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शिक्षा के प्रसार से उलेमाओं की अपील का अब असर नहीं होता मतदाताओं पर

एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद ने कहा कि असल में, मुसलमान अपनी वक्ती और रोजमर्रा की जिंदगी के हिसाब से वोट देते हैं और इनकी अपीलों का उन पर असर नहीं होता

शिक्षा के प्रसार से उलेमाओं की अपील का अब असर नहीं होता मतदाताओं पर
मोहम्मद उमर कहते हैं कि कम से कम दिल्ली का मुसलमान किसी भी मौलाना या इमाम की अपील पर अपना वोट नहीं देता है. (फाइल फोटो)

नई दिल्लीः देश में चुनावों के दौरान एक समय वह भी था जब राजनीतिक दल मुस्लिम अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल करने के लिए उलेमा (धर्मगुरूओं) की अपील का इंतजार करते थे और कई मौकों पर इस तरह की अपील का उन्हें फायदा भी मिला. चुनाव के दौरान उलेमा की ओर से अपील अब भी जारी हो रही हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इनका प्रभाव लगातार कम ही हुआ है. ‘सेन्टर फॉर द स्टडीज ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज’ (सीएसडीएस) में एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद ने ‘भाषा’ से बातचीत में कहा कि यह गलत धारणा है कि मुसलमान उलेमा की अपील पर वोट देता है. उन्होंने कहा, “असल में, मुसलमान अपनी वक्ती और रोजमर्रा की जिंदगी के हिसाब से वोट देते हैं और इनकी अपीलों का उन पर असर नहीं होता.’’ 

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राजधानी में मुस्लिम समाज के अलग अलग वर्गों से हुई बातचीत में भी इसकी पुष्टि हुई. दिल्ली के मयूर विहार में रहने वाले और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट शुज़ा ज़मीर ने कहा, ‘‘पिछले दो तीन दशक में जैसे जैसे मुसलमानों में शिक्षा का प्रसार हुआ, उलेमा की अपीलों का रूतबा गिरता गया. आज हालात यह है कि पढ़ा—लिखा मुसलमान इनकी नहीं सुनता. वह अपनी समझ से वोट करता है.’’ दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत करने वाले युसूफ नकी का कहना था कि चुनावों के संदर्भ में मौलानाओं की अपील किसी को प्रभावित नहीं करती. उन्होंने कहा, अगर अपील करनी ही है तो किसी ईमानदार और साफ सुथरी छवि के उम्मीदवार को चुनने के लिए करनी चाहिए, न किसी पार्टी के पक्ष में. 

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पुरानी दिल्ली में कैमिस्ट की दुकान चलाने वाले 39 साल के मोहम्मद उमर कहते हैं, ‘‘अब मुसलमानों पर किसी अपील का कोई असर नहीं होता है. कम से कम दिल्ली का मुसलमान किसी भी मौलाना या इमाम की अपील पर अपना वोट नहीं देता है. हम पार्टी और उम्मीदवार देखकर वोट देते हैं.’’ दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही हुमेरा हयात ने कहा कि संविधान हमें अपनी मर्जी से उम्मीदवार का चुनने का हक देता है, इसलिए हमें किसी की क्यों सुननी चाहिए. उन्होंने कहा, ‘‘मजहब को लेकर भारतीय बहुत संवेदनशील होते हैं और मुझे लगता है कि पार्टियां मौलानाओं का एक मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करती हैं.’’ 

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हिलाल अहमद के अनुसार, चुनाव में मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए उलेमा से अपने पक्ष में अपील कराने का सिलसिला 1967 के चुनाव में शुरू हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दक्षिण एशिया में मुसलमानों के सबसे बड़े शिक्षण संस्थान से अपने पक्ष में अपील जारी कराई थी. अहमद के मुताबिक ‘मुस्लिम वोट बैंक’ शब्द पहली बार तब इस्तेमाल किया गया. अहमद ने बताया कि देवबंद ने पहली बार इस तरह की अपील जारी कर कहा कि चुनाव में मुसलमानों के लिए बेहतर होगा कि वो इंदिरा गांधी को वोट दें. दारूल उलूम देवबंद उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित है. यह दक्षिण एशिया में मुसलमानों का सबसे बड़ा शिक्षण संस्थान है. अहमद ने बताया कि इसके बाद चुनावों में इस तरह की अपील जारी करने का एक तरह से सिलसिला ही शुरू हो गया. 

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दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने 1973 में इंदिरा गांधी के समर्थन में और बाद में 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी के लिए अपील जारी की. बुखारी ने 1980 और 1984 में एक बार फिर कांग्रेस को वोट देने को कहा. बुखारी ने 1989 के चुनाव में पाला बदला और वीपी सिंह का समर्थन किया लेकिन 1992 में फिर से कांग्रेस के साथ आ गए. अहमद का मानना था कि उपरोक्त सभी चुनावों में बुखारी की अपील उसी पार्टी के लिए थी जिसके लिए मुस्लिम मतदाता पहले ही मन बना चुका था. गौरतलब है कि 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा के लिए, 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के लिए और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा के लिए अपील जारी की गई थी. इनके अलावा अलग अलग पार्टियों के लिए भी अपील जारी की गई हैं.

(इनपुट भाषा)