ब्रह्मपुर लोकसभा सीट: क्या कांग्रेस फिर से हासिल कर पाएगी अपना गढ़ या BJD की पकड़ रहेगी बरकरार?

इस सीट का महत्व इसलिए भी है कि पूर्व पीएम नरसिम्हा राव यहां से चुनाव लड़ चुके हैं. 

ब्रह्मपुर लोकसभा सीट: क्या कांग्रेस फिर से हासिल कर पाएगी अपना गढ़ या BJD की पकड़ रहेगी बरकरार?

नई दिल्ली: ओडिशा की ब्रह्मपुर लोकसभा सीट पर पहले चरण के तहत 11 अप्रैल को वोट डाले गए थे. यहां का राजनीतिक इतिहास बताता है कि पारंपरिक रूप से कांग्रेस का गढ़ रही इस सीट में बीजेडी के गठन के बाद कांग्रेस को बड़ी चुनौती मिली है. इस सीट का महत्व इसलिए भी है कि पूर्व पीएम नरसिम्हा राव यहां से चुनाव लड़ चुके हैं. 

2014 में मोदी लहर के बीच बीजेड़ी ने इस सीट पर अपनी पकड़ नहीं खोई. बीजेडी के उम्मीदवार सिद्धानंत महापात्रा ने यहां से अच्छे-खासे अंतर से चुनाव जीता. उन्हें 398,107 (43.97%) वोट मिले जबकि दूसरे नंबर पर रहे कांग्रेस के चंद्रशेखर साहू को 270,387 (29.86%) वोट मिले थे. बीजेपी के राम चंद्र पांडा को यहां से 1,58,811
(17.54%) वोट मिले थे. 

ब्रह्मपुर का राजनीतिक इतिहास 
ब्रह्मपुर लोकसभा सीट का नाम बदलता रहा है. यहां 1952 में पहला चुनाव हुआ उस वक्त इस लोकसभा क्षेत्र का नाम घुमसुर सीट था. इसके बाद इस सीट का गंजम सीट हो गया. 1952 से 1971 के बीच इस सीट पर कांग्रेस वर्चस्व रहा. इस बीच सिर्फ एक बार 1952 के उपचुनाव में यहां सीपीआई को जीत मिली थी. 

1977 के चुनाव में इस सीट का ब्रह्मपुर हो गया है. इस चुनाव में भी कांग्रेस के जन्नाथ राव तीसरी बार लगातार चुनाव जीते. राव की कामयाबी का सिलसिला जारी रहा और 1984 में उन्होंने एक बार फिर इस सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीता. 

1989 और 1991 में कांग्रेस के गोपीनाथ गजपति यहां से चुनाव जीते. 1996 का चुनाव इस सीट के लिए खास रहा और यह सीट चर्चा का केंद्र बन गई. यहां से नरसिम्हा राव ने चुनाव लड़ा और जीता भी. 1998 में भी यह सीट कांग्रेस ने जीती लेकिन 1999 में परिस्थितियां बदल गईं और यहां से बीजेपी ने जीत दर्ज की. 2004 में यह सीट कांग्रेस ने फिर हासिल कर ली. इसके बाद बीजेडी ने इस सीट पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली और अगले दो चुनावों 2009, 2014 में यहां पर जीत दर्ज की.