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चुनावनामा 1989: बोफोर्स खरीद में घोटाले से घिरे राजीव, महज 197 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस

लोकसभा चुनाव 2019 जीतकर देश की सत्‍ता हासिल करने के लिए विपक्षी दलों ने महागठबंधन बनाया है. कुछ ऐसा ही गठबंधन 1989 में तत्‍कालीन राजीव सरकार के खिलाफ वीपी सिंह ने तैयार किया था.

चुनावनामा 1989: बोफोर्स खरीद में घोटाले से घिरे राजीव, महज 197 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस

नई दिल्‍ली: लोकसभा चुनाव 2019 का चुनाव जीतकर सत्‍ता हासिल करने के लिए विपक्ष की लगभग सभी पार्टियां आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच में आ खड़ी हुई हैं. इन सभी पार्टियों का मकसद किसी भी तरह बीजेपी को सत्‍ता से बेदखल करना है. विपक्षी दल बीजेपी को सत्‍ता को बेदखल करने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं, इसका फैसला अब 23 मई को ही सकेगा. उल्‍लेखनीय है कि कुछ इसी तरह, 1989 के लोकसभा चुनाव में भी एक ऐसा ही गठबंधन हुआ था, जिसमें राजीव गांधी के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस सरकार को सत्‍ता से बेदखल करने के लिए देश की सभी विपक्षी पार्टियां एक हो गई थीं. 1989 के इस चुनाव में विपक्षी दलों की इस एकता का असर चुनाव परिणामों में दिखा. इस चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी जरूर, लेकिन बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई. जिसके बाद नेशनल फ्रंट ने बीजेपी और वाम मोर्चे की मदद से नई सरकार गठित की. आइए, चुनावनामा में आज हम आपको बताते हैं कि वह कौन सी वजह थी, जिसके चलते 1984 में 404 सीट जीतने वाली कांग्रेस पार्टी 1989 के लोकसभा चुनाव में महज 197 सीटों पर सिमट गई. 

वीपी सिंह की राजीव मंत्रिमंडल बर्खास्‍तगी के बाद बना जन मोर्चा
उस दौर में, विश्‍वना‍थ प्रताप सिंह की गिनती कांग्रेस के कद्दावर नेता के तौर पर होती थी. कहा जाता है कि उस दौर में राजीव गांधी के सबसे बड़े आलोचक के तौर पर विश्‍वनाथ प्रताप सिंह को देखा जाता था. इस सच से वाकिफ होने के बावजूद तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विश्‍वनाथ प्रताप सिंह को अपने मंत्रिमंडल में वित्‍त मंत्री की जगह दी थी. विश्‍वनाथ प्रताप सिंह दिसंबर 1984 से जनवरी 1987 तक वित्‍त मंत्री रहे. इसके बाद, उन्‍हें देश का रक्षामंत्री बनाया गया. राजीव मंत्रिमंडल में इतनी अहम जिम्‍मेदारी मिलने के बाद भी विश्‍वनाथ प्रताप सिंह खुश नहीं थे. ऐसा कहा जाता है कि विश्‍वनाथ प्रताप सिंह लगातार राजीव को कमजोर करने की कोशिश में लगे रहते थे. इसी का नतीजा था कि 1987 में विश्‍वनाथ प्रताप सिंह को राजीव मंत्रिमंडल से बर्खास्‍त कर दिया गया. राजीव गांधी की इस कार्रवाई से नाराज विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने न केवल कांग्रेस की सदस्‍यता से इस्‍तीफा दे दिया, बल्कि अपनी लोकसभा की सीट भी छोड़ दी. इस लड़ाई में अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्‍मद खान जैसे कद्दावर कांग्रेसी नेता विश्‍वनाथ प्रताप सिंह के साथ आ खड़े हुए. जिसके बाद, विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने इन्‍हीं नेताओं के साथ मिलकर जनमोर्चा का गठन किया. 

इन तीन राजनैतिक दलों को मिलाकर बनाया गया था जनता दल
राजीव गांधी मंत्रिमंडल से बर्खास्‍तगी के बाद विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने अरुण गांधी और आरिफ मोहम्‍मद खान के साथ नई राजनीतिक बिसात बिछाना शुरू की. इस नई राजनीतिक बिसात के तहत इन नेताओं ने कांग्रेस की खिलाफत में खड़े राजनैतिक दलों को जोड़ना शुरू किया. विश्‍वनाथ प्रताप सिंह की यह कवायद रंग लाई. 11 अक्‍टूबर 1988 को जनमोर्चा, जनता पार्टी, लोकदल और कांग्रेस (एस) का विलय करके जनता दल नामक नया राजनैतिक संगठन तैयार किया गया. जल्‍द ही, द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक), तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) और असम गण परिषद (अगप) जैसी कई क्षेत्रीय पार्टियां भी जनता दल के साथ आ खड़े हुए. इन्‍हीं पार्टियों को मिलाकर एक गठबंधन तैयार किया गया. जिसे नेशनल फ्रंट का नाम दिया गया. 1989 के लोकसभा चुनाव में नेशनल फ्रंट मजबूती के साथ कांग्रेस के खिलाफ चुनाव में उतारा. नेशनल फ्रंट ने इस चुनाव में कुल 244 सीटों पर अपने प्रत्‍याशी खड़े किए, जिसमें 143 उम्‍मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे. इस चुनाव में विश्‍वनाथ प्रताप सिंह फतेहपुर संसदीय सीट से चुनाव जीतकर संसद में पहुंचे. वहीं, इस बार इलाहाबाद संसदीय सीट से जनता दल के जनेश्‍वर मिश्र चुनाव जीतने में सफल रहे. 

