Zee जानकारी : मिस्टर ट्रम्प! तुम मुझे वीजा दो, मैं तुम्हें व्यापार दूंगा

Zee जानकारी : मिस्टर ट्रम्प! तुम मुझे वीजा दो, मैं तुम्हें व्यापार दूंगा

स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस ने नारा दिया था कि तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। लेकिन इस नारे को आज की कूटनीति के हिसाब से कहना हो..तो आप कह सकते हैं कि तुम मुझे वीज़ा दो मैं तुम्हें व्यापार दूंगा। यानी आज की कूटनीतिक दुनिया में जिस देश के साथ आपको व्यापार करना है..वहां के लोगों को आसान शर्तों पर वीज़ा देना होगा। भारत और अमेरिका के बीच भी व्यापार और वीज़ा वाले रिश्ते हैं। लेकिन इन रिश्तों को लेकर दोनों देशों की सोच बिलकुल अलग है.. अमेरिका भारत से फायदा उठाना चाहता है.. लेकिन भारत के लोगों को वीज़ा नहीं देना चाहता। हमारी यह ख़बर अमेरिका के नये राष्ट्रपति Donald Trump की इसी सोच पर आधारित है। 

आज हमारे पास कुछ ऐसे कागज़ मौजूद हैं, जो ये बताते हैं कि कैसे अमेरिका के नए राष्ट्रपति Donald Trump ने पद संभालने से पहले.. एक व्यापारी के तौर पर..भारत से 6 मिलियन डॉलर्स यानी करीब 40 करोड़ रुपये तो कमा लिए..लेकिन अब राष्ट्रपति बन जाने के बाद वो भारत के Professionals को मिलने वाले H-1B वीज़ा की शर्तों को सख्त बनाना चाहते हैं। ये भारत के राष्ट्रीय हितों से जुड़ी ख़बर है.. इसलिए इसका विश्लेषण करना ज़रूरी है.. इस ख़बर में कई तकनीकी पेंच हैं जिन्हें हम सरल भाषा में आपके सामने Decode करेंगे.. 

अमेरिका.. भारत के साथ व्यापार करना चाहता है। क्योंकि भारत एक बहुत बड़ा बाज़ार है। और भारत.. अमेरिका से व्यापार करने के साथ-साथ अपने लोगों के लिए वीज़ा चाहता है..क्योंकि भारत के लोग Talented हैं..और वो अमेरिका जाकर अच्छा काम कर सकते हैं.. और अच्छा पैसा कमा सकते हैं। इस तरह से भारत के Professionals... अमेरिका और भारत..दोनों की स्थिति को मज़बूत बनाते हैं। लेकिन अमेरिका की सोच ज़रा दूजी किस्म की है.. अमेरिका भारत के साथ बड़े पैमाने पर व्यापार तो करना चाहता है..लेकिन वो भारत के Talented लोगों को आसान शर्तों पर वीज़ा नहीं देना चाहता। 
 

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने से पहले भारत की कंपनियों के साथ अलग अलग Deals करके करीब.. करीब 40  करोड़ रुपये कमाए थे.. 

- ये रकम.. ट्रंप ने वर्ष 2012 से वर्ष 2016 के बीच कमाई। 

- ट्रंप ने इस कमाई के लिए अपने Brand Name का इस्तेमाल किया है। 

- ट्रंप की कंपनी ने भारत के कई Real Estate Builders के साथ करार किया और उन्हें D.T यानी  Donald Trump के नाम के इस्तेमाल की इजाज़त दे दी। इसके बदले में ट्रंप की कंपनी को रॉयल्टी दी गई। 

आपको बता दें कि अमेरिका के राष्ट्रपति बनने से पहले डोनल्ड ट्रंप एक बिजनेसमैन रहे हैं..और उनका मुख्य बिजनेस भी  Real Estate को ही माना जाता है। Trump की कंपनी The Trump Organization .. Real Estate का कारोबार करती है। और इस कंपनी ने दुनिया के कई देशों में बड़ी बड़ी इमारतों और भवनों का निर्माण किया है। अब ट्रंप की इस कंपनी को उनके बेटे डोनल्ड ट्रंप जूनियर और एरिक ट्रंप चलाते हैं। 

- भारत में कई ऐसे Real Estate Projects चल रहे हैं जो Donald Trump  के Brand Name का इस्तेमाल कर रहे हैं। 

