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ZEE Jankari: ज़ायरा वसीम ने हिंदी फि‍ल्‍म इंडस्‍ट्री को क्‍याें कहा बाय बाय?

पिछले कुछ दिनों में दो ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनका राष्ट्रहित में विश्लेषण ज़रूरी है. क्योंकि ये दोनों ही घटनाएं New India यानी नए भारत की सोच से मेल नहीं खातीं. वैसे तो ज़ायरा वसीम ने ये सब पब्लिसिटी के लिए किया और हो सकता है कि हम भी ये ख़बर दिखा कर हो सकता है कि उन्हें पब्लिसिटी पाने में मदद कर रहे हों. लेकिन, इस ख़बर का विश्लेषण करना इसलिए ज़रूरी था कि New India में अपना एजेंडा Set करने वाले इन लोगों को Expose किया जाए.

ZEE Jankari: ज़ायरा वसीम ने हिंदी फि‍ल्‍म इंडस्‍ट्री को क्‍याें कहा बाय बाय?
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पिछले कुछ दिनों में दो ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनका राष्ट्रहित में विश्लेषण ज़रूरी है. क्योंकि ये दोनों ही घटनाएं New India यानी नए भारत की सोच से मेल नहीं खातीं. वैसे तो ज़ायरा वसीम ने ये सब पब्लिसिटी के लिए किया और हो सकता है कि हम भी ये ख़बर दिखा कर हो सकता है कि उन्हें पब्लिसिटी पाने में मदद कर रहे हों. लेकिन, इस ख़बर का विश्लेषण करना इसलिए ज़रूरी था कि New India में अपना एजेंडा Set करने वाले इन लोगों को Expose किया जाए.

फिल्म अभिनेत्री ज़ायरा वसीम ने हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री छोड़ दी है. और इसके लिए उन्होंने अपने धर्म को सबसे बड़ी वजह बताया है. ज़ायरा वसीम ने कहा है कि फ़िल्मों में काम करने की वजह से वो अपने इस्लाम धर्म से दूर हो गईं थीं. कई लोग ज़ायरा वसीम के धार्मिक फैसले का समर्थन कर रहे हैं और उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं दे रहे हैं. लेकिन इसी पैमाने पर TMC की सांसद और फिल्म Actress नुसरत जहां के साथ कोई खड़ा नहीं है. नुसरत जहां के गैर मुस्लिम व्यक्ति से शादी करने पर मुस्लिम धर्म गुरू भड़क गए हैं और उन्होंने नुसरत के खिलाफ फतवा जारी कर दिया है. नुसरत ने हाल ही में सांसद पद की शपथ ली थी. इस दौरान उन्होंने मांग में सिंदूर लगा रखा था और गले में मंगलसूत्र पहन रखा था. इसी बात को लेकर देवबंद के मुस्लिम धर्मगुरुओं ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया.

इसलिए आज ये समझना ज़रुरी है, कि ज़ायरा वसीम ने धर्म के नाम का इस्तेमाल करके फिल्मी करियर छोड़ा तो सब तालियां बजाने लगे. लेकिन, जब नुसरत जहां ने धार्मिक आज़ादी का इस्तेमाल करते हुए, सिंदूर और मंगलसूत्र पहना, तो उनके ख़िलाफ़ फ़तवा जारी हो गया. नुसरत के ख़िलाफ़ फ़तवे पर धार्मिक आज़ादी की वक़ालत करने वाले बुद्धिजीवियों की गली में सन्नाटा है. आज इस विरोधाभास को Decode करना ज़रुरी है.

सबसे पहले ज़ायरा वसीम की बात करते हैं. उन्होंने एक Facebook Post के ज़रिए, हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने का ऐलान किया है। हालांकि, इसके पीछे की वजह बहुत ही हास्यास्पद है. उन्होंने कहा है, कि वो अपने धर्म और अल्लाह के लिए ये फ़ैसला ले रही हैं. उनके मुताबिक, फ़िल्मों में काम करने के दौरान वो अपने धर्म से भटक गई थीं और उन्होंने ऐसे माहौल में काम करना जारी रखा, जिसने लगातार उनके ईमान में दख़लअंदाज़ी की. जिसकी वजह से धर्म के साथ उनका रिश्ता ख़तरे में आ गया.