बीजेपी, सीपीआई और सीपीएम की मदद से बनी नेशनल फ्रंट की सरकार 
1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी भले ही 197 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी, लेकिन उसका यह आंकड़ा बहुमत से बहुत कम था. ऐसे में नेशनल फ्रंट ने सरकार बनाने की पहल की. नेशनल फ्रंट को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), सीपीआई और सीपीएम का बाहर से समर्थन मिला. जिसके बाद देश में एक बार फिर गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ. नेशनल फ्रंट में शामिल सभी राजनैतिक दलों ने प्रधानमंत्री पद के लिए विश्‍वनाथ प्रताप सिंह के नाम पर सहमति जाहिर की. जिसके बाद विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने 2 दिसंबर 1989 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की. हालांकि यह बात दीगर है कि विश्‍वनाथ प्रताप सिंह महज दस महीने तक प्रधानमंत्री पद पर बने रह सके. 1990 में बीजेपी ने विश्‍वनाथ सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. जिसके चलते नेशनल फ्रंट की यह सरकार अल्‍पमत में आ गई. विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने 10 नवंबर 1990 को प्रधानमंत्री पद से इस्‍तीफा दे दिया. विश्‍वनाथ सिंह के इस्‍तीफे के साथ चंद्रशेखर ने भी नेशनल फ्रंट और जनता दल का साथ छोड़कर अपना नया राजनैतिक दल बना लिया. इस घटना क्रम के साथ विश्‍वनाथ प्रताप सिंह का राजनैतिक सफर अपने अंतिम पायदान पर आ खड़ा हुआ. 

आखिर बीजेपी ने क्‍यों वापस लिया विश्‍वनाथ प्रताप सिंह सरकार से समर्थन 
1984 के लोकसभा चुनाव में महज दो सीटें हासिल करने वाली बीजेपी को 1989 के आम चुनाव में बड़ी कामयाबी मिली थी. 1989 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने कुल 225 सीटों पर अपने प्रत्‍याशी खड़े किए थे, जिसमें 85 प्रत्‍याशी चुनाव जीतकर संसद पहुंचने में सफल रहे थे. 1989 में नेशनल फ्रंट की सरकार बनने के बाद बीजेपी ने रामजन्‍मभूमि के मुद्दे पर देशव्‍यापी आंदोलन छेड़ दिया था. बीजेपी के संस्‍थापक नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी ने इस मुद्दे पर अपनी रथ यात्रा शुरू कर दी थी. इस दौरान बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार थी. लालकृष्‍ण आडवाणी की इस यात्रा से लालू प्रसाद यात्रा को अपना जनाधार खिसकता नजर आने लगा. अपना राजनैतिक जनाधार बचाने के लिए लालू प्रसाद यादव ने लालकृष्‍ण आडवाणी की रथ यात्रा रोकने और उनको गिरफ्तार करने का फैसला किया. 23 अक्‍टूबर 1990को लालकृष्‍ण आडवाणी की रथयात्रा अपने तय कार्यक्रम के तहत बिहार के समस्‍तीपुर पहुंच गई. जहां लालू प्रसाद यादव के निर्देश पर लालकृष्‍ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया. इस गिरफ्तारी से नाराज बीजेपी ने केंद्र की विश्‍वनाथ प्रताप सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. 

वीपी सिंह के बाद 1990 में सजपा के चंद्रशेखर बने देश के 11वें प्रधानमंत्री 
बीजेपी द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद तत्‍कालीन प्रधानमंत्री विश्‍वनाथ प्रताप सिंह ने 10 नवंबर 1990 को अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया. विश्‍वनाथ प्रताप सिंह के इस्‍तीफे के साथ चंद्रशेखर ने भी जनता दल का साथ छोड़ दिया और 'समाजवादी जनता पार्टी' के नाम से अपनी नई पार्टी बना ली. जिसके बाद, जनता दल के 64 सांसद विश्‍वनाथ प्रताप सिंह का साथ छोड़कर चंद्रशेखर के साथ आ खड़े हुए. चंद्रशेखर को कांग्रेस का बाहर से समर्थन मिला और उन्‍होंने देश के 11 प्रधानमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया. विश्‍वनाथ प्रताप सिंह की तरह चंद्रशेखर की सरकार भी ज्‍यादा दिनों तक नहीं चल सकी. सरकार बनने के कुछ महीनों बाद कांग्रेस ने चंद्रशेखर पर राजीव गांधी की जासूसी कराने का आरोप लगा दिया. जिसके चलते, चंद्रशेखर ने 21 जून 1991 को प्रधानमंत्री के पद से इस्‍तीफा दे दिया. जिसके बाद, 1991 में एक बार फिर लोकसभा चुनाव हुए.