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Zee Jankari: जब सरदार पटेल ने कहा 'कश्मीर को पाना चाहते हैं, या गंवाना चाहते हैं'?

पंडित नेहरू ने भले ही कश्मीर को लेकर बड़ी गलतियां की और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस पर दखल देने का मौका दिया . लेकिन सरदार पटेल कश्मीर को हमेशा भारत का अभिन्न अंग मानते रहे.

Zee Jankari: जब सरदार पटेल ने कहा 'कश्मीर को पाना चाहते हैं, या गंवाना चाहते हैं'?

पंडित नेहरू ने भले ही कश्मीर को लेकर बड़ी गलतियां की और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को इस पर दखल देने का मौका दिया . लेकिन सरदार पटेल कश्मीर को हमेशा भारत का अभिन्न अंग मानते रहे. इसलिए आज कश्मीर को लेकर उनके सपनों का जिक्र करना भी ज़रूरी है. 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ था. तब भारत से जाते वक्त अंग्रेजों ने कहा था कि '15 वर्षों में भी कोई भारत की 565 रियासतों को जोड़ नहीं सकता' . लेकिन सरदार पटेल ने सिर्फ़ 2 वर्षों के अंदर पूरे भारत को एक सूत्र में बांध दिया. लेकिन ये बिल्कुल भी आसान नहीं था. क्योंकि, आज़ादी से पहले भारत के एक बड़े हिस्से पर अंग्रेज़ सीधे हुकूमत कर रहे थे.

और दूसरा हिस्सा वो था, जिस पर राजाओं और रजवाड़ों की हुकूमत थी. ये ऐसी रियासतें थीं, जो ब्रिटेन की महारानी की गुलामी स्वीकार कर चुकी थीं. इनमें से कई राजाओं के पास अपनी सेनाएं थीं . कुछ राजाओं के पास लड़ाकू विमान भी थे. इन 565 रियासतों को भारत में जोड़ना इतना भी आसान नहीं था. कश्मीर और हैदराबाद का विलय सरदार पटेल के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी .

लेकिन सरदार पटेल ने अपनी कूटनीति से हैदराबाद के नवाब को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था. हालांकि, कश्मीर के मुद्दे से उनको जानबूझकर दूर रखा गया . देश का गृहमंत्री होने के नाते उन्हें वो ताकत नहीं दी गई जिसके वो हकदार थे. 1947 में कश्मीर एक बहुत बड़ी समस्या था.

आज हम आपको भारत सरकार की उस कैबिनेट मीटिंग के बारे में बताएंगे जिसमें गृहमंत्री सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से ये पूछा था कि 'जवाहर लाल, आप कश्मीर पाना चाहते हैं या गंवाना चाहते हैं ?' Oxford University Press से प्रकाशित एक किताब Kashmir,1947.. Rival Versions of History में Field Marshal Sam Manekshaw का एक पुराना इंटरव्यू भी शामिल किया गया था.

24 अक्टूबर से 27 अक्टूबर 1947 के बीच.... नई दिल्ली में .... जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के हमले के संदर्भ में..... कैबिनेट की कई महत्वपूर्ण बैठकें हुई थीं . इन बैठकों में भारत के पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और भारत के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल मौजूद थे .

इस दौरान हुई कई बैठकों में Sam Manekshaw भी मौजूद थे .ऐसी ही एक मीटिंग का ज़िक्र करते हुए Sam Manekshaw ने बताया था कि अगर कबायली हमलावरों ने श्रीनगर के हवाई अड्डे पर कब्जा कर लिया होता, तो कश्मीर को दोबारा हासिल करना मुश्किल हो जाता, क्योंकि सैनिकों को उतारने के लिए यही रास्ता महत्वपूर्ण है.

Sam Manekshaw, उस बैठक में भारत सरकार को ये समझाने की कोशिश कर रहे थे कि कश्मीर में तुरंत सेना भेजना कितना ज़रूरी है. उस वक़्त फैसला पंडित नेहरू को लेना था. इस किताब के मुताबिक Sam Manekshaw ने जो कहा हम आपको उन्हीं के शब्दों में बताना चाहते हैं .

अपने स्वभाव के मुताबिक पंडित नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र, Russia, अफ्रीका जैसे देशों के बारे में बात की.. उन्होंने कहा कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है, उन्होंने और भी कई मुद्दों के बारे में बात की, लेकिन कश्मीर का ज़िक्र नहीं आया. इससे सरदार पटेल नाराज़ हो गये.