यहां पर दो सवाल हैं. पहला ये, कि अगर ज़ायरा वसीम को फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने का फैसला लेना ही था, तो Social Media पर इतनी लम्बी-चौड़ी Post लिखने की क्या ज़रुरत थी? और दूसरा सवाल ये है कि अपनी Post में क़ुरान की बड़ी-बड़ी आयतों का ज़िक्र करके उन्होंने अपने फैसले को धार्मिक रंग देने की कोशिश क्यों की? ज़ायरा वसीम की बातों से एक बात तो स्पष्ट है. अब हर जगह, हर मुद्दे पर धर्म को इस्तेमाल करने का फैशन बन गया है और ये प्रचलन एक समाज के तौर पर हमें रुढ़िवादी सोच रखने वाले लोगों में शामिल कर रहा है.

और इस एजेंडे को प्रचारित भी किया जा रहा है. अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता, ज़ायरा वसीम के फैसले का स्वागत कर रहे हैं और इसके पीछे ये दलील दी जा रही है, कि ज़ायरा वसीम को अपने निजी फैसले लेने का हक है. जबकि, धर्म के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाने वाले लोग, इसी बहाने फिल्म इंडस्ट्री को कोस रहे हैं और कह रहे हैं, कि इस्लाम में शरीर की नुमाइश करना अल्लाह की नज़र में गुनाह है.

जम्मू-कश्मीर की रहने वाली 18 साल की ज़ायरा वसीम जब हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में आई थीं तो, उस वक्त उन्होंने अपने अभिनय से सबको प्रभावित किया था. ज़ायरा ने फिल्म दंगल में मशहूर खिलाड़ी गीता फोगाट के बचपन का किरदार निभाया था. उस वक्त उन्हें कश्मीर घाटी का Role Model बताया गया था. उनके बारे में ये कहा गया था कि वो बदलते कश्मीर की तस्वीर हैं. 2017 में जम्मू-कश्मीर की तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने ज़ायरा से मुलाकात की थी. महबूबा मुफ्ती ने उस वक्त उनके काम की तारीफ करते हुए कहा था कि ज़ायरा से लोगों को सीख लेने की ज़रूरत है. दो साल पहले ज़ायरा वसीम जब Zee News के स्टूडियो में आईं थीं, तो उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री को एक परिवार बताया था. और कहा था कि वो इस परिवार की लाडली बेटी बन गई हैं. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि ज़ायरा वसीम ने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने के लिए धर्म का सहारा लिया. और उसे एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया. आज इस सोच को समझने की ज़रुरत है. लेकिन उससे पहले सुनिए कि दो साल पहले Zee News के स्टूडियो में ज़ायरा वसीम ने क्या कहा था.

सबसे बड़ी बात ये है कि फिल्मों में ज़ायरा को ब्रेक देने वाले आमिर ख़ान ख़ुद एक मुसलमान हैं और अपनी ज़्यादातर फ़िल्मों में हिंदू का किरदार निभाते हैं. दो साल पहले रूढ़िवादी सोच की ज़ंजीरों को तोड़ने वाली ज़ायरा का काम, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आया था और इन लोगों ने Social Media पर ज़ायरा के लिए आपत्तिजनक भाषा और अपशब्दों का इस्तेमाल किया. इससे ज़ायरा वसीम पर एक तरह का दबाव पड़ा और फिर बिना किसी ग़लती के ही.. उन्हें पहले माफी मांगनी पड़ी. फिर बाद में स्पष्टीकरण देना पड़ा. हालांकि, तब की परिस्थिति और आज की परिस्थिति बदली हुई है. पहले ज़ायरा वसीम पर इस्लाम के खिलाफ जाने का आरोप लगा था. और अब ज़ायरा वसीम ने खुद ही धर्म को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है. ऐसा नहीं है कि उनके पास काम नहीं था.

दंगल के बाद, उनकी फिल्म Secret Superstar की काफी तरीफ हुई थी. और इसी वर्ष उनकी The Sky Is Pink नाम की फिल्म Release होने वाली है. 18 साल की उम्र आते-आते इंसान में सोचने-समझने की शक्ति आ जाती है. 18 साल की उम्र में किसी भी युवा को वोटिंग का अधिकार मिल जाता है. किसी भी लड़की को अपनी मर्ज़ी से शादी का क़ानूनी अधिकार मिल जाता है. लेकिन जब किसी का धर्म उसकी सोच पर हावी हो जाए, तो फिर इंसान बुद्धि से काम नहीं ले पाता. ज़ायरा वसीम के मामले में बिल्कुल ऐसा ही हुआ है. लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए, कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में पहले भी मुस्लिम कलाकारों ने काम किया है. इनमें महिलाएं भी हैं और पुरुष भी हैं.