- इनमें Worli.. Gurgaon, Pune और Kolkata की कंपनियां शामिल हैं। 
इनमें से Worli की कंपनी को रॉयल्टी के रूप में 1 मिलियन डॉलर्स से 5 मिलियन डॉलर्स के बीच की रकम मई 2016 तक मिली थी।

इन कंपनियों की जानकारी US Office Of Government Ethics को दी गई है। आपको बता दें कि  US Office Of Government Ethics एक स्वतंत्र एजेंसी है जो अमेरिका की सरकार में शामिल लोगों के Conflict Of Interests यानी हितों के टकराव की जांच करती है। US OGE से ये कागज़ात हमारे सहयोगी अखबार DNA ने हासिल किए हैं..और ये कागज़ इस वक्त मेरे हाथ में भी हैं..जिसमें इस बात का जिक्र है कि भारत में कितने Projects में डोनल्ड ट्रंप के नाम का इस्तेमाल हो रहा है। 

ट्रंप की कंपनियां भारतीय कंपनियों के साथ कारोबार करें, या फिर उन्हें अपने Brand के इस्तेमाल का लाइसेंस बेचें..इसमें तकनीकी तौर पर कोई परेशानी नहीं है। लेकिन सवाल ये है कि जो ट्रंप राष्ट्रपति बनने से पहले भारत से कमाई करते रहे..वो राष्ट्रपति बनने के बाद भारत के Professionals को आसानी से H-1B वीज़ा क्यों नहीं देना चाहते? हम आपको बता दें कि ट्रंप प्रशासन H-1B वीज़ा को खत्म नहीं कर रहा है..बल्कि इससे जुड़ी शर्तों को मुश्किल बनाकर भारतीयों के लिए परेशानी खड़ी कर रहा है।

अमेरिका की Software कैपिटल कहलाने वाली Silicon Valley में इस बात की चर्चा है कि क्या डोनल्ड ट्रंप Executive Orders लाकर H-1B वीज़ा की शर्तों को मुश्किल बना देंगे। सबसे पहले आपको ये समझना चाहिए कि H-1B वीज़ा होता क्या है..य़े किन्हें दिया जाता है..और इसके लिए किन शर्तों का पालन करना होता है।

H1-B वीज़ा उन विदेशी लोगों को  दिया जाता है जो Highly  Skilled होते हैं। ये वीज़ा अलग अलग क्षेत्रों के Professionals को दिया जाता है। H-1B वीज़ा शुरुआत में 3 वर्षों के लिए दिया जाता है। जिसे बाद में 3 वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकता है।  अमेरिका की सरकार हर वर्ष 85 हज़ार H-1B वीज़ा जारी करती है। इनमें से 65 हज़ार नौकरीपेशा लोगों के लिए होते हैं..और बाकी के 20 हज़ार वीज़ा उन छात्रों को दिए जाते हैं..जो Graduation के साथ साथ अमेरिका में रहकर काम भी करना चाहते हैं। 

अमेरिका में काम करने वाली भारत की Technology कंपनियां.. अपने सबसे ज्यादा कर्मचारी H-1B वीज़ा के ज़रिए ही Recruit करती हैं। एक अनुमान के मुताबिक अमेरिका में भारत की IT Firms में करीब 3 लाख Professionals H-1B वीज़ा लेकर काम कर रहे हैं। 

यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि 85 हज़ार Visa में से 70 प्रतिशत भारतीय कंपनियों को ही मिलते हैं। वर्ष 2014 में H-1B वीज़ा हासिल करने वाले लोगों में से 70 प्रतिशत भारतीय थे..जबकि चीन के 8 प्रतिशत, कनाडा के 2.2 प्रतिशत, फिलीपींस के 1.6 प्रतिशत, साउथ कोरिया के 1.4 प्रतिशत और ब्रिटेन के 1 प्रतिशत लोगों को ये वीज़ा मिला था।

ट्रंप अपने चुनाव प्रचार के दौरान कई बार कह चुके हैं. कि H-1B वीज़ा कार्यक्रम दरअसल न्यूनतम दरों पर मजदूरी कराने वाला कार्यक्रम है और इससे अमेरिका के लोगों की नौकरियां जा रही हैं। ट्रंप सरकार ने  H-1B वीज़ा Policy बदलने के लिए जो ड्राफ्ट बनाया है उसके मुताबिक इस वीज़ा पर काम करने के लिए अमेरिका आने वाले लोगों को हर साल 1 लाख 30 हज़ार डॉलर्स यानी करीब 88 लाख रुपये का न्यूनतम वेतन देना होगा। 

