज़ों को सूट करती थीं।

वर्ष 1921 में कांग्रेसी नेता सर दिनशॉ वाचा ने ब्रिटिश सरकार से भारत के वित्तीय वर्ष की तारीख को 1 जनवरी से करने की सिफारिश की थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आज़ादी के बाद 1954 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सामने भी वित्तीय वर्ष की तारीख को 1 जनवरी करने का प्रस्ताव आया था। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी।

वित्तीय वर्ष की तारीख में बदलाव के लिए वर्ष 1984 में राजीव गांधी की सरकार ने एलके झा की नेतृत्व में एक कमेटी गठित की थी। इस कमेटी का गठन करने का फैसला भारत में वर्ष 1979-80 और 1982-83 में पड़े भीषण सूखे के बाद लिया गया था। लेकिन वर्ष 1985 में आई एलके झा कमेटी की रिपोर्ट पर राजीव गांधी की सरकार कोई फैसला नहीं ले पाई।

पाकिस्तान, इजिप्ट और न्यूजीलैंड जैसे देशों के वित्तीय वर्ष का कैलेंडर 1 जुलाई से शुरू होकर 30 जून तक का होता है। भारत के अलावा, यूके, कनाडा, सिंगापुर जैसे देशों का वित्तीय वर्ष भी 1 अप्रैल से 31 मार्च तक का होता है।

सरकार को टैक्स असेसमेंट ईयर में बदलाव के साथ ही टैक्स कलेक्शन के इंफ्रास्ट्रक्चर का पुनर्गठन करना होगा। वित्तीय वर्ष में बदलाव के साथ संसद सत्र के समय में भी बदलाव हो सकता है। हालांकि इससे लोगों के टैक्स पेमेंट शेड्यूल पर फिलहाल फर्क नहीं पड़ेगा।