कर्नाटक ने इंदिरा और सोनिया को उबारा, राजीव को डुबाया, अब राहुल का क्या होगा

सबको उम्मीद थी कि 1985 में कर्नाटक राजीव की झोली में जाएगा. लोकसभा चुनाव के नौ हफ्ते बाद ही कर्नाटक का मूड बदल गया और कांग्रेस कर्नाटक विधानसभा चुनाव हार गई. राजीव गांधी की लोकप्रियता के पतन की शुरुआत यहीं से हुई.

कर्नाटक ने इंदिरा और सोनिया को उबारा, राजीव को डुबाया, अब राहुल का क्या होगा

कर्नाटक विधानसभा चुनाव का परिणाम मंगलवार दोपहर तक जग जाहिर हो जाएगा. ऐसे में परिणामों को लेकर सत्ता बाजार से लेकर सट्टा बाजार तक कयासों का दौर जारी है. इस पूरे घटनाक्रम में अगर किसी व्यक्ति का सबसे ज्यादा दांव पर लगा है तो वह हैं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी. उनके लिए कर्नाटक की बंद मुट्ठी में क्या है, इससे पहले यह जान लिया जाए कि उनके पुरखों के लिए कर्नाटक के पास क्या था. उनकी दादी इंदिरा गांधी, पिता राजीव गांधी और मां सोनिया गांधी को कर्नाटक ने आड़े वक्त में क्या दिया है.

चिकमंगलूर से हुई इंदिरा गांधी की वापसी: 1975 में आपातकाल लगाने के बाद 1977 के आम चुनाव में भारत की सबसे कद्दावर नेता इंदिरा गांधी को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी. वह उत्तर प्रदेश की अपनी परंपरागत रायबरेली सीट तक से चुनाव हार गईं. इस सीट को आज सोनिया गांधी की सीट के तौर पर देखा जाता है, लेकिन असल में इस सीट पर इंदिरा गांधी से पहले उनके पति फिरोज गांधी चुनाव लड़ा करते थे. उत्तर भारत में इस कदर खराब प्रदर्शन के बाद कांग्रेस निराशा में डूब गई. उसके बाद 1978 में कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट पर लोकसभा उपचुनाव हुआ. इंदिरा गांधी ने खुद दक्षिण भारत की इस सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया. इंदिरा गांधी ने भावुक नारा दिया- अपनी छोटी बिटिया को वोट दें.- इंदिरा गांधी 70,000 वोटों चुनाव जीत गईं. इस जीत को भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी की वापसी का द्वार माना जाता है.

राजीव को दिया झटका: इंदिरा गांधी के राजनैतिक कैरियर के सबसे खराब दौर में अगर कर्नाटक उनके लिए सहारा बनकर उभरा तो उनके बेटे राजीव गांधी जब सियासत के शीर्ष पर थे तब कर्नाटक ने उन्हें झटका दिया. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए आम चुनाव में राजीव गांधी को देश में 400 से अधिक लोकसभा सीटें मिलीं. भारत के लोकतंत्र के इतिहास में यह अब तक की सबसे बड़ी जीत है. लेकिन लोकसभा चुनाव के नौ हफ्ते बाद कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए. 

सबको उम्मीद थी कि 1985 में कर्नाटक राजीव की झोली में जाएगा. लेकिन यहां उनका मुकाबला कर्नाटक के छत्रप रामकृष्ण हेगड़े से था. हेगड़े ने चुनाव में एक ही बात कही कि लोकसभा में वोट मिला तो राजीव प्रधानमंत्री बन गए, लेकिन विधानसभा में वोट देने से वह मुख्यमंत्री तो नहीं बन जाएंगे. जनता तय करे कि उनका मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े होगा या कोई और. हेगड़े का इशारा कांग्रेस नेता गुंडू राव की तरफ था. लोकसभा चुनाव के नौ हफ्ते बाद ही कर्नाटक का मूड बदल गया और कांग्रेस कर्नाटक विधानसभा चुनाव हार गई. राजीव गांधी की लोकप्रियता के पतन की शुरुआत यहीं से हुई.

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सोनिया को बेल्लारी का सहारा: राजीव गांधी की हत्या के सात साल बाद तक सोनिया ने गांधी परिवार को सक्रिय राजनीति से दूर रखा. लेकिन 1998 में जब कांग्रेस पार्टी बुरी तरह बिखरने लगी तब आखिरकार सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष बनना स्वीकार किया. यह तो तय था कि 1999 में वे अपना पहला चुनाव परिवार की पारंपरिक सीट अमेठी से लड़ेंगी, लेकिन उत्तर प्रदेश में पार्टी के कमजोर जनाधार को देखते हुए एक और महफूज सीट की तलाश थी. यह तलाश एक बार फिर कर्नाटक में जाकर पूरी हुई. कांग्रेस ने नामांकन की आखिरी तारीख के ठीक पहले सोनिया के बेल्लारी से लड़ने की घोषणा की. बीजेपी ने नाटकीय घटनाक्रम में अपनी तेजतर्रार नेता सुषमा स्वराज को बेल्लारी में नामांकन करने भेजा. सोनिया के राजनैतिक भविष्य को तय करने वाले इस चुनाव में बेल्लारी ने सोनिया को चुना. बीजेपी का भारतीय बेटी बनाम विदेशी बहू का नारा नहीं चला. कर्नाटक ने 21 साल पहले जो प्यार सार को दिया था, वही आशीर्वाद बहू को भी मिला.

राहुल का क्या होगा: तीन कांग्रेस अध्यक्षों के राजनैतिक भविष्य पर हां या नहीं की मुहर लगाने वाले कर्नाटक में इस बार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की किस्मत दांव पर है. अध्यक्ष बनने के बाद यह उनका पहला चुनाव है. अगर वे यह चुनाव जीतते हैं तो कांग्रेस की सूखती धान में पानी पड़ जाएगा और अगर वे हारते हैं तो कांटों से भरा रास्ता उनका इंतजार कर रहा है. राहुल यही दुआ कर रहे होंगे कि उनकी कुंडली में वही सितारे बलवान हो जाएं जो उनकी दादी और मां की कुंडली में हुए थे. क्योंकि पिता की कुंडली वाले तारे तो गर्दिश की तरफ ले जाने वाले होंगे.