सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग इतने 'लालायित' क्‍यों रहते हैं?

बड़ा सवाल खड़ा होता है कि 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण के एक पीढ़ी से भी ज्‍यादा वक्‍त गुजरने के बावजूद लोगों के जेहन में सरकारी नौकरियों को लेकर अभी भी क्रेज क्‍यों बरकरार है?

सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग इतने 'लालायित' क्‍यों रहते हैं?
पिछले दिनों रेलवे के 90 हजार पदों के लिए दो करोड़ से अधिक लोगों ने आवेदन किया.(प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर)

हरियाणा सरकार ने 12 जून को सरकारी सेवाओं में प्रवेश की अधिकतम उम्र सीमा 40 से बढ़ाकर 42 साल कर दी. पिछले दिनों रेलवे ने तीन दशकों में पहली बार सबसे बड़ी भर्तियां करने के लिए तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के करीब 90 हजार पदों पर विज्ञापन निकाला. इसके लिए दो करोड़ सैंतीस लाख लोगों ने आवेदन दिया. इसी तरह अन्‍य महकमों में भी भर्ती के लिए चंद सौ सीटों के लिए लाखों-करोड़ों आवेदन आते हैं. यहीं से बड़ा सवाल खड़ा होता है कि 1991 में शुरू हुए आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण के एक पीढ़ी से भी ज्‍यादा वक्‍त गुजरने के बावजूद लोगों के जेहन में सरकारी नौकरियों को लेकर अभी भी क्रेज क्‍यों बरकरार है? लोगों में अभी भी सरकारी नौकरी का मोह खत्‍म क्‍यों नहीं हो रहा है?

उससे पहले 'सोशलिस्‍ट' किस्‍म की मानसिकता वाले देश में सरकारी नौकरी ही रोजगार का सर्वश्रेष्‍ठ विकल्‍प माना जाता था. उसकी एक बड़ी वजह यह भी थी कि लगभग हर सेक्‍टर में सरकार की भी उपस्थिति थी. यानी निजी क्षेत्र में भी सार्वजनिक उपक्रम, सरकारी कंपनियों की बड़ी भूमिका थी. इसलिए सरकारी नौकरी का ही हर तरफ बोलबाला था, पूछ थी. इसकी तुलना में प्राइवेट सेक्‍टर को मोटेतौर पर 'फैक्‍ट्री' कल्‍चर से जोड़कर देखा जाता था. जहां हर तरफ बेइंतहा शोषण था. नौकरी अस्‍थाई थी. पैसा मामूली था. कामगार बेचारा परेशान था. उसकी तुलना में सरकारी नौकरी परमानेंट यानी 'स्‍थायी' और सुरक्षित होती थी. पेंशन होती थी. सुविधाएं और सबसे बढ़कर 'आराम' था.

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1991 के बाद के दौर में उदारीकरण, वैश्‍वीकरण और बाजारवाद की बयार बही. नतीजतन प्राइवेट सेक्‍टर की दशाएं बदलीं और वह पूरी तरह से कारपोरेट सेक्‍टर में तब्‍दील हो गया. प्राइवेट 'जॉब' में नौकरियों के अवसर बढ़े. दूसरी तरफ सरकार ने माना कि हर क्षेत्र में दखल देना सरकार का काम नहीं है. लिहाजा सरकार ने कई कंपनियों का विनिवेश करना शुरू किया. इसी दौर में आरक्षण सरकारी क्षेत्र में नए रूप में आया. 2004 के बाद अधिकांश नौकरियों में सरकारी पेंशन का प्रावधान खत्‍म सा हो गया. इन सबका असर यह हुआ कि सरकारी नौकरियां सीमित हो गईं और प्राइवेट जॉब का नित नए क्षेत्रों में अवसर उत्‍पन्‍न होने के कारण स्‍कोप बढ़ता गया. फिर भी लोगों में इसके प्रति आसक्ति बनी रही.

