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चुनावी हलचल: जब लुप्‍त होते बुंदेली लोकनृत्‍य 'दीवारी' को मतदान से मिला पुनर्जीवन...

लोकसभा चुनाव 2019 में बांदा जिला प्रशासन ने मतदान बढ़ाने के लिए लोक संस्‍कृति को जुड़ी कलाओं को मतदाताओं तक पहुंचाने का प्रयास किया है. इस प्रयास का मकसद लोक संस्‍कृति को पुनर्जीवित करने के साथ मतदान के प्रतिशत को बढ़ाना है.

चुनावी हलचल: जब लुप्‍त होते बुंदेली लोकनृत्‍य 'दीवारी' को मतदान से मिला पुनर्जीवन...
बांदा संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले एक मतदान केंद्र में 'दीवारी' नृत्‍य की प्रस्‍तुति करते यदुवंशी कलाकार.

नई दिल्‍ली: लोकसभा चुनाव 2019 के तहत उत्‍तर प्रदेश के बांदा संसदीय क्षेत्र में हो रहा मतदान कई मायनों में बेहद अहम हो गया है. देश में पहली बार बांदा संसदीय सीट पर लुप्‍त होते बुंदेलखंडी लोकनृत्‍य को मतदान के सहारे पुनर्जीवन देने का प्रयास किया जा रहा है. बांदा जिला प्रशासन के इस प्रयास से लुप्‍त होती स्‍थानीय लोक कला, लोक संगीत और लोक नृत्‍व को संजीवनी तो मिलेगी ही, साथ ही देश के दूसरे हलकों को यह संदेश दिया जा सकेगा कि किस तरह हम चुनाव प्रक्रिया के जरिए अपनी लुप्‍त होती लोक संस्‍कृति का परिचय युवा पीढ़ी से करा सकते हैं. चुनावी हलचल में आज हम आपको बताते हैं कि इस प्रयास के तहत बांदा जिला प्रशासन ने क्‍या कदम उठाए हैं और इन कदमों से किस तरह देश की लोक संस्‍कृति और लोकतंत्र को मजबूत करने का प्रयास किया गया है. 

लोक नृत्‍य के सहारे बांदा प्रशासन ने एक तीर से लगाए दो निशाने 
लोकसभा चुनाव 2019 की घोषणा के साथ बांदा के जिलाधिकारी हीरा लाल ने अपने जनपद में 90 फीसदी से अधिक वोट कराने का प्रण लिया था. इस प्रण को पूरा करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि किस तरह लोगों को उनके घर से निकालकर मतदान केंद्र तक लाया जाए. इस बीच, सुझाव आया कि मतदान केंद्र में कुछ ऐसे कार्यक्रम किए जाएं, जिन्‍हें देखने के लिए लोग मतदान केंद्र तक पहुंचे. यह संभव हुआ तो लोग पहले मतदान करेंगे और फिर सांस्‍कृतिक कार्यक्रम का आनंद ले सकेंगे. अब सवाल यह था कि सांस्‍कृतिक कार्यक्रम किस तरह का हो. इसका जवाब खुद जिलाधिकारी हीरा लाल ने सुझाया. उन्‍होंने कहा कि सांस्‍कृतिक कार्यक्रम में बुंदेलखंड और बांदा की सांस्‍कृतिक से जुड़े हुए ऐसे कार्यक्रम हों, जिनसे आज की नई युवा पीढ़ी पूरी तरह से अनभिज्ञ है. जिसके बाद, बांदा की लोकसंस्‍कृति से जुड़े 'दीवारी' नृत्‍य को भी इस कार्यक्रम में शामिल किया गया. 

नौजवानों को दिया गया बुंदेली लोक नृत्‍य 'दीवारी' का प्रशिक्षण 
दीवारी को मतदान कार्यक्रम से जोड़ने के बाद जिला प्रशासन के सामने दो बड़ी चुनौती थी. पहली चुनौती 'दीवारी' लोक कला नृत्‍य में पारंगत लोगों को खोजने की थी. दूसरी चुनौती, इस कला से पूरी तरह से अनभिज्ञ नौजवानों को 'दीवारी' का प्रशिक्षण देना था. खैर, यह खोज जल्‍द पूरी हुई और नौजनावों का प्रशिक्षण पूरा किया गया. प्रशिक्षण पाने वाले नौजवानों के दल का पहला प्रदर्शन चौथे चरण में हुए तिंदवारी विधानसभा के मतदान के दौरान किया गया. जिसका दोहरा फायदा जिला प्रशासन को मिला. पहला फायदा यह हुआ कि लुप्‍त हो चुके लोक नृत्‍य को देखने के लिए भारी तादाद में लोग जमा हुए. चूंकि लोग यह नृत्‍य देखने के लिए मतदान केंद्र तक आए थे, लिहाजा उन्‍होंने मतदान भी किया. परिणाम यह हुआ कि इस विधानसभा क्षेत्र में पिछले चुनाव से मतदान में 12 फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ, जो कि उत्‍तर प्रदेश में रिकॉर्ड है.

क्‍या है 'दीवारी' लोक नृत्‍य 
'दीवारी' लोक नृत्‍य एक तरह की यदुवंशीय युद्ध कला है. इस युद्ध कला में बुंदेलों के शौर्य और वीरता की कहानियों को मौजूदा पीढि़यों तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है. दीवारा लोक नृत्‍य सामान्‍यतया दीपावली के अगले दिन यदुवंशियों द्वारा किया जाता है. इस नृत्‍य में लाठियों के साथ 18 से 20 लोग शामिल होते हैं. एक तरफ, यदुवंशी समाज के लोग वीर रस से ओतप्रोत हुए दीवारी गीत गाते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक ग्‍वाले पर 5-6 ग्‍वाले लाठियों से हमला करते हैं. इन 5-6 ग्‍वालों की लाठियों के वार का सामना करने वाला ग्‍वाला अपने अद्भुत युद्ध कौशल का प्रदर्शन करता है. ढोल की थाप, वीर रस से भरे दीवारी गीत के ऊंचे स्‍वर और लाठियों के आपस में टकराने की आवाज पूरे माहौल को रोमांचित करने वाली होती है. समय के साथ अद्भुत दीवारी युद्ध कौशल लुप्‍त होने की कगार में है. आज की युवा पीढ़ी में बहुत से लोग हैं, जिन्‍होने इस युद्ध कला को सिर्फ सुना है लेकिन देखा नहीं. मतदान के सहारे जिला प्रशासन का लोक संस्‍कृति जीवित करने का प्रयास वाकई भविष्‍य में बेहतर परिणाम लेकर आएगा.