सरदार पटेल ने पंडित नेहरू से कहा 'जवाहर लाल, क्या आप कश्मीर को पाना चाहते हैं, या आप उसे गंवाना चाहते हैं'. पंडित नेहरू ने जवाब दिया 'बेशक, मैं कश्मीर चाहता हूं '. तब सरदार पटेल ने कहा ' तो कृपया आदेश दें' . और इससे पहले कि पंडित नेहरू कुछ भी कह पाते, सरदार पटेल Sam Manekshaw की तरफ मुड़े और कहा, कि 'आपको आदेश मिल गए
हैं' .

इस किताब के अंश पढ़कर ऐसा लगता है कि सरदार पटेल ने अगर पंडित जवाहर लाल नेहरू को अ-निर्णय की स्थिति से बाहर नहीं निकाला होता तो शायद आज कश्मीर हमारे देश का हिस्सा नहीं होता.महापुरुषों का सबसे बड़ा गुण होता है दूरदर्शिता . दूरदर्शिता यानी भविष्य में क्या होने वाला है ये बहुत पहले ही जान लेना. सरदार पटेल भी बहुत दूरदर्शी थे.

आज से 71 वर्ष पहले ही सरदार पटेल ने पाकिस्तान का भविष्य बता दिया था. इशारों ही इशारों में सरदार पटेल ने पाकिस्तान की बर्बादी की जो भविष्यवाणी की थी. वो आज बिलकुल सच साबित हो रही है. आज हमारे पास सरदार वल्लभ भाई पटेल का एक भाषण है. जिसमें उन्होंने पाकिस्तान पर व्यंग्य के तीर चलाए थे.. और उसके वजूद पर सवाल उठा दिया था.

अपने दौर में सरदार वल्लभ भाई पटेल, भारत के सबसे लोकप्रिय नेता थे. उन्होंने देश के सामने ऊंचे आदर्श रखे. लेकिन सरदार पटेल के विचारों को कभी सामने नहीं आने दिया गया. अगर राजनीति की भाषा में कहें तो सरदार वल्लभ भाई पटेल को Sideline करने की कोशिश की गई. कांग्रेस 134 वर्ष पुरानी पार्टी है.

कांग्रेस की स्थापना वर्ष 1885 में हुई थी. 134 सालों में करीब 42 वर्षों तक कांग्रेस पर नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों का ही राज रहा है. वर्ष 1946 में सरदार पटेल से कांग्रेस अध्यक्ष का पद छीन कर पंडित नेहरू को दे दिया गया था .एक किताब Jammu and Kashmir War, Political and Military Perspective के पेज नंबर 46 पर सरदार पटेल से जुड़ी इस पूरी घटना का ब्यौरा दिया गया है . वर्ष 1946 में 15 में से 12 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने सरदार पटेल को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा था . तीन प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों ने JB कृपलानी के नाम का प्रस्ताव रखा था.

किसी भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने जवाहर लाल नेहरू के नाम का प्रस्ताव नहीं रखा था . लेकिन महात्मा गांधी ने कृपलानी से अपना नाम वापस लेने और जवाहर लाल नेहरू का नाम प्रस्तावित करने के लिए कहा. इसके बाद पंडित नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए और बाद में वही देश के प्रधानमंत्री भी बने. वर्ष 1950 में सरदार पटेल की मृत्यु हुई .

लेकिन उन्हें 41 वर्ष के बाद 1991 में भारत रत्न दिया गया . ये बहुत दुर्भाग्य की बात है कि सरदार पटेल के योगदान को स्वीकार करने में इस देश की सरकारों को 41 वर्ष लग गए. आज आपको इस बारे में जरूर सोचना चाहिए. आखिर इस देश की एकता और अखंडता के लिए अपनी जीवन झोंक देने वाले महापुरुषों के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया गया?

आपको जानकर हैरानी होगी कि सरदार पटेल को 1991 में भारत रत्न दिया गया था.. जबकि जवाहर लाल नेहरू को 1955 में और उनकी पुत्री इंदिरा गांधी को 1971 में.. भारत रत्न दिया गया. इंदिरा गांधी के पुत्र राजीव गांधी को 1991 में सरदार पटेल के साथ भारत रत्न दिय़ा गया यानी सरदार पटेल को जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के मुकाबले कई वर्षों के बाद भारत रत्न दिया गया.

हमारे देश की जनता ने हमेशा सरदार पटेल को अपने दिल में बसाया. लेकिन एक खास विचारधारा के लोगों को सरदार पटेल के विचार अच्छे नहीं लगते थे. शायद यही वजह है कि उनके योगदान को छुपाने की कोशिश की गई. और ये कोशिश आज भी जारी है.