जयनगर लोकसभा सीट पर वामपंथी दलों के बीच है मुकाबला, जातीय सीमकरण भुनाने पर जोर

वन संपदा से भरपूर जयनगर लोकसभा सीट हर राजनेता के लिए काफी अहम है. 1962 के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर शुरुआत से ही वामपंथी दलों के बीच मुकाबला रहा है. 

जयनगर लोकसभा सीट पर वामपंथी दलों के बीच है मुकाबला, जातीय सीमकरण भुनाने पर जोर
फाइल फोटो.

नई दिल्ली : वन संपदा से भरपूर जयनगर लोकसभा सीट हर राजनेता के लिए काफी अहम है. 1962 के बाद अस्तित्व में आई इस सीट पर शुरुआत से ही वामपंथी दलों के बीच मुकाबला रहा है. 1962 के चुनावों के बाद जब भी चुनाव हुए हैं, हमेशा वामपंथी दलों को ही जीत मिली है, लेकिन एक बार सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस को भी इस सीट से जीत मिली है. 

क्या कहता है जातीय सीमकरण
2011 की जनगणना की रिपोर्ट के पन्नों को पलट कर देखा जाए तो इस संसदीय क्षेत्र की सीट की कुल आबादी 2239168 है जिनमें 86.07% लोग गांवों में रहते हैं जबकि 13.93% शहरी हैं. इनमें अनुसूचित जाति और जनजाति का अनुपात क्रमशः 38.14 और 3.21 फीसदी है. 

2014 के चुनावों के आंकड़ों पर नजर
वहीं, बात कर निर्वाचन आयोग द्वारा 2014 के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों पर की जाए, तो यहां 81.52% मतदान हुए थे जबकि 2009 में यह आंकड़ा  80.08% था. इसमें ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी, माकपा और कांग्रेस को क्रमशः 41.61%, 9.52%, -% और 3.24% वोट मिले थे. 

एक मात्र ऐसा राज्य जहां नहीं चली मोदी लहर
दस साल से कांग्रेस के राज शासन के बाद 2014 में चली नरेंद्र मोदी की लहर ने बीजेपी को बेशक देश के हर कोने में फायदा पहुंचाया हो, लेकिन पश्चिम बंगाल में मोदी मैजिक नहीं चला और एक बार फिर तृणमूल कांग्रेस ने बाजी मारी. हालांकि वक्त के साथ समीकरण में बदलाव हुआ है और इस बार बीजेपी जनता पर पकड़ बनाने की पूरी कोशिश है, इसलिए जयनगर लोकसभा सीट का मुकाबला और भी ज्यादा दिलचस्प हो गया है. एक तरफ बीजेपी सत्ता में आने के लिए बेताब है, तो दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस के सामने अपनी पहचान और पकड़ दिखाने का इम्तिहान है.