close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

ZEE Jankari: श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के वक्त 66 साल पहले क्या हुआ था?

अब भारतीय जनता पार्टी ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है, कि 66 वर्ष पहले देश चाहता था, कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत की जांच हो, लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उस समय, इसकी जांच कराने की बात नहीं मानी थी.

ZEE Jankari: श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के वक्त 66 साल पहले क्या हुआ था?

आज हम सबसे पहले भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमयी मौत का विश्लेषण करेंगे. ये मौत कोई साधारण मौत नहीं थी. बल्कि ये ऐसी मौत थी...जिसका रहस्य.. आज भी अनसुलझा है. 23 जून 1953, भारत के इतिहास की एक ऐसी तारीख है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने के खिलाफ थे, जिसकी वजह से उन्होंने वर्ष 1953 में कश्मीर का दौरा किया था और इसी दौरान रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई. रविवार को उनकी 66वीं पुण्यतिथि मनाई गई. भारतीय जनता पार्टी इस दिन को "बलिदान दिवस" के रूप में मनाती है. और अब भारतीय जनता पार्टी ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है, कि 66 वर्ष पहले देश चाहता था, कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत की जांच हो, लेकिन पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उस समय, इसकी जांच कराने की बात नहीं मानी थी.

ये एक गंभीर आरोप है. इसलिए आज तथ्यों के आधार पर ये समझना ज़रुरी है, कि 66 साल पहले क्या हुआ था? आज की युवा पीढ़ी को शायद ही डॉक्टर मुखर्जी के व्यक्तित्व के बारे में ज़्यादा जानकारी हो? श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में आपको क्यों जानना चाहिए? ऐसी क्या खास बात थी उनमें? पहले इसकी बात करते हैं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही ये नारा दिया था कि एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे. वो कश्मीर को Special Status देने के खिलाफ थे. वह भारत में कश्मीर के संपूर्ण विलय के लिए संघर्ष करने वाले नेता थे.

और सबसे बड़ी बात ये, कि वो अपने आदर्शों पर मंत्रिपद से इस्तीफा देने वाले स्वतंत्र भारत के पहले नेता थे. ये पूरी ख़बर वर्ष 1953 में दिल्ली....कलकत्ता और जम्मू-कश्मीर के इर्द-गिर्द घूमती है. उस वक्त पंडित जवाहर लाल नेहरु देश के प्रधानमंत्री थे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पश्चिम बंगाल के बड़े नेता थे. वो पंडित नेहरू की कैबिनेट में उद्योग मंत्री भी रह चुके थे. पंडित नेहरू से मतभेद के बाद उन्होंने मंत्रिपद से इस्तीफ़ा दे दिया था और जनसंघ की स्थापना की थी. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जम्मू-कश्मीर को Special Status देने के ख़िलाफ़ थे. वो जम्मू-कश्मीर राज्य का भारत में संपूर्ण विलय चाहते थे और इसीलिए मुखर्जी, नियम तोड़ कर जम्मू-कश्मीर में दाखिल हुए थे. शेख अब्दुल्ला की सरकार ने डॉक्टर मुखर्जी को गिरफ़्तार कर के जेल में डाल दिया था. लेकिन उसके बाद जो कुछ भी हुआ, वो आज तक एक रहस्य बना हुआ है. यानी जम्मू-कश्मीर का जो कांटा आज देश को चुभ रहा है, उसे निकालने की सबसे पहली कोशिश श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने ही की थी.

आज श्यामा प्रसाद मुखर्जी की यादों के साथ एक सवाल लोगों के मन में खटक रहा है. और वो सवाल ये है, कि क्या उनकी मृत्यु के पीछे कोई साज़िश थी? 1966 में देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की सोवियत संघ के ताशकंद में रहस्यमय तरीके से मृत्यु हो गई थी. और उस वक्त भी सवाल उठे थे, कि क्या शास्त्री जी की मौत, ज़हर की वजह से हुई? ठीक इसी तरह श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के 66 साल बाद भी कई सवाल जीवित हैं.

ये एक बड़ी विडंबना है, कि हमारे देश की राजनीति के एक महापुरुष की रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गई. लेकिन 66 वर्ष पहले, जब उनकी मौत की जांच की बात कही गई, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई. पंडित नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमयी मौत की जांच क्यों नहीं कराई? इसे समझने से पहले ये जानना ज़रुरी है, कि उनकी मौत किन परिस्थितियों में हुई थी?

श्यामा प्रसाद मुखर्जी, भारत में कश्मीर का संपूर्ण विलय चाहते थे. उनका नारा था, कि एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी देश की एकता और अखंडता पर ज़ोर देते थे. और वो कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते थे.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी वर्ष 1934 से 1938 तक कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे थे. भारत की आज़ादी के बाद वो पंडित जवाहर लाल नेहरू की सरकार में मंत्री बने और उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अपना पूरा योगदान दिया. वो पंडित नेहरु की कैबिनेट में Industry And Supply Minister थे. ये ऐतिहासिक तथ्य हैं. लेकिन वर्ष 1950 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था. क्योंकि वो पंडित नेहरू की कुछ नीतियों से सहमत नहीं थे. कहा जाता है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी आज़ाद भारत के पहले नेता थे, जिन्होंने अपने आदर्शों और उसूलों के लिए सरकार से इस्तीफा दे दिया था. अगर वो चाहते तो वर्षों तक देश के बड़े बड़े पदों पर विराजमान होकर सुख और ऐश्वर्य का जीवन जी सकते थे. जैसा कि आज कल के नेता करते हैं. लेकिन मुखर्जी ने देश की एकता और अखंडता के लिए संघर्ष करने का संकल्प लिया. नेहरू सरकार से इस्तीफ़ा देकर डॉक्टर मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी.

डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर का भारत में संपूर्ण विलय कराने के लिए संघर्ष किया. वर्ष 1953 में उन्होंने भारत में पूर्ण विलय के लिए प्रजा परिषद् के आंदोलन का समर्थन किया. 11 मई 1953 को कश्मीर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बिना परमिट के प्रवेश किया। जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उस ज़माने में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने के लिए देश के बाकी हिस्सों के लोगों को इजाज़त लेनी पड़ती थी. इसी को परमिट सिस्टम कहते थे. इसके विरोध में गए डॉक्टर मुखर्जी को जम्मू-कश्मीर सरकार ने गिरफ़्तार कर लिया था. 23 जून 1953 को हिरासत में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी.

यानी श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु, उस वक्त हुई जब वो भारत में कश्मीर के संपूर्ण विलय के लिए संघर्ष कर रहे थे और जेल में बंद थे. कई बार तो ऐसे दावे भी किए जाते हैं, कि कश्मीर को भारत से अलग करने की वकालत करने वाले लोग ही उनकी मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार हैं. हालांकि उनके विरोध और बहादुरी की वजह से ही जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिए लगाए गए परमिट सिस्टम को हटाया गया.

रिसर्च के दौरान हमें एक किताब मिली जिसका नाम है, The Life And Times Of Shyama Prasad Mookerjee. ये किताब पश्चिम बंगाल के नेता तथागत रॉय ने लिखी थी. इस किताब के मुताबिक, 30 जून 1953 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मां को चिट्ठी के ज़रिए अपना शोक संदेश भेजा, जिसके जवाब में डॉ मुखर्जी की मां, जोगमाया देवी ने 4 जुलाई 1953 को पंडित नेहरू को पत्र लिखा. इसमें उन्होंने अपने बेटे की रहस्यमय मौत की जांच की मांग की. जोगमाया देवी ने पंडित नेहरू को लिखा कि उन्हें कोई सांत्वना नहीं बल्कि इंसाफ चाहिए. पंडित नेहरू को लिखी चिट्ठी में उन्होंने आरोप लगाया था, कि उनके बेटे की मौत बिना किसी ट्रायल के क़ैद में रहने के दौरान हुई. उन्होंने अपनी चिट्ठी में पंडित नेहरू की चिट्ठी का भी ज़िक्र किया और कहा, कि पंडित नेहरू ने ये साबित करने की कोशिश की, कि कश्मीर की तत्कालीन सरकार से जो हो सकता था, वो किया गया जबकि, पंडित नेहरू के पास सारी जानकारियां कश्मीर से आ रही थीं. जिनकी कोई क़ीमत नहीं थी. डॉक्टर मुखर्जी की मां ने पंडित नेहरू को Quote करते हुए ये भी लिखा, कि आप कहते हैं, कि मेरे बेटे के क़ैद में रहने के दौरान आप कश्मीर गए थे और उसके प्रति आपका लगाव भी था. तो फिर ऐसा क्या हुआ, कि आप समय निकालकर उससे मिलने नहीं गए. क्या चीज़ आपको रोक रही थी. आप उसकी सेहत और उसे दी जा रही सुविधाओं के बारे में जानकारी ले सकते थे. लेकिन आपने ऐसा नहीं किया. डॉक्टर मुखर्जी की मां ने पंडित नेहरू पर ये आरोप उनको भेजी चिट्ठी में लगाए थे. और ये भी कहा था, कि उनके बेटे की मौत रहस्यमय तरीके से हुई और कश्मीर की तत्कालीन सरकार ने मां होने के बावजूद उनके बेटे की मौत की ख़बर, निधन होने के दो घंटे बाद दी.

इसके बाद 5 जुलाई 1953 को पंडित नेहरू का जवाब आया. जिसमें लिखा, कि वो अपने बेटे की मौत से दुखी एक मां की पीड़ा समझ सकते हैं. पंडित नेहरू ने आगे लिखा, कि वो डॉक्टर मुखर्जी की कैद और उनकी मौत से जुड़ी जानकारियां इकट्ठा करके और ध्यान से उसका अध्ययन करने के बाद ही जवाब देना उचित समझते थे और इसके लिए उन्होंने कश्मीर में कई लोगों से बात करके तथ्य हासिल किए. और उसके आधार पर पंडित नेहरू ने डॉक्टर मुखर्जी की मां को जवाब दिया, कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत में कुछ भी रहस्यमयी नहीं है.

पंडित नेहरू ने लोगों से की गई बात के आधार पर ये तय कर दिया कि डॉक्टर मुखर्जी के निधन में कुछ भी रहस्यमयी नहीं है. लेकिन दूसरी तरफ, 66 साल पहले पूरे देश में एक ही मांग थी. और वो ये कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत की जांच की जाए. अब 66 साल पुराने अखबार के इस लेख पर ध्यान दीजिए. जिसका शीर्षक था, West Bengal Demands Inquiry Into Doctor Mookerjee Death...

इस लेख में पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री BC Roy की उस चिट्ठी का ज़िक्र है, जो उन्होंने पंडित नेहरू को लिखी थी. और कहा गया था कि BC Roy ने पंडित नेहरू को डॉक्टर मुखर्जी की क़ैद में मौत और उसके बाद फैले गुस्से से अवगत करा दिया गया है. इस लेख में ये भी कहा गया था कि जब तक डॉक्टर मुखर्जी की मौत की वजहों की जांच निष्पक्ष तरीके से नहीं होगी. तब तक लोगों का गुस्सा शांत नहीं होगा.

हालांकि, उस वक्त पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने पूरा फैसला पंडित नेहरू पर छोड़ दिया था. इस पूरे घटनाक्रम को 66 साल बीत चुके हैं, लेकिन, श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत किन परिस्थितियों में हुई, इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला है.