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पांच साल से जमीन पकड़े है हाथी, मायावती ने लगाया है पूरा जोर, क्या उठ खड़ा होगा आज?

यूं तो आज आने वाले लोकसभा चुनाव का रिजल्ट (Lok sabha election results 2019) हर हिन्दुस्तानी के लिए बेहद अहम है, लेकिन बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के लिए यह बेहद अहम है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चार बार सत्ता हासिल करने वाली बीएसपी का स्कोर 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य रहा था. बीएसपी का इतना खराब प्रदर्शन हर राजनीतिक पंडितों को चौंकाने वाला था. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी बीएसपी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. इसके बाद बीएसपी के सामने अस्तित्व बचाने की नौबत आ गई है. 

पांच साल से जमीन पकड़े है हाथी, मायावती ने लगाया है पूरा जोर, क्या उठ खड़ा होगा आज?
बीएसपी सुप्रीमो मायावती के लिए Lok sabha election results 2019 काफी मायने रखता है.

नई दिल्ली: यूं तो आज आने वाले लोकसभा चुनाव का रिजल्ट (Lok sabha election results 2019) हर हिन्दुस्तानी के लिए बेहद अहम है, लेकिन बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के लिए यह बेहद अहम है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चार बार सत्ता हासिल करने वाली बीएसपी का स्कोर 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य रहा था. बीएसपी का इतना खराब प्रदर्शन हर राजनीतिक पंडितों को चौंकाने वाला था. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी बीएसपी का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा. इसके बाद बीएसपी के सामने अस्तित्व बचाने की नौबत आ गई है. 

बीएसपी के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहीं पार्टी सुप्रीमो मायावती ने लोकसभा चुनाव 2019 (Lok sabha elections 2019) में कलेजे पर पत्थर रखने जैसा राजनीतिक फैसला लेते हुए धुर विरोधी रही समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन की हैं. ऐसे में बीएसपी के लिए लोकसभा चुनाव का रिजल्ट (Chunav result 2019) काफी अहम है. आइए एक नजर डालते हैं कैसे पिछले पांच साल में जमीन बीएसपी और मायावती की राजनीतिक जमीन खिसकती चली गई.

2014 में वोट ठीक ठाक मिले पर नहीं जीता एक भी सांसद
2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को 19.6 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन एक भी सांसद जीत नहीं पाए. 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा को 27.42 प्रतिशत वोट मिले थे और 20 सीटें मिली थी. उत्तर प्रदेश में दलित मायावती का आधार वोट रहे हैं जिनकी जनसंख्या में भागेदारी 21.6 प्रतिशत हैं. ये अकेले दम पर लोकसभा में चुनाव में मायावती को एक भी सीट नहीं जिता पाए. दलित वोट जीत में तभी तब्दील होते हैं जब वे अन्य सामाजिक समूहों के मतों से जुड़ते हैं. वहीं भाजपा के 2009 के मतों से 2014 में 25 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई थी. उत्तर प्रदेश में 2009 में उसे 17.5 प्रतिशत वोट और 10 सीटें मिली थी. इस बार 42.3 प्रतिशत और 71 सीटें मिली हैं.

विधानसभा में हार पर मायावती जिद्द से हटीं
2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी बीएसपी ने किसी भी पार्टी से गठबंधन नहीं किया. मायावती अपनी जिद्द पर अड़ी रहीं, जिसका उनकी पार्टी को खामियाजा भुगतना पड़ा. बीएसपी विधानसभा चुनाव में 20 से कम सीटों पर सिमट गई. बीजेपी उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई. इस हार के बाद मानो मायावती अपनी जिद्द से पीछे हट गईं. विधान परिषद के चुनाव में मायावती ने अपनी धुर विरोधी समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने को तैयार हो गईं.

उपचुनावों में दिखी सपा-बसपा की दोस्ती की ताकत
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आगे बढ़कर मायावती की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया. मायावती भी जिद्द से पीछे हट गईं. उपचुनाव में हमेशा की तरह बीएसपी ने कोई प्रत्याशी नहीं उतारे. हालांकि उन्होंने सपा के प्रत्याशियों को सपोर्ट किया. इस नए गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) को भी शामिल किया गया. इसका इतना फायदा मिला कि सपा और आरएलडी के प्रत्याशियों ने उपचुनाव में शानदार जीत दर्ज की. सपा प्रत्याशी ने सीएम योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर और डिप्टी सीएम फूलपुर लोकसभा सीट पर भी जीत दर्ज की. इसके बाद स्पष्ट हो गया कि अगर दोनों पार्टियां गठबंधन करते हैं तो दोनों के वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर हो रहे हैं.

लोकसभा में मायावती ने अखिलेश और अजित सिंह से की दोस्ती
उपचुनाव में दोस्ती का ट्रॉयल सफल होने पर मायावती ने लोकसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव और अजित सिंह की पार्टी से गठबंधन को तैयार हुईं. लखनऊ के होटल में मायावती और अखिलेश यादव ने साझा प्रेस कांफ्रेंस करके महागठबंधन का ऐलान किया. इस प्रेस कांफ्रेंस में मायवती ने साफ तौर से कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी को रोकने के लिए गेस्ट हाउस प्रकरण को भी भूल गई हैं. यहां आपको बता दें कि लखनऊ के गेस्ट हाउस में सपा कार्यकर्ताओं ने मायावती पर जानलेवा हमला किया था. इस बार उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में गठबंधन के तहत बसपा 38, सपा 37 और आरएलडी को 3 सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. तीनों दलों ने मिलकर बीजेपी को हराने के लिए दलित, पिछड़ा और मुस्लिमों को लेकर जबरदस्त समीकरण तैयार किया है.

चुनाव की घोषणा से पहले ही सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और मायावती ने इसकी जमीन तैयार करनी शुरू कर दी. इसके लिए बूथ स्तर पर समन्वय कमेटियां तैयार की गईं. चूंकि दोनों दलों में लगभग ढाई दशकों से खुली दुश्मनी थी, इसलिए पार्टी के नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर सावधानी पूर्वक बयान देने के ही निर्देश दिए गए. इसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव आते-आते यादव और दलितों में काफी हद तक समन्वय बनाने में इन्हें सफलता मिली और पूर्वांचल की कई सीटों पर इसका असर भी देखने को मिल सकता है. अब देखना दिलचस्प होगा कि पिछले पांच साल में मायावती की ओर से की गई मेहनत से उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह का पताका लहराता है या नहीं, देखना दिलचस्प होगा.