आज भी फिल्म इंडस्ट्री के तीन बड़े सुपरस्टार्स यानी शाहरुख ख़ान, सलमान ख़ान और आमिर ख़ान, तीनों मुसलमान हैं जबकि इस देश की आबादी में 90 करोड़ से ज़्यादा लोग हिंदू हैं. इससे साफ़ है कि करियर में कामयाबी और लोकप्रियता के लिए आपका किसी ख़ास धर्म का होना ज़रूरी नहीं है. Mohammed Yousuf Khan यानी दिलीप कुमार ने कभी अपने फिल्मी करियर में धर्म वाला कार्ड नहीं खेला. और एक मुसलमान होते हुए भी बड़े पर्दे पर एक हिंदू नाम अपनाया.

कॉमेडियन Johnny Walker भी मुस्लिम थे, जिन्होंने अपनी कॉमेडी से लोगों का दिल जीता. मोहम्मद रफी को ही देख लीजिए. मुसलमान होने के नाते उन्होंने कभी इस बात की शिकायत नहीं की, कि फिल्म बैजू बावरा में उनसे हरी ओम गीत क्यों गाने के लिए कहा गया? इस गीत को लिखने वाले शकिल बदायुनी भी मुस्लिम थे. और इसमें संगीत भी नौशाद ने दिया था, जो एक मुस्लिम थे. इन लोगों ने कभी इस बात पर आपत्ति नहीं जताई, कि फिल्म के निर्देशक ने इनसे ये गीत, लिखने, संगीत देने और गाने के लिए क्यों कहा? इन सभी लोगों के लिए इनका काम ही उनका धर्म था. ठीक इसी तरह, बॉलीवुड ने कई सारी मुस्लिम महिलाओं की एक्टिंग भी देखी.

नूरजहां, मधुबाला, नरगिस, वहीदा रहमान, सायरा बानो, मुमताज, जीनत अमान, फरीदा जलाल, मीना कुमारी, ये सभी ऐसी अदाकारा थीं, जिनकी फिल्में आज भी याद की जाती हैं. इन्होंने कभी धर्म का बहाना बनाकर, फिल्म इंडस्ट्री न तो छोड़ी और न ही धर्म के आधार पर काम मांगा. ज़ायरा वसीम को ज़्यादा पीछे जाने की ज़रुरत नहीं है. उन्हें दंगल की अपनी Co-Actress फातिमा शेख को देख लेना चाहिए. वो आज भी फ़िल्म इंडस्ट्री में डटी हुई हैं और अभिनय कर रही हैं.

इस बात में कोई दो-राय नहीं है, कि किसी ज़माने में हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले लोगों को सम्मान नहीं मिलता था. इसे अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता था. महिलाओं के लिए ख़ासकर. लेकिन उस वक्त भी Creative Freedom के रास्ते में धर्म ने दखलअंदाज़ी नहीं की. आज रिसर्च के दौरान हमें दिलीप कुमार का 50 साल पुराना एक इंटरव्यू मिला. जिसमें उन्होंने कहा था, कि फिल्म इंडस्ट्री में बड़े पैमाने पर बदलाव हो रहे हैं और लोगों ने हर वर्ग के Actors को स्वीकार करना शुरु कर दिया है.

कई लोग ये भी कह रहे हैं, कि ज़ायरा वसीम ने ये फैसला इसलिए लिया, क्योंकि उनके पास काम नहीं था. अगर ये मान भी लिया जाए, तो भी ये बात समझ में नहीं आती कि उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री छोड़ने के लिए इस्लाम धर्म को बहाना क्यों बनाया? हमारे देश में पहले भी बहुत सारे ऐसे कलाकार हुए हैं, जिनकी Launching पूरे गाजे-बाजे के साथ हुई. लेकिन काम ना मिलने की वजह से ऐसे कलाकार Fail हो गए और धीरे-धीरे करके बड़े पर्दे से ग़ायब हो गए.