फिलहाल  H-1B वीज़ा लेकर काम करने वालों का न्यूनतम वार्षिक वेतन 40 लाख रुपये है। अगर नया नियम लागू होता है तो IT कंपनियों को भारत और दूसरे देशों से कर्मचारी रखने पर मोटी रकम खर्च करनी पड़ेगी इससे कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान होगा। और हारकर कंपनियों को अमेरिका के लोगों को नौकरियां देनी होंगी क्योंकि तब उन्हें कम पैसे खर्च करने पड़ेंगे। नियमों में बदलाव की आशंका से सिर्फ भारतीय IT कंपनियां ही परेशान नहीं है..बल्कि अमेरिका की Silicon Valley में काम करने वाली दुनिया की बड़ी बड़ी कंपनियां परेशान हैं। क्योंकि इन कंपनियों में बड़ी संख्या में भारतीय Professionals काम करते हैं
 
और ये कंपनियां जानती हैं कि भारतीय  Professionals... Mathematics, Science और इंजीनियरिंग जैसे विषयों पर अच्छी पकड़ रखते हैं और भारतीय लोगों की काबिलियत का मुकाबला अमेरिका के ज्यादातर Professionals नहीं कर सकते। यही वजह है कि अमेरिका की बड़ी बड़ी कंपनियों को चलाने वाले लोग भारतीय मूल के हैं।

- गूगल के CEO भारत के सुंदर पिचाई हैं।

- माइक्रोसॉफ्ट के CEO भारत के सत्या नडेला हैं।

- Adobe (एडोबी) के CEO और President शांतनु नारायण है। 

ज़ाहिर है कि अमेरिका एक ऐसा देश है जिसे बनाने में Americans के अलावा विदेशी लोगों का भी हाथ है। भारत और दूसरे देशों से लोग अमेरिका पहुंचते हैं..मेहनत करते हैं..नाम कमाते हैं और एक तरह से अमेरिका की सेवा करते हैं
अमेरिका के Migration Policy Institute के मुताबिक वर्ष 2014 में अमेरिका के कुल Workers में से 16 प्रतिशत प्रवासी थे। यानी बाहर से आए हुए लोग थे। 

- इसमें Computers और Information Technology से जुड़े कामों में 32 प्रतिशत प्रवासी लोग हैं और Health Care के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों में से 30 प्रतिशत प्रवासी हैं। 

- अमेरिका के कुल डॉक्टरों में से 30 प्रतिशत लोग अमेरिका के बाहर से आए हैं।  

यानी अमेरिका कामयाबी का एक ऐसा कटोरा है..जिसे भरने में प्रवासियों का बड़ा योगदान रहा है। लेकिन डोनल्ड ट्रंप अमेरिका के दरवाज़े बंद करना चाहते हैं..और इससे नुकसान सिर्फ अमेरिका का ही होगा। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पद संभालने से पहले भारत से करोड़ों रुपये तो कमा लिए..लेकिन अब वो भारत को उसका हक नहीं देना चाहते। 

H-1B वीज़ा.. काबिलियत रखने वाले भारतीयों का हक है। ट्रंप की नई नीतियों से परेशान होकर अब अमेरिका की बड़ी बड़ी कंपनियां उनका विरोध कर रही है। ट्रंप की Immigration Policy  के विरोध में अब अमेरिका की 127 Technology कंपनियां आ चुकी हैं। इनमें फेसबुक, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और एप्पल जैसी बड़ी बड़ी कंपनियां शामिल हैं। अब ट्रंप को ये भी सोचना चाहिए कि अगर वो सभी देशों के साथ अपने रिश्ते खराब कर लेंगे तो फिर अमेरिका में बनाए गए Products, हथियारों और दूसरे सामान को कहां बेचेंगे। अपने देश को महान बनाने में कोई बुराई नहीं है..बल्कि ये एक अच्छी बात है..लेकिन अमेरिका को महान बनाते-बनाते.. ट्रंप..  कहीं दूसरे देशों के साथ रिश्ते ना बिगाड़ बैठें।