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सामंतवादी सोच
समाज वैज्ञानिक इनको लोगों की सामाजिक-आर्थिक पृष्‍ठभूमि से जोड़कर देखते हैं. खासकर उत्‍तर भारत में अभी भी कस्‍बाई, ग्रामीण समाज अर्द्ध-सामंतवादी मानसिकता का समाज है. ऐसे समाज में सरकारी नौकरी का मतलब उच्‍च प्रतिष्‍ठा से है. आईएएस, पीसीएस बनना सामाजिक रुतब हासिल करने का परिचायक माना जाता है. इसी कारण ऐसी शादियों में खूब दहेज का चलन देखा जाता है. गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी वैश्विक कंपनियों में लाखों रुपये का पैकेज पाने वाले की वह हैसियत नहीं मानी जाती जोकि एक नायब तहसीलदार की अपने इलाके में होती है, जबकि प्रशासनिक नौकरी की बाबूशाही में यह सबसे निचले दर्जे का पद होता है.

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दूसरी बड़ी वजह जॉब सिक्‍योरिटी है. प्राइवेट जॉब में भले ही एचआर समेत तमाम संस्‍थाएं अस्तित्‍व में आ गई हों लेकिन अभी भी सरकारी की तुलना में प्राइवेट जॉब को सरकारी की तुलना में असुरक्षित ही माना जाता है. प्रदर्शन ही इन नौकरियों में टिके रहने का एकमात्र पैमाना है. इसके विपरीत सरकारी नौकरी पाना कठिन है लेकिन उसको निभाना आसान होता है, जबकि प्राइवेट जॉब पाना आसान है लेकिन उसको कर पाना कठिन माना जाता है. संभवतया इस तरह की मानसिकता के कारण ही सरकारी नौकरियों के प्रति आसक्ति बनी हुई है. इन्‍हीं वजहों से सरकारों पर सरकारी नौकरियों के लिए आयु सीमा बढ़ाने के लिए लगातार दबाव रहता है.

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इसी कड़ी में हरियाणा जैसे राज्‍यों में इसकी सीमा को 40 साल से बढ़ाकर 42 साल किया गया. इसी तरह कुछ साल पहले उत्‍तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवा में आयु सीमा 30 साल थी. बाद में उसे 35 और अब बढ़ाकर 40 साल कर दिया गया है. जबकि इसके विपरीत आईएएस जैसी सेवाओं के लिए होता कमेटी जैसी अन्‍य कई समितियों ने हालिया वर्षों में सुझाव दिए हैं कि इनके लिए आयु की सीमा में कटौती की जानी चाहिए. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि इससे एक क्षेत्र में असफल होने की स्थिति में युवाओं को किसी दूसरे क्षेत्र में भी करियर बनाने का मौका मिलेगा अन्‍यथा कई बार एक ही क्षेत्र में लगातार प्रयास करते रहने के कारण बहुत ज्‍यादा समय खर्च हो जाता है और सफलता नहीं मिलने पर बेरोजगार का जीवन बर्बाद हो जाता है.

तस्‍वीर का दूसरा पहलू
हालांकि इसके साथ ही समाज वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि बेहतर प्राइवेट जॉब पाने के लिए बेहतर क्‍वालिटी की उच्‍च शिक्षा की जरूरत होती है. इसके लिए पर्याप्‍त पैसा भी खर्च करना पड़ता है. इस तरह की नौकरियां भी महानगरों में ही सीमित हैं. लिहाजा महानगरीय संस्‍कृति में रचे-बसे लोगों के लिए ये पहली पसंद होती है.

दूसरी तरफ आम सरकारी नौकरियों को हासिल करने के लिए टेस्‍ट पास करना जरूरी होता है और ये सर्वत्र उपलब्‍ध होती हैं. लिहाजा टायर-3 और 4 शहरों में रहने वाले लोगों को इनको हासिल करने के लिए पैसों की तुलना में समय अधिक खर्च करना होता है. इसलिए वे परीक्षा की तैयारियों में लगे रहते हैं और अपने अंचल में ही सेटल होने की ख्‍वाहिश रखते हैं.