उदाहरण के तौर पर राहुल रॉय, विवेक मुशरान, कुमार गौरव या अनु अग्रवाल को ले लीजिए. आपको इनके नाम भी याद नहीं होंगे. लेकिन इन लोगों ने कभी ये नहीं कहा, कि धर्म के आधार पर फिल्म इंडस्ट्री छोड़कर जा रहा हूं. इसलीए आज हमें ये कहने पर मजबूर होना पड़ा है, कि जायरा वसीम ने एक प्रकार का Idea शुरू कर दिया है और हो सकता है, कि भविष्य में कोई क्रिकेटर ये कह दे, कि मेरा धर्म मेरे आड़े आ रहा है, इसलिए क्रिकेट नहीं खेलूंगा. हाल ही में युवराज सिंह ने क्रिकेट से संन्यास लिया. मोहम्मद कैफ़ और ज़हीर ख़ान ने भी संन्यास ले लिया. लेकिन आपने कभी सोचा है, अगर ये भी कहने लगते कि मेरा धर्म, मेरे खेल के आड़े आ रहा था तो कैसी स्थिति उत्पन्न होती.

और जैसा कि हमने शुरुआत में कहा, कि ज़ायरा वसीम के धार्मिक फैसले के साथ तो सब खड़े हैं. लेकिन TMC की सांसद और फिल्म Actress नुसरत जहां को धार्मिक आज़ादी का पालन करने का इनाम विरोध और फतवे के रूप में मिला है. उनका कसूर सिर्फ इतना है, कि उन्होंने अपनी इच्छा से शादी की. सिंदूर लगाकर और मंगलसूत्र पहनकर संसद गईं. हालांकि, नुसरत जहां ने ऐसी सोच रखने वालों को उन्हीं की भाषा में अपना जवाब दे दिया है और एक बयान जारी करके कहा है, कि वो संयुक्त भारत की प्रतिनिधि हैं, जो धर्म, जाति और पंथ से परे है. उन्होंने ये भी कहा है, कि वो पहनने के लिए कौन से कपड़े चुनती हैं, इस पर किसी को, कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं है.

राजनीति और धर्म के मिश्रण का परिणाम नफरत होता है. ऐसी ही नफरत आजकल Trend कर रही है. इसीलिए अगर भारत की क्रिकेट टीम हार जाती है तो उसका दोष भी भारत की नई भगवा जर्सी को ही दिया जाता है. आश्चर्य की बात ये है कि लोगों का ध्यान कहां-कहां जाता है? लेकिन उससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक है जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का Tweet. विश्वकप में भारत की हार पर महबूबा मुफ्ती ने Tweet किया था कि "भले ही आप मुझको अंधविश्वासी कहें लेकिन विश्व कप में भारतीय टीम की जर्सी ने भारत की जीत के सिलसिले को रोक दिया."

ये Tweet किसी सामान्य व्यक्ति का नहीं है बल्कि जम्मू और कश्मीर की मुख्यमंत्री रह चुकी महबूबा मुफ्ती का है. वो PDP की अध्यक्ष भी हैं. ज़रा सोचिए... भगवा रंग के प्रति उनके मन में कितनी नफरत है.
भारतीय संस्कृति के प्रतीकों से नफरत करने वाले ये लोग....जब ज़िम्मेदार पदों पर बैठते होंगे. तो इनकी नफरत का असर इनके फैसलों पर भी ज़रूर पड़ता होगा. ये लोग जब मुख्यमंत्री बनते हैं तो ये शपथ लेते हैं कि उनके फैसलों में कोई भेदभाव नहीं होगा, लेकिन इस तरह की शपथ बहुत ही नकली होती है. इनके असली विचार आप इनके Facebook और Twitter पर देख सकते हैं.

ये वही लोग हैं जो योग, वंदे मातरम और खाने-पीने में भी धर्म ढूंढ लेते हैं. अच्छी बात ये है कि आज ज़्यादातर राजनीतिक दलों ने महबूबा मुफ्ती के विचारों की निंदा की है. फिल्म और राजनीति में धर्म के नाम पर नफरत का ज़हर पहले ही घुल चुका है. कम से कम खेल को इस ज़हर से दूर रखना चाहिए.