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राजनीति के 'जटायु' निकले यह राजनेता, 2017 में ही भांप लिया था 2019 का नतीजा

बिहार (Bihar lok sabha seats 2019) की 40 लोकसभा सीटों में से 39 पर एनडीए की बढ़त है. इस लोकसभा चुनाव (2019 Lok Sabha election results) में एनडीए ने कुछ दोस्त गंवाए तो कुछ नए साथी साथ आए. पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में एक नेता राजनीति के 'जटायु' साबित हुए.

राजनीति के 'जटायु' निकले यह राजनेता, 2017 में ही भांप लिया था 2019 का नतीजा
Lok sabha election results 2019: चुनाव परिणाम में बिहार के सीएम नीतीश कुमार की दूरगामी सोच दिखी है.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव 2019 (Lok sabha election 2019) में आज देर शाम तक नतीजे आ जाएंगे. अब तक हुई वोटों की गिनती (Lok sabha election results 2019) के बाद आए रुझानों (Election trends) में बीजेपी नीत एनडीए प्रचंड बहुमत की ओर बढ़ रहा है. रुझानों में 542 लोकसभा सीटों में से एनडीए 331 पर बढ़त बनाए हुए है. वहीं बिहार (Bihar lok sabha seats 2019) की 40 लोकसभा सीटों में से 39 पर एनडीए की बढ़त है. इस लोकसभा चुनाव (2019 Lok Sabha election results) में एनडीए ने कुछ दोस्त गंवाए तो कुछ नए साथी साथ आए. पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में एक नेता राजनीति के 'जटायु' साबित हुए.

अगर आपने रामायण ग्रंथ पढ़ी होगी या कथा सुनी होगी तो आपको याद होगा की उसमें एक पात्र जटायु का जिक्र है. जटायु एक गिद्ध था, जिसने भारत में बैठे-बैठे समंदर पार देख लिया था कि रावण ने माता सीता को कहां छुपा रखा था. जटायु ने भगवान श्रीराम को माता सीता का पता बताया था. जटायु के बारे में कहा जाता है कि उनकी नजरें काफी दूर तक देखती थीं. इस बार के लोकसभा चुनाव में अगर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish kumar) की छवि का आंकलन करेंगे तो पता चलता है कि उन्होंने साल 2017 में ही भांप लिया था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या होने वाला है.

2014 के रण से पहले नीतीश ने दिखाई थी हिम्मत, पर मिली थी हार
साल 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करने के नाम पर अपनी पार्टी जदयू को एनडीए से अलग कर लिया था. 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान जब नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में वोट मांग रहे थे, तब नीतीश कुमार भी खुद को इस रेस में बता रहे थे. आपको याद दिला दूं कि नीतीश कुमार ने 2014 के प्रचार के दौरान कहा था कि उनके पास राज्य के साथ केंद्र में मंत्रालय चलाने का भी अनुभव है. नीतीश की पार्टी केवल 2 सीटें जीत पाई थीं. लोकसभा चुनाव में मिली इस करारी हार के बाद नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया था.

नीतीश ने जिद्द में अपने धुर विरोधी नेता से मिलाया था हाथ
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद नीतीश कुमार ने बीजेपी को हराने की जिद्द ठान ली थी. इसी जिद्द को पूरा करने के लिए नीतीश कुमार ने अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया था. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश, लालू और राहुल गांधी की तिकड़ी बीजेपी को हाराने में सफल रही. नीतीश कुमार की अगुवाई में महागठबंधन ने ऐसे वक्त में इतनी बड़ी जीत दर्ज की थी जब पूरे देश में बीजेपी लगातार परचम लहरा रही थी.

बिहार की जीत के बाद नीतीश कुमार को विपक्ष के बड़े चेहरे के रूप में दर्शाने की कोशिश हो रही थी. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लगातार फेल होने पर मीडिया में ऐसी खबरें आने लगी थी कि नीतीश कुमार 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष का चेहरा बन सकते हैं. इन सब चर्चाओं के बीच नीतीश कुमार ने लालू यादव की पार्टी के साथ मिलकर बिहार में करीब डेढ़ साल सरकार चलाते रहे. जुलाई 2017 में अचानक से नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होने का फैसला किया और बीजेपी के साथ हाथ मिलाकर बिहार में नई सरकार बना ली थी.

इस बड़े राजनीतिक फैसले के लिए नीतीश कुमार के कई करीबी नेताओं ने उनकी निंदा की, लेकिन वे अपने फैसले से पीछे नहीं हटे. जिस नीतीश कुमार ने साल 2009 के लोकसभा चुनाव में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार से रोक दिया था, वही नीतीश 2017 में पीएम मोदी के साथ मंच पर गुफ्तगू करते देखे गए.

नीतीश कुमार के इस फैसले के आधार पर कहा जा सकता है कि 2017 में ही उन्होंने दूरदृष्टि दिखाते हुए अनुमान लगा लिया था कि देश की जनता का रुझान किस तरफ है. अब जब 2019 के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट में नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बनेंगे तब नीतीश कुमार उनके मजबूत साथी के रूप में खड़े दिखेंगे.